Sunday, May 18, 2008

किसने छीना बस्तर का मानवाधिकार ?


प्रजातंत्र कई रोगों से ग्रस्त हो चुका है । यहाँ प्रजा चींटी साबित हुई है और तंत्र पागल हाथी । राजनैतिक दल वास्तविक हकदारों के खिलाफ़ लड़ने में कारगर साबित नहीं हैं । जनप्रतिनिधि के रूप में हर किसी ने जनता के हिस्से को डकारने का कार्य किया है । सरकारी तंत्र में घनघोर शोषण है । कार्यपालिका के गलियारों तक गरीबों, दलितों, आदिवासियों की चीख-पुकार नहीं पहुँच पाती । उद्योगपतियों, व्यापारियों ने निरंकुश होकर जनता की गाढ़ी कमाई पर सेंध मारा है । बिचौलियों ने मनभर अनपढ़ों को लुटा है । न्याय चाँदी के सिक्कों के बिना मुहैया नहीं हो पाता । आम जन के स्वप्नों की रोज हत्या हो जाती है । कोई सुननेवाला नहीं । मानव होने का मूल अधिकार ही यहाँ चरितार्थ नहीं होता । यह सब ठीक है । भारतीय प्रजातंत्र का आत्मघाती यथार्थ भी है जिसके खिलाफ लड़ने की बात चलने पर आज हर कोई दूसरों के घर से भगतसिंह या सुभाषचंद्र के अवतरित होने की राह देखता है ।


पर इसके विकल्प में नक्सलवाद कैसा हल है जिसने सिर्फ अमानवीय विनाश का कलंक ही पोत दिया है हमारे मुँह पर । दूर जाने की नहीं कहूँगा । मेरे पड़ोसी जिले बस्तर को ही देख लें – और समूचे समय को ही नहीं । मात्र पिछले साल का मुआयना कर लें -


बस्तर में पिछले एक साल में यानी कि 2007 में नक्सलियों ने दौरान 635 हमले किये हैं । जाहिर है ये हमले जनता पर ही हुए हैं । ऐसी जनता, जो आदिवासी है । सीधी-सादी है । निर्दोष है । वन-प्रांत की स्थायी शांति चाहती है । इन हमलों में 242 बेकसुर नागरिकों को अपनी जान गवानी पड़ी है । इनमें से अधिकांश इसलिए मारे गये हैं क्योंकि उन्होंने नक्सलियों का साथ देने से इंकार कर दिया । इतना ही नहीं अपने माँ-बाप और घर-परिवार को छोड़कर जंगलों में रात दिन सेवा देते 125 सुरक्षा बल के जवान इन नक्सिलयों द्वारा मौत के घाट उतारे गये हैं । इसलिए कि ये दो रोटी की जुगाड़ में पुलिस में नौकरी करने के लिए विवश थे ।


क्या-क्या कहर नहीं ढ़ाया है बस्तर में प्रजातंत्र का विकल्प तलाशने वाले हिंसक लोगों ने इस बीच । उन्होंने न ननिहालों के स्कूलों को छोड़ा है न ही छोटे-मोटे दवाखानों को । इस दरमियान बार-बार बिजली का टॉवर गिरा दिया गया तो कभी सारे बस्तर की बिजली ही ठप्प कर दी गई । पंचायत भवन जहाँ ग्रामीण अपने विकास की रणनीति गढ़ते हैं को भी सरे आम इस दौरान सैकड़ों की सख्या में नेस्तनाबुत कर दिया गया है । आये दिन रेलवे की पटरियाँ उखाड़ दी गई जिससे किसी गर्भवती माँ का बच्चा पेट में ही मर गया, मरणासन्न बूढ़े बाप का मुँह तक उसके परिजन नही देख पाये । बरसों का प्यार इन आंतकियों के कारण टूट गया । दो प्रेमी जीवन भर के लिए बिछुड़ गये । पढ़ा-लिखा बेरोजगार समय पर साक्षात्कार नहीं दिला सका ।


एक आँकड़े के अनुसार मात्र पिछले 365 दिन में ही नक्सलियों ने 55 प्रायमरी शाला भवन, 8 पंचायत भवन, 9 शाला आश्रम, 9 छात्रावास, 8 आंगनबाड़ी केन्द्रों को नष्ट कर दिया है । इसके अलावा अन्य 18 भवनों को इन्हीं तथाकथित प्रजाहितैषियों ने नष्ट किया कर दिया गया है । जिससे करोड़ों रूपयों की सार्वजनिक संपत्ति स्वाहा हो चुकी है । यह केवल सरकारी हानि नहीं । यह जनता के खून-पसीनों से संचित धन की भी हानि है, जिसमे बस्तर के आदिवासियों का भी हिस्सा है । जिसमें समूची भारतीय जनता का भी अंशदान है ।


जो बस्तर के आदिवासियों की शांति झीन लेना चाहते हैं । जो माँ-बाप से उसके निर्दोष बेटों का सहारा छीन लेना चाहते हैं । जो जनता के क्रांतिकारी विकास के नाम पर उनके घरों, अस्पतालों, सामुदायिक भवनों को ध्वस्त कर दें । जो उनके घरों की बिजली को सप्ताहों, महीनों के लिए ठप्प कर दें । जो बस्तर की माँ-बेटियों की इज्जत पर दाग डाल दे वह उनके कैसे हितैषी हो सकते हे ?

