Wednesday, November 26, 2008

सिपाही क्यों नहीं लिख सकता कविता ?

भाग-
कई बार लगता है कि उन लोगों की कोई नोटिस नहीं लेना चाहिए जो ये नहीं समझते कि वे कह क्या रहें है ? कर क्या रहे हैं ? क्यों कह रहे हैं ? क्यों कर रहे हैं । उनके ऐसे करने का क्या अंजाम हो सकता है । ऐसे लोगों को कई बार मन और मनीषा दोनों ही नकार देती है कि कौन उलझे मूर्खों से । शास्त्रों में भी कहा गया है कि उपेक्षा सबसे बड़ा अपमान है । पर यहाँ प्रसंग अपमान का नहीं है । न ही किसी के अपमान या निंदा मेरा उद्देश्य भी । वैसे ऐसे लोग सर्वथा इतने अंहकारी होते हैं कि उन्हें ऐसा करने, कहने से नहीं रोका जा सकता । दरअसल वे ऐसा इसलिए नहीं करते, कहते या लिखते क्योंकि वे ऐसा कहने का अधिकार रखते हैं या उनमें इतनी नैतिक शक्ति होती है कि ऐसा वास्तविक में कर सके । ऐसे लोग दरअसल अपने मन की क्षुद्रताओं के शिकार होते हैं । सच कहें तो ऐसे लोगों के पास आईना ही नहीं होता, जिसे हम ज़मीर कहते हैं । जिस पर किसी दार्शनिक ने भी कहा है कि औरों के साथ वही करें, जो आप अपने लिए सह्य मान सकते हैं । और यह सब एक पढ़ा-लिखा आदमी, जिसे सभ्य, विचारवान, आदि संज्ञाओं से भी विभूषित कर सकते हैं, जानता भी है; पर अपने जीवन में उतारता भी नहीं है । तो आख़िर ऐसे लोगों को मूर्ख, अहंकारी, शैतान की श्रेणी में क्यों ना रखा जाये । वैसे अनौचित्य कहने, करने, लिखने और कुछ हद तक जीने वालों से यह दुनिया पटी पड़ी है ।

उडिया भाषा में एक कहावत चलता है – जाणू जाणू न जाणू रे अजणा । मतलब इसका यही है कि जानबूझकर भी नहीं जानना । शायद इन्हीं लोगों के लिए हमारी संस्कृति में पशु शब्द प्रयुक्ति की पंरपरा है । पशु के पास चेतना नहीं होती । अन्यथा वह सब कुछ होती है जो मनुष्य के पास होती है । चेतना के कारण ही मनुष्य पशु से भिन्न है ।

पर यहाँ तो प्रसंग कुछ अलग है । उसे बिना नोटिस लिये भी ठीक किया जा सकता है । उपेक्षा करके । पर उसकी उपेक्षा उस तरह की नहीं होगी जैसै हम कभी-कभी अपने किसी अल्पबुद्धि वाले भाई, बहुत छोटे बेटे या मूढ़ मित्र की उपेक्षा इसलिए कर देते हैं कि उसे मौक़ा देखकर कभी भी ठीक किया जा सकता है ।

तो आइये आपको प्रसंग के मूल में ले चलूँ जिसमें राज्य के किसी युवा नागरिक को किसी व्यक्ति की स्वीकृति कवि के रूप में नहीं चाहिए । उस नागरिक को सिर्फ़ एक सिपाही चाहिए । यानी कि कोई सिपाही है और कविता लिखता है तो उससे उसकी कोई दिलचस्पी नहीं । इतना ही नहीं उसे इतना अंहकार है कि वह उसकी कविता कर्म पर बड़े ही अपमान जनक ढंग से कवितायी (?) शिल्प में लिखता भी है कि वह उसे कवि के रूप में अपना नहीं सकता । वह एक सिपाही के बतौर ही उसे अपना सकता है ।

आप भी शायद ऐसे अनर्गल, बेबुनियाद पर बसर करने वाले वाक्-वीर जिसे अपनी अल्पज्ञता पर भी लाज न आये पर तरस खायें । यदि आप उन महानुभाव जैसे ही हों तो मुझे आपसे कोई अपेक्षा नहीं ।

पर मैं जानता हूँ कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति इतना अनपढ़ नहीं, इतना विवेकहीन नहीं जो यह कह दे कि सिपाही को कविता नहीं लिखना चाहिए । कविता के लिए व्यवसाय निर्धारण की यह कौन-सी मनुस्मृति है जो यह घोषित कर दे कि अमूक को कविता नहीं लिखना चाहिए और अमूक को लिखना चाहिए । दरअसल यह मध्यकालीन मानसिकता का परिचायक है जिससे हमारा अंतःकरण मुक्त ही नहीं हो सका है या नहीं होना चाहता है ।

