Sunday, January 15, 2006

साहित्य की दिशाएँ : आज की बात


साहित्य की दिशाएँ : आज की बात
"किधर जाओगे ?"
यह संकेत शिशु की ओर हो तो उसकी आँखे अपनी माँ को ढूँढती फिरेगीं । यही प्रश्न किसी किशोर से करें तो वह अपने सखाओं के शोरगुल से गूंजते क्रीडाँगन की बात करेगा । प्रश्न एक युवा के सम्मुख उछाले जाने पर उसका मन सबसे मधुर स्वप्न की ओर दौडने लगेगा । उत्तर किसी अधेड से अपेक्षित हो तो कदाचित् वह थके-मांदे स्वर में बोलना चाहेगा-“ बाल बच्चों वाला आदमी घर के अलावा और कहाँ जायेगा भाई ? ”
यदि प्रश्न किसी बूढे मानुष के लिए हो तो संभव है उसकी उकतायी हुई साँसे प्रतिध्वनित हों और वह अनंत की ओर निहारते हुए खो जाए ।
प्रश्न समान है । उत्तर असमान ।
असमान उत्तरों में भी एक साम्य है –समयबोध की अनुप्रेरणा । उत्तरों में स्पष्ट स्वरूपभिन्नता के बावजूद उनकी प्रकृति में दिशा का एकत्व है । साहित्य में भी यही होता है । उसकी दिशाएँ बदलती रहती हैं । दिशाओं में बदलाव भी उसके गंतव्य को नहीं बदल पाते । शायद यही साहित्य का शिवत्व है । यही उसकी सत्यता है और सुन्दरता भी । साहित्य स्वयं दिशा है । समय से आगे की दिशा । उसकी यही क्षमता उसे सर्वदा आदरणीय बनाये रखती है । उस आदरणीय भाव की गति में वर्तमान अपने अतीत और आगत की जमीन तक पहुँच सकता है । साहित्य को “सहित”भी कहा गया है । आखिर “सहित” का भाव क्या है । सहित यानी हित के साथ । जहाँ हित का भाव है वहाँ साहित्य है । साहित्य को इसलिए हितचिंतक या हित का अनुशंसक भी माना गया है । “सहित” में कई संकेत है- पहला यह कि साहित्यकार और उसके पाठक एक साथ गतिमान हो । रचनाकार का उद्यम लेखन होता है । सृजन होता है । दरअसल साहित्य रचनाकार के साथ पाठक या श्रोता की सहभागिता भी । दरअसल साहित्य भाव और भावार्थ की सहयात्रा भी है । शब्द कुछ और कहें अर्थ कुछ और निकाले जायें, इसे कोई साहित्य माने, कम से कम मुझ साहित्यानुरागी के गले तो नहीं उतरता । दरअसल साहित्य व्यष्टि को समष्टि के साथ लयबद्धता के लिए अनुप्रेरणा भी है । विश्व की सभी भाषाओं के पंडितों के निष्कर्षों को भी केन्द्रस्थ करके कहा जाय तो साहित्य वही, जो रस के सहित हो । रस होगा तो पाठक के चित्त में आकर्षण उपजेगा । रस होगा तो वह निश्चय ही आत्मीयता या अंतरंगता का बोध करायेगा । साहित्य को सहित का भाव माने में “सुहित” का भाव भी है । जो अनंतिम न हो, अंतिम हित हो । वही साहित्य का सत्य है ।
सत्य का चरित्र सार्वभौमिक होता है । वह किसी भी देश-काल-परिस्थिति में अपना चेहरा नहीं बदलता । साहित्य की इस सच्चाई के उजाले में अपने समय के साहित्य को देखना चाहता हूँ तो आँखें फटी की फटी रह जाती हैं । आश्चर्य मिश्रित हताशा से घिर-घिर उठता हूँ । मन में प्रश्न उभरता है-“साहित्य के इतने सारे सत्य कैसे हो सकते हैं? ऐसा सच भले ही आज के साहित्यकार का सच हो वह उस वृहत्तर समाज के पाठक का सच नही हो सकता जिसका हर काल में अपेक्षा की जाती है । वह भी ऐसा पाठक जिसे हम बडी उम्मीद के साथ देखा करते हैं कि वह साहित्य के साथ चले । साहित्यमयता के बीच रहे ।