अब ऐसे में यदि दशकों से आंतकित और स्थायी शोषण से बस्तरिहा ग्रामीण मुक्ति चाहे । वह जंगली आंतकवाद से लड़ने का संकल्प ले । वह राहत शिविरों में आसरा ले । उस पर भी उन शिविरों में नक्सली हमला करते रहें । ऐसी दुःसह और दारुण परिस्थितियों में नक्सलियों के खिलाफ बस्तरवासियों की ओर से खड़ा किया गया सलवा जुड़ूम अभियान जबरिया रोकना सरकार के लिए क्या अमानवीय नहीं होगा ? ऐसे अभियानों को तथाकथित मानवअधिकार और सुविधाओं के अभाव के नाम पर रोक लगाना क्या नक्सलवाद को तरजीह देना उचित होगा – न्यायिक दृष्टि से । वह भी सिर्फ इसलिए कि उसके विरोध में धंधेबाज प्रचारकों, हल्ला करने बुद्धिजीवियों की सक्रियता कहीं अधिक है । क्या मानवअधिकार सिर्फ बुद्धिजीवियों के लिए बनाया गया है ? मानवअधिकार इसलिए नहीं बनाया गया है कि आप नक्सलियों का साथ दें और संदेहास्पद होने पर मानवअधिकार के हनन के नाम पर खूब चींखे-चिल्लायें । अपनी ताकत और संपर्क के बल पर पूरी दुनिया में पोस्टर चिपकादें । और एक सिरे से भूल जायें कि वहाँ आदिवासियों का हनन हो रहा है । वह भी आपके तथाकथित मानवअधिकार के हनन से दशकों पहले । तब आप कहाँ थे ?


आदिवासियों के मानवाधिकार की निरंतरता में न तो नक्सली संलग्न हैं बुद्धिजीवी, समाजसेवी, न ही आदिवासी लेखक । अब समय आ गया है कि आदिवासी अपने लेखक तैयार करें । अपने बुद्धिजीवी तैयार करें । परसेंटखाऊ समाजसेवी संस्थाओं की पहचान करें जो उनके बीच रहते हैं और नक्सलियों (यानी आदिवासियों को इस्तेमाल करने वाले स्वार्थी, हिंसक और राजनैतिक लडाकूओं) से भी जुड़े रहते हैं । आदिवासी समाज के पढ़े लिखे तबकों को अब जागना ही पड़ेगा कि वे अपने पत्रकार तैयार करें जो दुनिया भर में उनकी बातों को भी सामने रखें । वरना अधिक पढ़े लिखे लोग उन्हें हर बार, हर कोण से पराजित करते ही रहेंगे ।


क्या यह गंभीर और असामान्य परिस्थिति नहीं है ? क्या इस जन आंदोलन को बीच में छोड़ देना न्यायिक कदम होगा ? ऐसे क्षणों में इस आंदोलन को नैतिक रूप से सरकार ने समर्थन दिया है और बस्तर में 3400 विशेष पुलिस अधिकारियों(SPO) की नियुक्ति की है तो बुराई क्या है ? ये वही युवा हैं जो नक्सलियों से तंग आ चुके हैं । उनकी माँगों की पूर्ति करते उनके परिवार के लोग थक चुके हैं । यदि वे भटक कर भी नक्सलियों का साथ दे रहे थे और अब उनके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तो इसमें उनका आत्मसुधार और सत्य के प्रति आग्रह ही है । आखिर वे नक्सलियों यानी की अराजक तत्वों का साथ क्यों दें ? अराजक तत्वों के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रारंभ सलवा जुडूम में क्यो न योगदान करें ? यह न करने का मतलब नक्सिलयों का साथ देना भी होगा । जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।


जो पुलिस की कार्यप्रणाली को जानते हैं वे समझ सकते हैं कि विशेष पुलिस अधिकारियों की व्यवस्था का पुलिस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है। एसपीओ की उपस्थिति से ग्रामवासियों में नये आत्मविश्वास आया है । उन्हें लगने लगा है कि उनके कोई अपना उनकी सुरक्षा के लिए अब कटिबद्ध है । ये नक्सलवाद के हिंसक गतिविधियों को रोकने और जूझने की मुहिम में भी सुत्रधार की तरह प्रशासन का हाथ बटा रहे हैं । हम याद करें असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में ऐसे शक्तिबल की आवश्यकता ज़रूरी मानी गई है ।

जब नक्सली प्रजातंत्र को नहीं मानते । जब नक्सली अपनी न्यायप्रणाली चाहते हैं । और अपनी सिद्धि (यानी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति)के लिए कोर्ट, मानवाधिकार फोरमों, लेखक-पत्रकार संगठनों, मीडिया का सहारा तो ले सकते हैं । पर आदिवासियों के शोषण, दमन, अत्याचार, मानवाधिकार के बारे में कुछ नहीं कर सकते । यहाँ तक की प्रजातांत्रिक तौर पर राजनीतिक सत्ता के लिए भी पहल नहीं कर सकते । तब ऐसी परिस्थितियों में क्या 2008 में बस्तर के आदिवासियों को नक्सलवादियों के हवाले फिर से छोड़ दिया जाय ? उन्हें कैंपो से लौटा दिया जाय ? और पुलिस शहरों के थानों में चैन की नींद सोती रहे ?