ऐसा उद्-घोष करने वाला युवा चाहता है कि ऐसा सिपाही कितना बड़ा कवि क्यों ना हो, कितनी सार्थक रचना क्यों ना करता हो, मानवता की कितनी गंभीर लड़ाई लड़ता क्यों ना हो रचनात्मक स्तर पर, किन्तु ऐसे रूप में उसे समाज नहीं स्वीकार सकता । भई क्यों नहीं स्वीकार सकता ? क्या सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगाया है ? क्या आपके संविधान में उसकी मनाही है ? क्या उस सिपाही का मन नहीं है ? क्या कानून के पास हृदय ख़रीदने की औका़त है ? क्या उस सिपाही के चौबीसों घंटे सिर्फ़ और सिर्फ़ आप जैसे सिरफिरे और नासमझ युवाओं की हरकतों पर निगरानी रखने और उसे रोकने के लिए हैं ? और यदि ऐसा है तो फिर आप कब यह भी ना कह दें कि उस सिपाही को मुक्त हवा में साँस नहीं लेना चाहिए । स्वप्न नहीं देखना चाहिए । यथार्थ को चुपचाप आँखें बचाकर नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए या उसके विरूद्ध संघर्ष नहीं करना चाहिए । जैसे संघर्ष मन से नहीं केवल लाठी, बल्लम, भाला, त्रिशुल, बम, बारूद या तोप से ही किया जाना चाहिए.... । और यदि संघर्ष की यही परिभाषा सर्वमान्य है तो फिर आख़िर क्यों ऐसे अस्त्र-शस्त्र के रहते मानव संघर्ष पर विराम नहीं लगता, नहीं लग सका ?
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर किसने कह दिया कि सिपाही नहीं लिख सकता कविता... फिलहाल तो इतने पर बात ख़तम करना चाहता हूँ बाक़ी अगली बार...
क्रमशः......

Tuesday, November 25, 2008

नक्सलवादी हथियार पाते कहाँ से हैं ?


हमारे एक मित्र हैं - चाँद शुक्ला । कोपेनहेगन, डेनमार्क में रहते हैं । वैसे वे कपूरथला के रहने वाले हैं । काम तो एक्सपोर्ट-इंपोर्ट का करते हैं पर मैं उस चाँद शुक्ला की बात कर रहा हूँ जो हदियाबादी के नाम से लिखते-पढ़ते हैं । दरअसल वे नहीं चाहते कि लोग उन्हें एक व्यापारी के रूप में जाने । उनकी पहचान विश्व समाज को जोड़ने वाले एक संयोजक के रूप में है । अनकेता मे एकता को वे इंटरनेट के माध्यम से सिद्ध कर रहे हैं । वे रचनात्मकता को उसके आक्षरिक रूप में नहीं वरन् उसके ध्वनि रूपों के वैश्विक प्रचार और संस्थापना में संलग्न हैं – रेडियो संबरंग के माध्यम से । शायद इस विश्वास के साथ ही कि शब्द ध्वनिमयता के साथ ही अर्थवान है और यह एक हद तक सच भी है । लिखे हुए अक्षर निर्जीव होते हैं, निराकार होते हैं । उनका रूप, सौंदर्य और प्रभाव तभी स्पष्ट होता है जब वे उच्चरित होते हैं, ध्वनिमय होते हैं। क्योंकि शब्दों का किताबों, कागजों पर होना एक तरह से शब्दों का सुषुप्तावस्था में होना है । शब्द तभी जागते हैं जब वे व्यवहार में आते हैं । शब्दों का फूल ध्वनि का साथ पाकर ही फूलता है । आप भी उनके जाल स्थल से कभी गुज़रें हों । न गुज़रें तो अभी जा सकते हैं - www.radiosabrang.com/


मित्र के बारे मे और कुछ कहूँ तो यही कि वे सन्‌ १९९५ में डेनमार्क शांति संस्थान द्वारा सम्मानित किये जा चुके हैं । सन्‌ २००० में जर्मनी के रेडियो प्रसारक संस्था ने 'हेंस ग्रेट बेंच' नाम पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है उन्हें । शेरो-शायरी के शौक और जादुई आवाज़ होने के कारण पिछ्ले पन्द्रह वर्षों से स्वतंत्र प्रसार माध्यम 'रेडियो सबरंग' में मानद निदेशक के पद पर आसीन हैं। आल वर्ल्ड कम्युनिटी रेडियो ब्राडकास्टर कनाडा (AMARIK) के सदस्य हैं ।


तो शुक्ला जी बड़ी बेचैनी के साथ मुझे पूछ रहे थे – आख़िर छत्तीसगढ़ सहित देश भर में हिंसा का तांडव मचानेवाले नक्सलवाद हथियार पाते कहाँ से हैं ?