आज जितने आंदोंलन और चर्चा साहित्य की दिशाओं को लेकर हो रही है शायद उतनी कभी नहीं हुई । कमोवेश यह बात सभी भारतीय भाषाओं के गाँव में लागू होती है किन्तु हिन्दी की दुनिया में तो यह उफान पर है । कोई कहता है कि साहित्य प्रतिबद्धता और संघर्ष का शास्त्र है । कोई कहता है- साहित्य में प्रतिबद्धता का अर्थ कविता के लिए कवि के मन के आवेग को एकरस बनाना । कुछ ऐसी भी घोषणाएँ सुनाई देती हैं कि साहित्य अत्यल्प और पलायनवादी लोगों का भ्रम है । इस वाग्विलास में क्षणिक आनंद तो है किन्तु आनंद का स्थायित्व नहीं है । ऐसे सार्वजनिक सरोकार रहित कार्य में व्यापक समाज का कल्याण-मार्ग नहीं दिखाई देता है । समीक्षकों के सौजन्य से पढने को मिलता है कि साहित्य की सही दिशा वही है जो वे कह रहे हैं । सिर्फ वही है । अन्यत्र कहीं नहीं वह दिशा । बडी हँसी आती है – साहित्य की इतनी सारी दिशाएँ कैसे हो सकती है ? वह भी सब के सब सही । इसका आशय तो यह भी हुआ कि अन्य दिशाएँ गलत हैं । ऐसे समीक्षकों को न्यायाधीश मानने से मन इंकार करने लगता है । समीक्षक साहित्य का वकील नहीं हो सकता है । उसे साहित्य का वादी या प्रतिवादी भी नहीं होना चाहिए । जब स्वयं साहित्य हर वाद को लाँघता चलता है तब उसका कोई वादी, प्रतिवादी, वकील या मुंशी कैसे हो सकता है ? साहित्य का श्रेष्ठ न्यायाधीश पाठक ही हो सकता है । क्या समीक्षकों के इस कृत्य को दलाली की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए ?
साहित्य के लिए प्रेरणा-दबाब चाहे जो भी हों, अंतिम रूप से उसकी दर दशा का वास्तविक उत्तरदायी साहित्यकार ही होता है । साहित्य के इस उत्तरदायित्व को मैं धर्म मानता हूँ । इसे कर्म मात्र कह देने से परिणाम की निश्चितता के लिए साहित्यकार को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता । साहित्य-सृजन को चाहे लाख मन की आवेगपूर्ण एवं निश्छल अभिव्यक्ति माने । साहित्यकार को चाहे पूर्ण स्वायत्तता क्यों न प्राप्त हो । उसे मानवीय दृष्टि की आपेक्षिक परिधि से विमुक्त नहीं किया जा सकता है । इसी चूक से साहित्य का बीज-तत्व अर्थात् सौंन्दर्य विनष्ट हो जाया करता है । साहित्य भावनाएँ मात्र नहीं है, अनुभव भी होता है । इसमें देह, मेधा, अनुभूति क्षमता, चितवृत्ति, संकेत, संकल्पनाएँ, स्वप्न सभी कुछ होता है, इस दुनिया और उस दुनिया से आगे का भी अनुराग सम्मिलित है । जब अनुभव ही अनुभाव बन जाते हैं, जब दर्शन और दर्शित एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं, तब-तब साहित्य संपूर्ण अस्तित्व का सृजन बन जाता है ।
रिल्के ने “सानेट टु आर्फियस तृतीय ” में लिखा हैः
कविता लिखना जैसा हमने-तुमने सीखा ऐसी चाहत या ऐसी इच्छा नहीं है जिसको पाया नहीं जा सकता । कविता लिखना जीवंत होना है ।
(कविता शब्द को हम यहाँ व्यापक अर्थ में साहित्य के लिए प्रयुक्त माने)
इस जीवंतता का अर्थ तन की जीवंतता नहीं मन की जीवंतता है जिस मन में पास-पडोस, राग-रंग, आचार-विचार, रीति-नीति, भक्ति-मुक्ति और इसकी स्मृति तथा स्वप्न बसे हुए होतेहैं । मन सर्वदा ऐसी शुभ संकल्पनाओं का अवगाहन करने बेचैन भटकता रहता है । इस जीवंतता में मात्र वयष्टि अर्थात् साहित्यकार का उसका अपना स्वार्थ ही नहीं उसके परमार्थ को भी देखा जाना चाहिए ।
इतना सब कुछ कहने के बाद मैं यह कतई नही कहना चाह रहा हूँ कि आज का उत्तरआधुनिक साहित्य दिशाहीनता का शिकार है । साहित्य से हर क्षण छोटी-छोटी किरणें फैलती रहती है । जुगनू की तरह । इनसे पूरी अमावस निशा का अंधियार तो नहीं मिटता पर जुगूर-जागर जरूर होता रहता है । समूचे अंधियार को धकलने के लिए प्रकाश का एक विशाल व अंतरहित स्त्रोत जरूरी होता है । यदि अंधकार से भरे रात के यात्री का काम जुगनूओं से भी चल जाता है तो आप और हम कौन होते हैं जो उसे एक मशाल या ज्योत थामने के लिए विवश कर दें । साहित्य में छोटी-मोटी किरणें हर क्षण विसर्जित भी होती रहती है । यदि वृहत्तर समाज को विभाजित करने वाले साहित्य में भी कुछ लोगों को अपनी दिशा देती है, तो दिखाई देती है । इसमें शेष बचे हुए लोगों के लिए कम गुंजाईस बनती हैः