Thursday, May 08, 2008

बस्तर में जलाये गये घरों की राख को देखकर


(संदर्भः बस्तर में नक्सलपंथियों के द्वारा टेंटतराई में घर जलाने की घटना )


दिनाँक - 7 मई, 2008


नक्सलवाद यानी नव-शोषकों का राजनीतिक लिप्सागत विध्वंस । नक्सलवाद यानी आत्महंताओं का व्यवसाय । उसका मूल-यथार्थ प्रजातंत्र की विफलताओं की शिनाख्तगी में कतई नहीं खुलता । अपने संपूर्ण अर्थों में वह विकास का नहीं, प्रजातंत्रिक कमियों की आड़ में प्रजा-विनाश का हथियार है । वह प्रजातंत्र की अड़चनों के बरक्स कथित वैकल्पिक व्यवस्था के लिए हिंसात्मक सोच मात्र है । आज के नक्सलवाद का सिर्फ़ यही मायने हो सकता है । कम से कम यह छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का सच तो है ही । नक्सलवाद के पक्ष में भले ही कुतर्कों के लाख पहाड़ खड़े कर दिये जायें, वे और उसके संकुल के पैरवीकार भले ही विश्व को समझाने के लाखों पाठ रच डालें, फिलहाल नक्सलवाद की संपुष्टि हिंसा और मानव अधिकार के संपूर्ण ध्वस्तीकरण में हो रही है । दंतेवाड़ा के टेटतराई गाँव में बीते दिन जो घटा है, उससे साबित हो गया है कि नक्सलवादियों का लक्ष्य टूटे, बिखरे, उखड़े और कराहते लोगों के लिए सामाजिक न्याय की लड़ाई नहीं केवल मूढ़ हिंसात्मक प्रतिशोध, अपने वर्चस्ववादी कुविचारों को मारकाट के बल पर सत्य साबित करना है । उनका एकमात्र लक्ष्य प्रजातंत्र के सुघड़ आवासों को मटियामेट करना है


पिछले दिनों ऐर्राबोर थाना क्षेत्र के टेटतराई गाँव में 150 वर्दीधारी क्षुब्ध नक्सली जा धमके । गनीमत कि ग्रामीण आदिवासियों को पहले घरों से बाहर हँकाला गया फिर उनमें आग लगा दी गई । देखते ही देखते 40 से अधिक घर स्वाहा हो गये । निर्दोष, निरीह और बूढ़े आदिवासी सजल आँखों से अपने आशियानों को धू-धू करके जलते देखते रहे । राहत कैंपों में रहते-रहते उन्हें अपने घर-कुरिया की याद जो खींच ले आयी थी । वे दो-चार दिन देखभाल कर सलवा जुडूम कैंप लौट जाने के लिए वहाँ पहुँचे थे । उन्हें क्या पता था कि नक्सली खौफ़ पैदा करने की दुष्कर्म-निरंतरता में वहाँ एकाएक आ धमकेंगे । वे न तो उनका प्रतिरोध कर सके, न विनती । करते भी कैसे ? नक्सलियों के कान जो नहीं होते । कभी गरीब, पीड़ित, आदिवासियों और शोषितों को आँखों का तारा कहने वाले नक्सली अब चक्षुविहीन जो हो चुके हैं । दरअसल वे हैं ही हृदयरहित । आदिम और धूल-धुसरित प्राचीन पत्थरों की मानिंद । फिर भी उनके बुदबुदाते होंठों से धन्यवाद ज्ञापन के शब्द ही फूटे - हे आँगादेव! आशियाने जल गये तो क्या हुआ, जान तो बच गई । अब इन बूढ़े आदिवासियों की आँखों में राख और सिर्फ राख की ढेरियों का एक दुःस्वपन ही शेष रह गया है जिसकी कचोट वे ताउम्र झेलते रहने विवश हैं । हाँ, जिन घरों के इर्द-गिर्द कभी आदिम जिंदगी खिलखिलाती थी अब वहाँ राख ही तो बिखरा पड़ा है जिसे बस्तर की हवायें चारों ओर उड़ा-उड़ाकर कलुषित मनुष्य का मुँह चिढ़ा रही हैं ।