मैंने कहा – शुक्लाजी, इस पर मतभेद हो सकता है । मेरी बात पक्षधरों को हज़म नहीं हो सकती । कदाचित् कुछ इसे मानवाधिकार पर भी हमला घोषित कर दें । क्योंकि अब तक का जो इतिहास रहा है उससे साफ़ जाहिर है कि ये सैकड़ों मौतों पर आँसू बहाना तक नहीं जानते, पर नक्सली हिंसा से जूझने वाली व्यवस्था की जाने-अनजाने घटना पर सारी दुनिया में हो-हल्ला मचा देते हैं । दरअसल वे मानवाधिकारवादी हैं ही नहीं । वे मूलतः नक्सलवाद के छद्म प्रचारक और हितैषी भर हैं । यह दीगर बात है कि उन्हें प्रजातंत्र में भारी ख़ामी दिखाई देती है, और जो इतने बड़े देश में संभव नहीं कि सभी तरफ़ प्रजातंत्र के सारे अंग सुचारू रूप से काम करें ही । पर क्या प्रजातंत्र के ख़ात्मे की शर्त पर नक्सलवाद के पक्ष मे भी खड़ा हुआ जा सकता है, जो पता नहीं कितने वास्तविक नक्सलियों का संगठन है और कितने केवल हिंसक आंतक फैलाने वाले गुंडों का । चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने भी शायद यह कभी नहीं कहा था कि जिसके लिए नक्सलवाद है उन्हीं निर्दोषों को ही मौत के घाट उतार दिया जाय । जी, नहीं....


चारू मजूमदार का नाम लेते ही चाँद जी को वह घटना याद आ गई ।

उन्होंने बताया – यही कोई 70 वें दशक की बात होगी । उन दिनों हम सेल्समैनशीप का काम किया करते थे । स्कूलों, कालेजों को किताबें पहुँचाया करते थे । एक दफ़ा उधमपुर के काठिया या साम्बा नामक जगह पर हम ठहरे थे । किसी धर्मशाला में । हम जब धर्मशाला के भीतर बने मंदिर या पानी भरने के लिए या फिर प्रांगण में इधर-उधर आते-जाते तो हमें धर्मशाला मे ठहरे हुए और लोगों से बतियाने, उनसे जान-पहचान बनाने का मौक़ा मिल जाता था ।


यूँ ही एक दिन जनाब मिल गये । पतला छरहरा बदन । आँखों में चमक । व्यक्तित्व से बांग्ला कल्चर से अनुप्राणित । हमने हाय-हैलो की । उन्होंने पूछने पर बताया कि वे पटना के हैं । मेरी जिज्ञासा बढ़ गई – पर आप की भाषा तो बाँग्ला लगती है ? इस पर उन्होंने कहा – हाँ मुझे बाँग्ला भी थोड़ी-थोड़ी आती है । आप करते क्या हैं ? कुछ नहीं यूँ ही घूम-फिर रहे हैं । बात आयी गई हो गई । एक दिन धर्मशाला में अचानक सर्चिंग में पुलिस आ धमकी । मै और मेरे साथी भौचक्के रह गए थे । माज़रा क्या है ? सबसे पहले पुलिस ने मुझे ही तहकीकात के लिए धर लिया । मैंने उन्हें साफ़-साफ़ बताया – भाई साहब, हम ठहरे किताबों के सप्लायर । क्या जाने कि वो कौन थे, क्या करते थे, किससे मिलते थे ? हाँ एक बार उनसे यहीं हाय-हैलो हो गई थी, बस्स । किसी तरह पुलिस से पिंड छुड़ाया ।

दरअसल वे उसी जनाब को तलाश रहे थे जिससे हम मिल चुके थे । वो धर्मशाला के रजिस्टर मे नाम, पता बदलकर ठहरे हुए थे । बाद में पुलिस को पता चला कि दस्तखत और किसी का नहीं चारू मजूमदार का ही है । वे चारू मजूमदार थे ।


बहरहाल......चाँद जी बता रहे थे कि वे देखने से न खूँखार नज़र आते थे न ही मनुष्यता के विरूद्ध किसी अभियान को संचालित करने वाले की तरह । उनके आँखों में एक गहराई नज़र आती थी, कुछ सपने नज़र भी हों जैसे, दलित, दमित, ग़रीब और कमज़ोर लोगों के लिए । और आज जो इनके चेले भारत को ध्वस्त करने पर तुले हुए हैं...... विश्वास नहीं होता ।


तो चाँद जी के मूल प्रश्न पर आते हैं – आख़िर ये हथियार कहाँ से पाते हैं ?
अब मैं ठहरा अदना-सा लेखक । जो दिख जाता है । उसे देख लेते हैं, पर कभी-कभी उसे भी देखने की चेष्टा कर लेते हैं जो दिखाई नहीं दे रहा हो, पर वह ज़रूर हो कहीं न कहीं । आज का नक्सलवाद एक तरह का आंतकवाद है । उद्देश्य है इनका – सिर्फ़ और सिर्फ़ दिल्ली पर कब्जा करना। जैसे पिछले दिनों नेपाल की राजधानी में माओवादियों ने कब्जा किया । माओवाद हिंसक क्रांति के रास्ते पर चलकर व्यवस्था में तब्दीली लाने वाली कोई विचारधारा(?) है । तो भारत और ख़ासकर छत्तीसगढ़ में नक्सलवादियों को जो हथियार, धन और उन्नत प्रौद्योगिकी की उपलब्धता है वह कई रास्तों से मिल रहा है ।