कि दलितवाद से समाज के स्थापत्य में दरार पडने के खतरे हैं ।
कि स्त्री विमर्श से पुरूषवादी वर्चस्व को संकट का सामन करना पडेगा ।
कि यांत्रिकता से साहित्य और पाठक के सारे संबध खत्म हो जायेगें ।
संबंध शब्द से मेरा ध्यान उस समाज की ओर खींचा चला जा रहा है जो आज संक्रमण की चढती जवानी पर है । समाजों से दूरियां घटी है पर परस्पर शंका, अविश्वास एवं अलगाव का भाव बढा है । आतंकवाद, मानवबम, अस्थिरता के कुटनीतिक कुचेष्टाओं को इस श्रेणी में रखा जा सकता है । जीवन और सामाजिक मूल्यों में नाटकीय ढंग से उलटफेर हो रहे हैं । पुराने मूल्य विघटित हो रहे हैं और नये मूल्यों को पूर्णतः स्वीकृति नही मिल पा रही है । मध्य वर्ग अपने सांस्कृतिक पिछडेपन और नई जीवनशैलियों की लालसा में निरंतर संस्कृति-विहीनता की रसातल की ओर उन्मुख हुआ जाता है । क्रयशक्ति यद्दपि बढी है तथापि प्राथमिकताओं में साहित्य के लिए कोई खास स्पेस नहीं बचा है । इधर बहुराष्ट्रीय घरानों के षडयंत्र में विमूढ मध्यम वर्ग फंसता चला जा रहा है । अब वे गाँव, गली चौपाल, चौराहे रहे नहीं । वहाँ अब टूथपेस्ट से लेकर फेयर एंड लवली जैसे बाह्य सौन्दर्य के प्रसाधनों का बाजार सज चुका है । पूँजी पर केन्द्रित समाज अपने अंतरविरोधों के कारण संकट के माहौल में है । शायद कई तरह के तनावों की पृष्ठभूमि में यही है । लोक का त्याग आलोक का त्याग सिद्ध हो रहा है । यह संकट मात्र भारत या एशिया के देशों का नहीं बल्कि विश्वव्यापी बन चुका है ।
कुल मिलाकर आदमी उपभोक्ता बन चुका है । आदमी-आदमी के मध्य शाश्वत संबंधों को अब उपभोक्तावाद के व्यापारी अपनी तराजू पर तौलने की विश्वव्यापी हरकतें करने लगे हैं । साहित्य की समाप्ति जैसे नारे उछाल कर पूँजीवादी साजिशों के तहत विकासशील देशों के साहित्य और प्रकारांतर से संस्कृति में सेंध लगाने की कुचेष्टा को परखने के लिए आज किसी के पास इमानदारी शेष नहीं है । और फुर्सत तो है ही नहीं । ऐसी विडम्बनाओं के मध्य साहित्य की दिशा पर चर्चा करना जटिल हो सकता है पर असंभव नहीं ।
जब तक मानुषवृति जीवित रहेगी । जब तक मानुष में संवेदना का एकाध कतरा बचा रहेगा , उसे साहित्य के परिसर में लाया जा सकता है । साहित्य की किसी न किसी विधा में उसके अंतर्मन के शिव को जगाया जा सकता है । आज जब जीवन की बहुत सारी जरूरी चीजों को संगणक संगणित कर चुका है, साहित्य रचना के कार्य को उसके कब्जे में जाने से रोकना ही होगा । हाँ, संगणक के सहारे साहित्य को प्रसारित किया जा सके तो यह दीगर बात है । यह जोखिम और उत्साह साहित्यकार का है । किसी दूसरे का नहीं ।
वाक् मनुष्य का सर्वोच्च उपहार है । मनुष्य वाक् या शब्द में ही सुरक्षित है । उसका समूचा अस्तित्व शब्दों में ही है । शब्द नहीं तो एक तरह का शुन्य है मनुष्य के चारों ओर । साहित्य वाक् या वाणी की सर्वोच्च देन है । साहित्य स्वयं दिशा है । इस दिशा से ही हमारी दिशाएँ तय होती हैं । हम ही उसे गलत दिशा पर ले जाने के जिद में लग जायें, यह तो ठीक नहीं ।