वहाँ केवल घर ही नहीं जला । सरल आदिजनों का सरल-तरल मन भी जल गया । घर तो दूसरा भी गढ़ लिया जायेगा । पर पहले घर की बेशर्म दुष्स्मृतियाँ पीछा नहीं छोडेंगी अब कभी । उन्हें एक-एक कर याद आता रहेगा – नींव खोदते समय का आदिम गीत । वर्षा-शीत-घाम को झेलने वाले घास-फूँस को काट-छाँट कर जुटाने का श्रम । छप्पर-छाजन में हाथ बटाते बीबी-बच्चों के चेहरों पर लुढ़कते पसीने की चमकती बूँदें । कोने में कुलदेवता के ऊपर सजे हुए अक्षत और जंगली फूल । दीवालों पर सजीं धान-बालियों की झालरें । पूरखों की माखुर डिब्बी । चोंगी सुपचाने का चकमक पत्थर । इर्द-गिर्द दाना चुगती उन्मुक्त मुर्गियाँ । घर के पिछवाड़े में मेमनों की कुलाँचे । प्रियतम से पहली बार मिलने का अवसर देने और जीवन-भर साथ निभाने के संकल्पों का पाठ पढ़ाने वाला वह पवित्र ठौर घोटूल । क्या वे दीवार में तब्दील होते मिट्टी के प्रत्येक लोंदे पर अपनी हाथों के निशान को भुला सकेंगे? क्या वे घर रचने की आश्वस्ति का चरम उमंग भूला सकेंगें ? कुरिया का जलना एक संपूर्ण संसार का जल जाना भी है । कैसे कह दें कि उनका घर केवल जंगल, झाड़ी, नदी, पहाड़ ही थे ? कैसे कह दें कि उनका घर, घर के भीतर नहीं था, घर के द्वार से बाहर ही शुरू होती थी उनकी दुनिया । उनका घर सभ्य दुनिया की नज़रों में केवल घास-फूँस से निर्मित कुरिया था, पर वही उनका राजप्रासाद था । जहाँ वे अपनी प्राकृतिक सभ्यता को अंकुठ और निरंतर बनाये रखते थे ।



आज घर फूँकने की सुर्खियाँ सर्वत्र हैं । सुर्खियों में उनके मन जलने की बात गायब है । सरकारी विज्ञप्ति की तरह शुष्क और संवेदनाहीन । वैसे सरकारी कारिंदों का कथन है - टेटतराई में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई । गोया जन-हानि ही समाचार हो । धन्य है अहमन्य तंत्र । चीज़ों को तदर्थ एवं राजनीतिक चश्मों में देखने की आदी दुनिया भी विमर्श में मशगूल है पर वहाँ स्वप्नों के उजाड़ पर भावनात्मक सोच एक सिरे से नदारद है । मानववादिता के नाम पर गुलछर्रे उड़ाने वाली संस्थाएँ, बुद्धिजीवी, विचारक किसी दूसरे मूर्गे की फ़िराक में हैं । बस्तर के निष्कलुष आदिवासियों पर नक्सली खौफ़ और शोषण को इशु बनाने के लिए कोई प्रेरक प्रायोजक भी तो नहीं उनके सम्मुख। उनके वोट के भरोसे सत्ता और सुख का स्वाद चखने वाले पहरुए फ़िलवक्त इस उधेड़बुन में हैं कि नये सिरे से उनके लिए मकान बनाने का सरकारी ठेका कैसे अपने कारिंदों को दिलाया जा सके । आख़िर संवेदनाहीन हितचिंतकों को कैसे प्रभावित कर सकता है यह खबर कि पहले घर के उजड़ने का घाव कोई नहीं भर सकता । न सरकारी अनुदान, न कैंप ।
उनके अपने भाई-बंधु भी मौन हैं । विवश हैं । प्रश्नाकुल हैं । आख़िर उनका दोष क्या था ? यही कि वे हितवर्धन के नाम पर उनके नव-शोषकों की हिंसा और आंतक से मुक्ति क्यों चाहते हैं। यही कि वे शोषकों के खिलाफ लामबंद आंदोलन के विश्वासी क्यों हैं । या फिर यही कि वे प्रजातांत्रिक व्यवस्था वाली असरकारी बहुमत का साथ क्योकर दे रहे हैं ? यानी उन्हें अपनी प्राणरक्षा का भी अधिकार नहीं । वे नक्सली और तथाकथित हितैषियों (किन्तु प्रजातंत्र की बाड़ों को तोड़ने की आदी हो चुकी उच्छृखल ताकतें) के द्वैध को समझ नहीं पा रहे हैं कि वे किस मुँह से उनके पक्ष(?) में न्याय की गुहार लगा रहे हैं कि आदिवासियों के हाथों हथियार नहीं दिया जाना चाहिए । अर्थात् अराजक नक्सली हथियार उठा सकते हैं उनके गुलाम नहीं । वे उन माध्यम-दोहकों की भंगिमा को भी भली-भाँति बाँच नहीं पा रहे हैं, जो नक्सली के एकाध बौद्धिक पक्षधरों की संदिग्धता की व्यवस्थागत पुष्टि के बावजूद भी हो-हल्ला मचाके विश्व भर में उसे मानवअधिकार का हनन घोषित करवा लेते हैं पर त्रस्त आदिवासियों के मन की थाह नहीं लगाना चाहते हैं । आख़िर नक्सली कैसे हितैषी हैं आदिवासियों के ?