नक्सली बड़े व्यापारियों, नेताओं, अफ़सरों से धन की उगाही करते हैं, बदले मे उनकी जान बख्सते हैं और उनके ऐसे क्षेत्रों में व्यापारिक आवाज़ाही को खुली छूट देते हैं । यानी कि भ्रष्टों की सहायता से ये शक्ति संचित करते हैं । यानी कि इन्हें प्रजातंत्र की सबसे बड़ी बुराई भ्रष्ट्राचार से तो घनघोर शिकायत है पर स्वयं ऐसा करने में कोई परहेज नहीं है । बस्तर में तेंदू पत्ते के व्यापारियों, जंगल ठेकेदारों, परिवहन मालिकों से यदा-कदा ऐसी शिकायतें मीडिया के माध्यम से आती ही रहती हैं । जहाँ तक इन क्षेत्रों के नेताओं के भयवश चंदा की बातें हैं वह भी दबी जुबां मे सुनी जा सकती है । पहले आंध्रप्रदेश में भी यही हुआ करता था । जान से बड़ी जनता प्यारी नहीं होती । चाहे वह जननेता ही क्यों न हो । वैसे यह कहकर मैं ऐसे जननायकों को समर्थन नहीं दे रहा, ऐसी हरक़तों को वाज़िब नहीं ठहरा रहा हूँ ।


नक्सलवाद भारत में आंतकवाद का घरेलू संस्करण है, जिसकी जड़ें देश-विदेश तक भी फैल चुकी हैं । यह ऐसे सिरफिरे लोगों तक आंतक पर विश्वास करने वाले लोग, संगठनों की पहुँच हो सकती है जिसे नकारा नहीं जा सकता है । अभी कुछ दिन पहले कश्मीर के मामले में नक्सलवादियों का बयान आया था कि वे वहाँ अपनी भूमिका के लिए तैयार हैं । यानी कि देश और समाज में अस्थिरता फैलाने वाले कई संगठनों के उद्देश्य और नक्सलवाद के उद्देश्यों में चूँकि अब साम्यता है तो जाहिर है इनके बीच आवाज़ाही भी हो ।


नेपाल से लेकर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और अब तमिलनाडू और कर्नाटक में भी जो गतिविधियाँ देखी जा रही है उससे लगता है कि यह क्षेत्र नक्सलवाद यानी प्रजातंत्र विरोधियों का एक गलियारा जैसा बन चुका है जो धूर श्रीलंका तक चला जाता है । इसमे लिट्टे जैसे संगठनों की भूमिका को भी पृथक नहीं किया जा सकता । फिर नेपाल और चीन के बीच बढ़ते संबंधों को कैसे नकारा जा सकता है और क्या नेपाल में जो माओवादी सरकार की स्थापना हुई, हज़ारों निसहाय और निरपराध जनता की मौतों के बाद, उसमें क्या चीन की कोई भूमिका नहीं है ? ऐसे मे यह कहने से कोई गुरेज़ नहीं कि इन गलियारों के बीच ऐसे देशों और ऐसी शक्तियों के परस्पर समर्थन न मिल रहा हो ।


जहाँ तक छत्तीसगढ़ के बस्तर का परिदृश्य है वहाँ नक्सलवादियों द्वारा लूट-पाट, वसूली और हत्या आम बात हो गई है । पुलिस थाने पर भी जब-जब आक्रमण हुए हैं तब-तब ख़बर आई है कि वहाँ से बड़ी संख्या में हथियार लूटे लिये गये ।


प्रश्न यह उठता है कि इनके पास उन्नत हथियार कैसे पहुँच रहे हैं - जाहिर है जहाँ और जो इन हथियारों को उपयोग मे लाते हैं वे ही उसे इन तक पहुँचा रहे हैं या इन तक नक्सलियो की पहुँच बराबर बनी हुई है । कहीं ना कहीं प्रजातांत्रिक निष्ठा के अभाव में उन्हें नेताओं, नागरिकों, नौकरशाहों, पुलिस बल की कमी और कमजोरियों का सहारा मिल रहा हो ।


देश-विदेश के आंतकवादी और देश में अस्थिरता फैलानी वाली ताक़तों के साथ इनके संबंधों की पुख्ता सबूत भले ही न मिले हों, जिस तरह से भारतीय नक्सलवाद में उन्नत हथियारों, उन्नत प्रौद्योगिकी का उपयोग होने लगा है उससे देखकर कहा जा सकता है कि बांग्लादेश, चीन, नेपाल, श्रीलंका और भी अन्य अंहकारी देशों की सहायता इन तक निश्चय ही पहुँच रही है । पिछले दिनो एक ख़बर आयी थी कि नक्सलवादियों के पास देश-विदेश के दो नम्बर की अकूत दौलत इकट्ठा हो चुकी है। इसमे कोई आश्चर्य की बात नहीं ।