2 comments:

विजय त्रिपाठी said...

साहित्य को लेकर कुछ आलोचक एवं उनके पिछलग्गू लगातार विषवमन कर रहें हैं । यह साहित्य के लिए उचित एवं स्वास्थ्यवर्धक नहीं है । ऐसे लोगों के लिए आपका लेख जबाब है । आपसे हमें भी प्रेरणा मिली है । आप लगातार हमें अपने साहित्यिक विचार से अवगत कराते रहेंगे, इसी क्रम में । लेख के लिए आपको बधाई । विजय त्रिपाठी, इलाहाबाद, भारत

अशोक बेरीवाल said...

मानस साहब, आपसे मैं पूर्णतः सहमत हूँ । साहित्य वाद नहीं संवाद है । आपको विचारोत्तेजक निंबध के लिए धन्यवाद देना चाहिए । मैं लगातार आपको पढ रहा हूँ । क्या मैं आपके जैसा लिख सकता हूँ क्या इंटरनेट में । उपाय या तरीका बतायें ना । यह तो आप लोग कमाल कर रहें हैं भाई हिन्दी के विकास मैं । मैं जापान में एक कंपना में इंजीनियर हूँ । दिल्ली का रहने वाला हूँ । कभी-कभी भारत में कवि सम्मेलन में चला जाता था । और उन दिनों कविता भी लिखता रहा । खैर....
अशोक बेरीवाल, जापान