आदिवासियों की अच्छी बसाहट की फ़्रिक्र किसे रही है ? आजादी के छः दशकों के परिदृश्य इसकी गवाहियाँ देती हैं कि उन्हें ऐसा ‘एकतरफा वोट-बैंक’ माना जाता रहा है जहाँ हर कोई नकदीकरण तो कर सके, किन्तु जिसके लिए कुछ भी ज़मा करने की कोई ज़रूरत न हो । इससे ज़्यादा कोई बखत हमने उन्हें दी है क्या ? सच तो यह भी है कि विकास गढ़ने वालों ने शुरू से ही उसके घर-द्वार के गद्य को दुरुस्त करने के लिए पश्चिमी सौंदर्यशास्त्रों का सहारा लिया । कभी यह पढ़ने की कोशिश नहीं की गई, कि उनकी भाषा में विकास के लिए व्याकरणिक पदबंध क्या-क्या हैं ? उनकी लंगोटियों की पैबंद की सौगंध खाने वाले सत्ता , जुड़े लोग और उनके हिस्सों पर पलने वाले असरकारी नौकरशाह यानी शक्तिसाली परजीवी सब पर यह जुर्म दर्ज ही है । आदिवासियों पर अब तक शासकीय मद से किया गया खर्च यदि जोड़ा जाय तो देश का हर आदिवासी करोड़पति को हो ही सकता था । पर ज़मीनी हक़ीकत उसके पास सिर्फ़ एक लंगोटी ही है । इतना ही नहीं दशकों से उनके नाम पर बड़ी-बड़ी दुकानें सजाने वाले गांधीवादी सामाजिक संगठन भी किसी प्रायवेट लिमिटेड की तरह निर्बाध फल-फूल रही हैं । बात सिर्फ़ इतनी होती तो चिंता नहीं थी । स्वयं उनके मध्य से उभरता नेतृत्व या तो पदलोलुप है या फिर वह जानबूझकर उस वर्ग को वहीं अटकाये रखना चाहता है ताकि उसे संविधानप्रदत्त विशेष सुविधाओं को हड़पने में किसी संवर्गीय चुनौतियों का सामना न करना पड़े । अपनी धवलता के बीच आरक्षण का कृष्णपक्षीय चरित्र ऐसी वास्तविकताओं को प्रमाणित करती हैं । इसे कौन झूठला सकता है कि आरक्षण सुविधा से रहित और समाज के सक्षम जातियों के मन में भी इनके प्रति स्थायी द्वेष पनपता रहा है । इनके मध्य उभरता नव संभ्रातवर्ग अभी भी अपनी जातीय अस्मिता के संपूर्ण रक्षार्थ सचेत नज़र नहीं आता जिसकी ओर अनुनय मुद्रा में आदिवासी समाज टुकुर-टुकुर निहार रहा है ।

Friday, January 04, 2008

चिट्ठेकारों, तकनीकिविदों, जाल स्थल विशेषज्ञों, संपादकों से आग्रह

“अंतरजाल, ब्लॉग और साहित्य”
संपादित कृति हेतु आलेख-संदर्भ आमंत्रण


मित्रो !

अंतरजाल में हिंदी के विकास और उन्ननयन हेतु अब तक उपलब्ध तकनीक, हिंदी भाषा, साहित्य, संचालित जाल स्थल, साहित्यिक चिट्ठों(blogs) पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण शोध कृति का लेखन-संपादन किया जा रहा है । यद्यपि मेरा लेखन कार्य अंतिम चरणों पर है तथापि मैं इसे संपूर्ण नहीं मानता क्योंकि सर्वज्ञता हासिल करना कठिन है सबको समेट पाना दुष्कर है और दिन-प्रतिदिन अंतरजाल पर नयी सुविधायें भी बढ़ रही हैं । और उधर नये चिट्ठेकार भी अंतरजाल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं । ऐसे में मैं ज़रूरी समझता हूँ कि अंतरजाल पर सक्रिय विद्वास और सक्रिय साथी से क्यों ना एक बार आग्रह कर लिया ताकि उनके पास संचित जानकारी को भी इसमें हिंदी के पाठकों खासकर साहित्यकारों के लिए समायोजित किया जा सके । और अपनी अद्यतन जानकारी की भी पुष्टि हो सके-

स्पष्ट है कि इस किताब का मुख्य विषय वस्तु निम्नांकित है –

1. हिंदी लेखन, अन्य कार्यों को समर्थन देने वाले समस्त साधन (तकनीक-साफ्टवेयर)

2. भविष्य में अंतरजाल पर हिंदी लेखन सहित अन्य समस्त साधनों की संभावना ।

3. हिंदी साहित्य को गति देने वाले प्रमुख चिट्ठों, विषय वस्तु आदि का संक्षिप्त विवरण ।

4. हिंदी ब्लॉगों की विषय वस्तु और उनके चिट्ठाकारों की संक्षिप्त जानकारी ।

5. हिंदी ब्लॉगिंग के विकास में उपयोगी एग्रीगेटर और उनकी संक्षिप्त जानकारी ।

6. हिंदी ब्लॉगिंग की सामान्य समस्यायें ।

7. हिंदी ब्लॉग पर प्रमुख मार्गदर्शकों की संक्षिप्त जानकारी ।

8. हिंदी साहित्य के प्रमुख जाल स्थल ।

9. हिंदी के सभी प्रकार के जाल स्थल, उनकी उपयोगिता(अब तक ज्ञात)-शासकीय, निजी, संस्थागत ।

10. अन्य सम्यक् जानकारी एवं मूल्याँकन

11. प्रमुख रचनाकारों के ब्लॉग संबंधी लेख

कुल मिलाकर यह -
1. हिंदी हेतु उपलब्ध या संभावित तकनीक,
2. ब्लॉग और संचालित जाल स्थल और
3. ब्लॉग तथा जाल स्थलों पर अब तक स्थापित हिंदी साहित्य के मूल्यांकन पर अभिकेंद्रित होगा ।