ऐसे क्षेत्रों में अराजक भ्रष्ट्राचार, बेरोज़गारी, जननायकों की लापरवाही, प्रजातांत्रिक इकाइयों की लेकूना, सरकारी कर्मचारियों का आंतक, दमनात्मक कार्यवाही, शोषण तो बहाना है । दरअसल माओवादी कार्यवाहियों या नक्सलवादियों की ऐसी हिंसक गतिविधियों के मूल मे सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रजातंत्र को जड़ से उखाड़ फेंकना है । ग़रीबों, आदिवासियों, अहसायों, शोषित किसानों के हित की बात या उनके विकास के नाम पर जनयुद्ध तो बहाना है, आड़ है ताकि ऐसे क्षेत्रों में अल्प शिक्षित, अशिक्षित, बेरोज़गार, किसानो, आदिवासियों के भीतर पैठ बनी रहे और वे उन्हें अपना हथियार बनाते रहें । यदि ऐसा नहीं होता तो कम से कम बस्तर में इनका कोई न कोई ऐसा कम्यून ज़रूर होता जहाँ आदिवासी बेहिचक आसरा पाता । उस पर आस्था जताता । विकसित होता । यदि ऐसा नहीं होता तो नक्सलवादी भोले-भाले आदिवासियों को मौत के घाट नहीं उतारा करते । यदि ऐसा नहीं होता तो इन्फ्रांस्ट्रक्चर को ही नेस्तनाबूद करके ये नक्सलवादी ख़ुश नहीं होते । यहाँ यह सबसे बड़ी चिंता की बात है कि ऐसे नक्सलवाद का शिकार मूलतः ग़रीब, आदिवासी, कमज़ोर और दलित व्यक्ति ही हो रहा है न कि भ्रष्ट नेता, भ्रष्ट उद्योगपति, शोषक ज़मींदार, निरंकुश नौकरशाह । इसका मतलब यह क्यों नहीं हो सकता कि नक्सलवाद को अपने मूल उद्देश्यो से कुछ भी नही लेना-देना है । इसका मतलब यही है कि नक्सलवाद सिर्फ़ आतंकवाद है जिसका लक्ष्य प्रजातांत्रिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करना है । और कुछ नहीं..

Tuesday, July 08, 2008

थाईलैंड में समुद्र मंथन


भारतीय संस्कृति एकांगी और सीमित परिधि की संस्कृति नहीं है । वह असीमित है । उसकी धरातल वैश्विक है । उसका स्वदेश कहने को भारतीय उपमहाद्वीप है, परंतु सच तो यह भी है कि वह अनचीन्हें भूगोल में भी समुज्ज्वलित है । उसकी बेलें, उसकी महक सिर्फ़ अटक से कटक और काश्मीर से कन्याकुमारी तक ही नहीं है । उसकी जड़ों की भूमिगत पकड़ मात्र एशियाई ज़मीन बल्कि एशियेत्तर भूगोल में भी देखी जा सकती है । वस्तुतः वह किसी भी अर्थ में न केवल अतीत में, अपितु इक्कीसवीं सदी में भी वैश्विक संस्कृति है । रोम सभ्यता से किसी भी स्तर से कम नहीं साबित होने वाली भारतीय संस्कृति आज भी समूची दुनिया को अपनी शांति, सामंजस्य और उदात्तता के लिए अपनी इमेज़ में लपेट लेती है । पश्चिम का दर्शन कई बार घुटना टेक-टेक देता है । कालिदास को पढ़कर शेक्सपियर की आँखे विस्फारित होने लगती है । आइंस्टीन गाँधी के पडौस में आ जाते हैं । कितनी बात कहें यहाँ ? यह ‘वाह भारत’ जैसी आत्ममुग्धता मात्र नहीं है । यह भले ही अति बौद्धिकों को हलकी लगे, वस्तुतः यह आम भारतीयों के लिए निराशा, हताशा और हीनता के समय त्वरा को नया आयाम देने वाला विश्वास है ।


इतनी भूमिका के पीछे मेरा मतंव्य अधिक कुछ नहीं, सिर्फ़ इतना कि थाईलैंड के एयरपोर्ट में समुद्र मंथन का यह चित्र लाखों-करोड़ों विश्व नागरिकों की मनीषा को सोचने को विवश कर देती है कि क्या सचमुच कभी समुद्र मंथन जैसी अलौलिक परिघटना हुई थी ?