मैं यह कार्य सर्च इंजन के सहारे ही पूरा कर रहा हूँ परंतु मुझे आप पर अधिक भरोसा है । आपसे आग्रह है कि आप निःसंकोच अपने कोश-स्मृति में सुरक्षित जानकारी मुझे भेज सकते हैं ताकि उन्हें भी यथोचित स्थान पर जोड़ा जा सके । मैंनें ऐसे सभी सूचनाओं का संदर्भ बाकायदा उनके नाम सहित दिया है फिर भी नयी जानकारी देने वालों का संदर्भ यथोचित स्थल पर समायोजित किया जा सकेगा ।

अपनी जानकारी में संचालित साइट व ब्लॉग के बारे में भी संक्षिप्त टिप्पणी भेज सकते हैं ।

आपसे प्राप्त जानकारी को समायोजित करने के पश्चात इस पांडुलिपि-कृति को ऑनलाइन रखने का भी प्रयास किया जायेगा ।

यह जटिल कार्य मूलतः 16-17 फरवरी 08 को होने वाले अखिल भारतीय साहित्य महोत्सव के लिए तैयार किया जा रहा है ताकि उक्त अवसर पर उपस्थित देश-विदेश के साहित्यकारों को यह कृति दी जा सके । उन्हें अंतरजाल पर हिंदी लेखन/साहित्य-लेखन से जोड़ा जा सके । क्योंकि अभी भी दूरदराज के लेखक अंतरजाल सुविधा के बावजूद भी हिंदी और साहित्य को वैश्विक बनाने में संलग्न नही है ।

(आयोजन के बारे में विस्तृत जानकारी हेतु देख सकते हैं) -
- टिप्पणी, आलेख, संदर्भ भेजने का पता -
srijan2samman at gmail.com
तिथि
आपकी सुविधानुसार पर शीघ्रातिशीघ्र

Monday, October 22, 2007

इंटरनेट पर नक्सलवाद के खिलाफ़ पहला वैचारिक फोरम

वेब-भूमि-10

लुकीज़ क्या बला है ?
पिछले दिनों मेरे नाम छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश से एक मित्र का ई-मेल आया । उनकी समस्या है कि वे हिंदी में टाइप करना नहीं जानते किंतु चाहते हैं कि अपने रिश्तेदार को, जो इन दिनों जापान में किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी करते हैं, हिंदी में मेल करें । यानी कि उन्हें ऑनलाइन संवाद करने की कोई तकनीक चाहिए । शायद यही समस्य़ा आपकी भी हो तो चलिए इस बार हम ऐसे ही एक नये औजार या टूल्स के विषय में चर्चा करते हैं जो मेरे मित्र जैसे कई लोगों की समस्या का निदान हो ।


लूकीज़ वह सॉफ्टवेयर है जो इस समस्या का हल है । यह पूर्णतः मुफ़्त है । यानी कि इसे आप बिना किसी खर्च के डाउनलोड़ कर सकते हैं । इसे अपने कम्पयूटर पर इंस्टाल करके प्रतिष्टित कर लेने पर आप बड़ी सरलता से बिना टायपिंग जाने भी हिंदी में ई-मेल कर सकते हैं । चैटिंग कर सकते हैं । कुल मिलाकर यह एक ऑनलाइन शब्द संवाद की सुविधा मुहैया कराने वाला ऐसा उपकरण है जिसे हम ऑनलाइन संवाद भी कह सकते हैं । इतना ही नहीं यह ऑफलाइन टायपिंग कार्य भी करता है- वह भी सिर्फ़ हिंदी भाषा की देवनागरी लिपि में नहीं अपितु अंगरेज़ी सहित बांग्ला, तेलगू, मराठी, तमिल, गुजराती, कन्नड़,
मलयालम एवं पंजाबी भाषाओं का समर्थन भी है उसे ।

लूकीज मूलतः भारतीय भाषाओं का सॉफ्टवेयर है जो कि चैट,ई-मेल एवं ऑन लाईन शब्द सम्वाद प्रदान करता है, वह भी आश्चर्यचकित वास्तविक की बौर्डों के साथ। कहने का आशय है कि आपके कंप्यूटर स्क्रीन में ऐसा मार्गदर्शक की बोर्ड खुलता है जिसमें अंकित शब्द कुंजी को दबा-दबाकर आप हिंदी या अन्य किसी भारतीय भाषा में टाइप कर सकते हैं । माना कि आपको संजय द्विवेदी टाइप करना है तो आपको इन अक्षरों के की-बोर्ड पर मात्र क्लिक करते जाना है । आप जिन-जिन बटनों या की बोर्ड पर क्लिक करते जायेंगे वैसे-वैसे शब्द या वाक्य आपके द्वारा खोले गये वर्ड फाइल में अंकित होता चला जायेगा । इसे आप सेव या सुरक्षित भी रख सकते हैं । और जब चाहें अपना संदेश या लेख किसी वेब पत्रिका को भेज सकते हैं । है ना जादू । तो चलिए फटाफट इंटरनेट जोड़ कर अपना मुफ्त लूकीज़
तुरंत डाउनलोड करें। लूकीज़ ऑन लाईन आपकी मनपसंद इंटरनैट वैबसाईटों, ई-मेल एवं चैट्स को भारतीय भाषाओं के अनुरुप ढाल देगा। इसे आप www.keyboard4all.com/ नामक वेबसाइट से डाउनलोड़ कर इंस्टाल कर सकते हैं ।