मैं आगे कुछ और आपसे बतियाऊँ, इससे पहले यह बता देना चाहता हूँ कि यह तस्वीर न मैंने अपने दैनिक डायरी लेखन के लिए सर्च इंजन से ढूँढ निकाली है, न ही मैं ऐसा करना चाहता था । इसे मेरे डैलास के मित्र आदित्य प्रकाश सिंह ने भेजी है । आदित्य मुझे पश्चिम और पूर्व के निचोड़ जैसे लगते हैं । उनके यहाँ पूर्व की भौतिकी की दृष्टि भी है और पश्चिमी की आध्यात्मिकी भी । वे एक अर्थ में सच्चे आधुनिक हैं । आधुनिक का मतलब केवल शारीरिक मतलबों में नहीं खुलता । आधुनिक वही होता जो अपने जड़ों से रस खींचते हुए सतत् गतिशील बना रहता है । क्योंकि सबकुछ न तो भौतिक होता है, और सबकुछ सुपरनैचुरल ही । इन दोनों का समन्वय ही वास्तविक प्रगति यानी सम्यक उत्थान कहलाता है । तो आदित्य पश्चिम में पूरब के राजदूत हैं । वैज्ञानिक होकर भी वे अपनी पारंपरिक अस्मिता को तजते नहीं हैं । मुझे उनके व्यक्तित्व के बारे सोचते हुए कई बार हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल क़लाम जी की छवि दिखाई देती है । उनकी ही घटना लेते हैं । उन्हें श्री हरिकोटा से एक रॉकेट का परीक्षण करना था । जानते हैं – उन्होंने सबसे पहले क्या किया ? सच मानिए, वहाँ उनके आग्रह पर एक नारियल और कुछ अगरबत्ती पहले बुलाई गयी । विश्व के सबसे बड़े देवता को स्मरण के पश्चात ही उन्होंने उस रॉकेट को आकाश के नाम सौंपा । तो यह होती है सच्चे वैज्ञानिक का विश्वास । पश्चिम इसे भले ही ढ़कोसला माने । तर्कों की ग़ुलामी करे । पर सच तो यही है कि वह ऐसे समय ईसा के रूप में सबसे अधिक शक्तिवान् को कदापि नहीं बिसारना चाहता । फ़र्क केवल यही कि वे उसे अंतस में करते हैं और हम साकार रूप में । क्योंकि साकार ही निराकार का आधार है। हम दिखावा नहीं करते । सच्चे अर्थों में साकार के रास्ते में निराकार तक पहुँचते हैं ।


थाईलैंड शांति का देश है । थाईलैंड राम और बौद्ध का देश है । थाईलैंड में आज भी रामलीला होती है । वहाँ राम और बौद्ध के स्वरूपों की पूजा कोई नहीं बात नही है । पर यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई देश यदि किसी देश के मिथकों को अपने अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर प्रतिष्ठित करे तो उसका साफ़ अर्थ समझा जा सकता है कि वह उसपर संपूर्ण आस्था और विश्वास रखता है । इस रूप में वे हमसे अधिक अपने अतीत के इशारों पर चलना चाहते हैं । समुद्र मंथन हुआ या नहीं ? यह मन और बुद्धि के पार की चीज़ है । समुद्र मंथन की सिद्धि मन और बुद्धि से नहीं की जा सकती किन्तु है तो यह सत्य और असत्य की उत्पत्ति और शाश्वतता का प्रतीक । हम या कोई भी इन दोनों रूपों से बच नहीं सकता । यह इस बात का भी पाठ है कि सत्य देवत्व और असत्य दानवत्व का संकेत है और मनुष्य को सदैव मनुष्यत्व से देवत्व या ईश्वरत्व की ओर उन्मुख बने रहने की चेष्टा करते रहना चाहिए ।
यह तस्वीर यह भी कहानी बताती है कि थाईलैंड की मनीषा को मंथन पर अटूट विश्वास है । बिना मंथन के किसी दृष्टि, विचार और मत को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए । प्रकारांतर से यह आत्मविवेचना के लिए सतत् चेतना और चेष्टा का प्रतीक है । यह केवल भारतीयता के प्रति श्रद्धा और आस्था का मामला नहीं, यह भारतीय दृष्टि की शाश्वतता के प्रति भी सम्मान है । मैं इस समय यह नही बता सकता कि वहाँ आज की तिथि में हिंदूओं या भारतीयों का प्रतिशत कितना है ? और इस समय यह बेमानी भी है कि मात्र हिंदूओं के प्रयासों के बदौलत ही थाईलैंड के एयरपोर्ट पर यह स्थापित हो सकी है । यह थाईलैंड के जीवन-दर्शन का भी बखान करता है । यह दीग़र बात है कि यदि यहाँ ऐसी कोई भी सांस्कृतिक विरासत को तवज़्ज़ो दें तो दूसरे दिन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोग इसके हज़ारों निहितार्थ तलाश लेंगे और जीना दूभर कर देंगे देश का । ऐसे अस्मिताहीन और शुष्क बौद्धिक लोगों को कौन समझाये ? कौन समझाये इन्हें कि इतिहास को मारने पर मनुष्य का कुछ भी नहीं बच सकता । मनुष्य से सबकुछ छीना जा सकता है उसका अपना इतिहास कदापि नहीं ।


धन्यवाद आदित्य जी, आपके बहाने मुझे कम-से-कम थाईलैंड की दृष्टि और मान्यता के बारे में पता चला ।


और कुछ कहने से पहले मैं फ़िलहाल यही कहना चाहता हूँ कि जो थाईलैंड मौज़-मस्ती के नाम पर, सैंडविच मालिश और इसी बहाने देह सुख की आड़ में विदेशी बालाओं के क़रीब जाने की फ़िराक़ में हों वे समुद्र मंथन की कहानी को फिर से एक बार पढ़ सकते हैं...

Saturday, July 05, 2008

मातृभाषा-छत्तीसगढ़ी में भी समाचार प्रसारण होगा !