गूगल सबसे बड़ी मीडिया कंपनी
सभी को पता ही है कि सर्च इंजन गूगल पर संभवत: हर तरह की जानकारी खोजी जा सकती है । इंटरनेट पर उपलब्ध तकरीबन हर तरह की जानकारी खोज निकालने वाला सर्च इंजन 'गूगल' दुनिया की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी बन गया है । स्टॉक मार्केट के आकलन के मुताबिक गूगल ने बाकी सभी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को पीछे छोड़ दिया है और उसके शेयरों की कीमतें लगातार बढ़ती ही जा रही हैं । पिछले दिनों न्यूयार्क स्टॉक बाज़ार में गूगल के शेयरों की क़ीमत 80 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी । यह राशि सबसे बड़ी मीडिया कंपनी मानी जाने वाली टाइम वार्नर के शेयरों की कीमत से दो अरब अधिक थी । हालांकि गूगल की सालाना बिक्री टाइम वार्नर के मुक़ाबले बहुत अधिक कम है। गूगल को सालाना 3.4 अरब डॉलर की आय होती है जबकि टाइम वार्नर को सालाना 42 अरब डॉलर की आय होती है । कुछ जानकारों का मानना है कि गूगल के शेयरों की क़ीमत कुछ ज्यादा रखी गई है और ऐसा 1990 के दशक में इंटरनेट क्रांति की शुरुआत के दौरान भी हुआ था । अन्य लोग मानते हैं कि गूगल के शेयरों की बढ़ती कीमत दर्शाती है कि आने वाले दिनों में गूगल कितना आगे जा सकती है. कहा जा रहा है कि आने वाले समय में गूगल के एक शेयर की कीमत 325 से 350 डॉलर तक हो सकती है । गूगल ने दस महीने पहले ही पब्लिक कंपनी के तौर पर व्यापार करना शुरु किया था और इसी अरसे में मीडिया कंपनियों में उसकी स्थिति सबसे मज़बूत हो गई है । पिछले कई सालों से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही कई मीडिया कंपनियां मसलन वाल्ट डिज़नी और वायकॉम से कहीं आगे निकल गई हैं । गूगल ने पिछले साल अगस्त में जब अपने शेयरों को बाज़ार में उतारा था तो इसके एक शेयर की क़ीमत 85 डॉलर थी । गूगल की अधिकतर आय उसके सर्च इंजन पर प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों से होती है ।


नक्सलवाद के विरोध में देश का पहला वेबसाइट तैयार –
इन दिनों छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर के शिविरों में भले ही आदिजन कुव्यवस्था के शिकार हों । भले ही सलवा जुडूम के कर्ता-धर्ता अपने स्वार्थ से नक्सलवाद का विरोध करते हों पर पूरे विश्व में पहली बार हिंसावादियों के खिलाफ शुरू हुए आदिवासियों की इस पहली क्रांति की वैचारिक ज़मीन तैयार करने के लिए एक वेबसाइट शुरू हो चुकी है । जहाँ सलवा जुडूम आंदोलन से जुड़ी सम्यक बातें पढ़ी जा सकती हैं । इस पहल के लिए वेब साइट के संपादक सद्भावना समिति, रायपुर के तपेश जैन की भूमिका का जिक्र किया ही जाना चाहिए जिसे अंतरजाल पर
www.salvajudum.com में लॉग ऑन कर देखा-परखा जा सकता है । इसे नक्सलवाद के खिलाफ देश का पहला वैचारिक और बौद्धिक फोरम कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी । इस स्वयंसेवी प्रयास के लिए सद्भावना समिति को भी बधाई । बधाई इस बात की भी कि हिंदी के विविध विषयों पर जाल स्थलों की संख्या भी बढ़ रही है ।

Tuesday, October 16, 2007

पासवर्ड को हैकर्स से बचानेवाला नायाब सॉफ्टवेयर

वेब-भूमि-9

स्मरणशक्ति भी बड़ी नायाब चीज़ होती है । कब साथ छोड़ दे, कह नही सकते । कई बार कम्प्यूटर और इंटरनेट उपयोग कर्ता अपना आईडी और पासवर्ड ही भूल जाया करते हैं । नेट पर विभिन्न तरह के कार्य से लेकर मात्र ई-मेल का उपयोग करने वाले सामान्य से सामान्य यूजर्स भी चाहता हैं कि उसके स्वयं का आईडी और पासवर्ड्स कोई याद रख दे । इतना ही नहीं कुछ लोग अपनी कमजोरीवश हैकर्स से डरते रहते हैं कि कहीं उसका अपना पासवर्ड भी हैकिंग न हो जाये । अक्सर जब कोई बुनियादी और आवश्यक निजी जानकारी उसे संबंधित साइट के फार्म में भरना होता है तो आलस्य का अनुभव करने लगता है और सिर खुजलाने लगता है । ऐसी बहुत सारी दिक्कतों से मुक्ति दिलाने का काम अब तकनीक ने संभव कर दिखाया है । न पासवर्ड याद रखने की कवायद न ही किसी लम्बे फार्म को भरने का सिरदर्द । ऊपर से पासवर्ड और आईड़ी को हैंकर से बचाने की पूर्णतः सुरक्षा का उपहार भी । यह सारी दुनिया में रोबोफार्म के नाम से जाना जाता है ।