सबसे पहले युनिवार्ता को बधाई ।

बधाई इसलिए कि उसने हम छत्तीसगढ़ीभाषी 2 करोड़ों लोगों तक यह समाचार सबसे पहले पहुँचाया । बधाई इसलिए कि यह शुष्क समाचार नहीं । इसमें हमारी मुरझाती हुई अस्मिता को रससिक्त करने वाला जल भी है ।

राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ी को लेकर हर जागरुक इंसान सचेत था कि आम जनता का अधिकांश कार्य छत्तीसगढ़ी में हो । उसे राजकाज में अँगरेज़ी और कठिन हिंदी का सामना न करना पड़े । वह न्यायालयीन भाषा को समझ सके । वह सरकारी दफ्तर, कोर्ट-कचहरी में अपनी भावना और समस्या को अपनी भाषा में बोल सके और उसी लय में उसे सामनेवाला सुनने से परहेज या तौहीनी न करे । सरकारी स्कूलों, खासकर प्राथमिक स्कूलों में भी वह अपनी मातृभाषा छत्तीसगढ़ी में पढ़ने-समझने का अवसर जुटा सके । यात्रा के दौरान अपनी भाषा में रेलवे और बसों के आने-जाने की जानकारी भी उसे अपनी भाषा में मिल सके । इसके लिए बकायदा बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और खासकर साहित्यकारों (तथाकथित बड़ी पत्रिकाओं में छपने वाले स्वनामधन्य हिंदी के कथाकार, उपन्यासकार, कवि कदापि नहीं) ने लंबा संघर्ष किया है । राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों ने भी समय की नज़ाकत को परखते हुए इसमें अपना योगदान दिया है । इसके लिए सभी मातृभाषा प्रेमियों को बधाई ।

यह भारत सरकार की ओर से 2 करोड़ छत्तीसगढ़ियों के लिए सुखद सौगात है । इसलिए उसे भी साधुवाद, कि आयद दुरुस्त आयद ।

मैंने प्रसार भारती आकाशवाणी के समाचार विस्तार की योजना (कल घोषित योजना के अनुसार - आगामी छह जुलाई से विभिन्न भाषाओं में 49 समाचार बुलेटिनों का प्रसारण होगा। आकाशवाणी से इस समय 87 भाषाओं और बोलियों में 511 समाचार बुलेटिनों का प्रसारण हो रहा है । जिन एफएम केन्द्रों से समाचार बुलेटिन प्रसार होंगे वे हैं जम्मू, श्रीनगर, नागपुर, आरंगाबाद, रांची, विजयवाड़ा, पोर्ट ब्लेयर, कोच्चि और पुडुचेरी। कारगिल के आकाशवाणी केन्द्र से पुरगी और बालटी भाषाओं में समाचार बुलेटिन के प्रसारण की व्यवस्था पूरी हो गई है। दिल्ली के एफ.एम.गोल्ड और डीटीएच चैनल पर भी समाचार आधारित कार्यक्रम का समय बढ़ाया जा रहा है। श्रीनगर और जम्मू के एफएम केन्द्रों पर समाचार प्रसारण का समय बढ़ाया जा रहा है तथा ‘रेडियों कश्मीर’ से उर्दू की एक और बुलेटिन प्रसारित की जाएगी। छत्तीसगढ़ में रायपुर केन्द्र से छत्तीसगढ़ी भाषा में तथा अरुणाचल प्रदेश में ईटानगर से अतिरिक्त समाचार बुलेटिनों का प्रसारण किया जाएगा।) की बारे में विभिन्न लोगों से बातचीत की । हमें जो टिप्पणी मिली उसे मैं अविकल बताना चाहता हूँ –

श्री विश्वरंजन, वरिष्ठ कवि एवं पुलिस महानिदेशक, छत्तीसगढ़
यह केवल प्रसारण का ही मामला नहीं, दूरस्थ अंचलों में चेतना के आत्मीय विस्तारण का भी ज़रिया बनेगा । चित-परिचित और निजी भाषा में लोगों को समाचार यानी देश-दुनिया में हो रही हलचलों की जानकारी मिलेगी । मातृभाषा में समाचार का प्रसारण क्षेत्रीय अस्मिता को भी बल देने जैसा है । सूचना-प्रौद्योगिकी के जिस दौर में हम ले जाये जा रहे हैं उस दौर में यदि हम हमारी ही भाषा में कुछ न जान सकें तो इससे बढ़कर और क्या विडंबना होगी । मैं समझता हूँ कि यह वैश्वीकरण के दौर में, जहाँ किसी एक ही भाषा में सबकुछ सिखाने-बताने-पढ़ाने का कारोबार चल रहा हो, आंचलिक भाषाओं को सरंक्षण देने का गंभीर प्रयास है ।

श्री सत्यनारायण शर्मा, पूर्व शिक्षा मंत्री, विधायक एवं कार्यकारी अध्यक्ष(छ.गढ़ प्रदेश कांग्रेस)
छत्तीसगढ़ी सहित आंचलिक या प्रादेशिक भाषाओं में समाचार का प्रसारण को लेकर कांग्रेस सदैव सचेत थी । आज भी राज्य में ऐसे लाखों लोग हैं जो ठीक से हिंदी नहीं समझ सकते । ऐसे लोगों के लिए छत्तीसगढ़ी में समाचार सुनना एक विश्वसनीय आस्वाद होगा । वे राज्य, देश, समाज की ख़बरे अपनी भाषा में सुन सकेंगे । इन समाचारों के समक्ष स्वयं की स्थिति का मूल्याँकन भी कर पायेंगे ।