रोबोफ़ार्म की प्रसिद्धि के बारे में इतना ही जान लेना काफ़ी है कि उसके लांच होने के कुछ ही दिन के भीतर ही इसे दुनिया भर के उपयोगकर्ताओं द्वारा 8 मिलियन से ज्यादा बार डाउनलोड़ किया जा चुका है। सिर्फ़ इतना ही नहीं, रोबोफार्म PC Magazine Editor's Choice और CNET Download.com's के द्वारा सॉफ्टवेयर ऑफ ईयर की प्रतिष्ठा भी अर्जित कर चुका है । इसका मुफ्त वितरण और स्पाईवेयर और एडवेयर यानी कि अवांछित वायरस से मुक्त होना उसकी लोकप्रियता की खास वज़ह जो है ।

रोबोफार्म सबसे अच्छा पासवर्ड मैनेजर और वेब फार्म फिलर है जो पूरी तरह से अपने आप पासवर्ड और फार्म भर देता है। आइये इसके बारे में विस्तार से जानते हैं । रोबोफॉर्म
याद रखता है आपके पासवर्डस् और लॉग करवाता है आपको वह भी अपने आप। यानी कि स्वचालित । यह लम्बे रजिस्ट्रेशन और चेकऑउट फार्मों को सिर्फ एक क्लिक भर देता है । आपके पासवर्डों को पूर्ण सुरक्षा देने के लिए एंक्रिप्ट करता है । बेतरतीब पासवर्डों को जनरेट करता है ताकि कोई भी हैकर उसका अनुमान ही न लगा सके । यह फिशिंग से भी लड़ता है अर्थात् सिर्फ मेल खाती हुईं वेब साइटों पर पासवर्डों को भरते हुए। पासवर्डों को कीबोर्ड के बिना ही टाइप करते हुए कीलॉगर्स को हराता है । आपके पासवर्डों को, कम्प्यूटरों के बीच में कॉपी करते हुए बैकअप करता है। रोबोफॉर्म सिंक्रनाईज़ करता है पासवर्डों को कम्प्यूटरों के बीच में गुडसिंक का प्रयोग करते हुए। इसकी खासियत यह भी है कि यह इंटरनेट एक्सप्लोरर्, AOL/MSN, फायरफॉक्स जैसे बहुप्रयुक्त ब्राउजर के साथ तटस्थ: काम करता है । यदि आप तैयार हैं तो यह लीजिए पता - www.roboform.com/hi/ । लॉग ऑन होइये तो चंद मिनटों में ही ढ़ेरों समस्याओं से मुक्त हो उठिये । संशय मत करिये कि आपको ज़्यादा अँग्रेज़ी नहीं आती । यह साइट अपनी भाषा में भी है ।

चलते-चलते
रिश्वतखोरी विश्वव्यापी समस्या है । विचारक, नेतागण, पत्रकार, साहित्यकार के साथ-साथ आम आदमी भी आये दिन इससे मुक्त होने के लिए भाँति-भाँति का परामर्श देते हैं । अब कुछ ट्रेक्नोक्रेट भी इस विश्वव्यापी दानव से जूझने का मन बना चुके हैं । ऐसा लगता है उनके द्वारा सुझाये गये उसे नये उपाय को देखकर । उन्होंने प्रौद्योगिकी का सहारा लेते हुए एक नया रास्ता खोज निकाला है । संक्षेप में कहें तो ग्लोबल ऐंटी करप्शन वेबसाइट अब दुनिया भर के भ्रष्ट्राचार निवारण के लिए लांच हो चुका है ।

वॉशिंगटन के कुछ कंपनियों के एक समूह ने ऐसी वेबसाइट शुरू की है जो दुनिया भर के रिश्वतखोर अफसरों और सरकारों का ब्यौरा रखेगी। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एक गैरलाभकारी समूह ट्रेस इंटरनैशनल ने कहा कि उनकी नई वेबसाइट ब्राइबलाइन डॉटओआरजी में लोग या संगठन अपना नाम जाहिर किए बिना ही रिश्वत मांगे जाने संबंधी शिकायत कर सकेंगे। अमेरिका स्थित ट्रेस इंटरनेशनल ने कहा कि उसका इरादा लोगों के नाम एकत्र करना नहीं बल्कि रिश्वत देने और लेने वालों को समझना, मामलों की जाँच करना और फिर कानूनी कार्रवाई करना होगा। लोग रिश्वत माँगे जाने की शिकायत एक ऑनलाइन फार्म के जरिए कर सकते हैं। ब्राइबलाइन साइट पर उपलब्ध इस फॉर्म में 10 सवाल होते हैं।

जो भी हो इससे भले ही रिश्वतखोरी पर प्रत्यक्षतः लगाम नहीं लगया जा सकता परंतु उसे विश्वव्यापी अपमान का भागीदार तो सिद्ध ज़रूर किया जा सकता है। प्रौद्योगिकी और विश्वग्राम की वर्तमान जीवनशैली में यह भी कम दंड़ नहीं है और हम जानते हैं ही हैं, समाजशास्त्रीय सच भी है कि अपमान बहुत बड़ा सामाजिक नियंत्रण है ।