श्री गिरीश पंकज, सदस्य, भारतीय साहित्य अकादमी व संपादक, ख़बरगढ़
आकाशवाणी रेडियो से स्थानीय भाषा में समाचार का प्रसारण छत्तीसगढ़ी अस्मिता के पक्ष में है और इस रूप में यह हिंदी के प्रति आंचलिक मनीषा को जोड़ने का भी नेक क़दम है । यह एक तरह से संविधान की अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को रखे जाने की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रवेश-द्वार की तरह काम करेगा ।

श्री संजय द्विवेदी, संपादक-इंपुट, जी-छत्तीसगढ़,न्यूज़ चैनल, रायपुर
मानस जी, हम जैसा कि आप जानते हीं है कि जी न्यूज के स्थानीय चैनल में भी छत्तीसगढ़ी में समाचार प्रसारण की सोंच रहे हैं । भारत सरकार द्वारा राज्य की भाषाओं में समाचार प्रसारण का अवसर देना भाषाओं और स्थानीय मन को तरजीह देने जैसा है । समाचार केवल हमें संसूचित नहीं करते, वे हमें आत्ममूल्यांकन के लिए तैयार भी करते हैं । वे विकास की नयी दिशाओं से भी लोगों को जोड़ते हैं । वे एक तरह से ग्रामीण दुनिया के लिए पाठ की तरह हैं । आज जब हम सभी जगह अख़बार और टी.व्ही नहीं पहुँचा पाये हैं, रेडियो ही वहाँ मनोरंजन के साथ समाचारों से जुड़ने का एकमात्र साधन है । यदि रेडियोवाले यानी कि प्रसार भारती देर से भी जागती है तो उसका स्वागत तो किया ही जाना चाहिए ।

श्री हसन खान, पूर्व केंद्र निदेशक, आकाशवाणी, रायपुर
प्रसार भारती का यह क़दम बहु-प्रतीक्षित था । राज्य के लिए हर्ष का विषय है । मैंने अपने कार्यकाल में ऐसे प्रश्नों का कई बार सामना किया है कि बाबू यदि आपके प्रसारण केंद्रों से हमारी भाषा में गीत, संगीत, कथा, कविता, खेती-बाड़ी आदि सभी विषयों का प्रसारण स्थानीय भाषा में होता है, पर समाचार क्यों नहीं ? प्रसार भारती और केंद्र सरकार का यह कार्य निश्चित रूप से परिणाममूलक और प्रसारण के मर्म को सिद्ध करने वाला है । यह एक तरह से आंचलिक भाषाओं के हाथ पर पीठ रखने जैसा भी है । वह इसलिए, क्योंकि अब राजकाज की बातें, सूचनायें, घटनाओं को जनपदों का श्रोता अपनी भाषा में सुन सकेगा । सुन सकेगा तो वह गुन भी सकेगा । यह सामाजिक परिवर्तन के लिए ज़रूरी टूल्स की तरह है और इसका मैं स्वागत करता हूँ ।

श्री मोहन लाल देवांगन,35 साल से 17 घंटे प्रतिदिन रेडियो सुनने वाले विशिष्ट श्रोता, रायपुर
मेरे मन में कई वर्षों से यह प्रश्न उठता था कि जब हम अँगरेज़ी, संस्कृत, उर्दू में समाचार सुना सकते हैं तो आख़िर करोड़ों लोगों की भाषा में क्यों नहीं । जाहिर है इस रूप में मेरे समक्ष छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, आदि भाषायें ही पहले दिखाई देती थीं । यदि भारत सरकार, प्रसार भारती यह भाषायी कार्य करने जा रही है तो उसका स्वागत मैं सबसे पहले करना चाहूँगा । यह छोटी-छोटी भाषाओं को बचाने की दिशा में उचित कार्य है ।

डॉ. सुधीर शर्मा, भाषाविद्, रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर
भाषा ही जीवन है । भाषा ही अस्मिता है । भाषा के बगैर मनुष्य कुछ भी नहीं । छत्तीसगढ़ी में समाचार प्रसारण को सरकारी मान्यता देने से 2 करोड़ छत्तीसगढ़ियों के मन में नया उत्साह जागा है । केंद्र शासन इसके लिए बधाई की पात्र है । यदि भारत सरकार, जैसा कि कहा गया है आंचलिक और क्षेत्रीय भाषाओं में समाचार प्रसारण की सुविधा के लिए राजी हो गयी है और निकट भविष्य मे ही हम अपनी भाषा में समाचार सुन सकेंगे तो यह केवल राजकीय दृष्टि ही नहीं, इसमें आंचलिक उद्वेग को भी तरजीह देने की भी दृष्टि सम्मिलित है । यह राष्ट्रीय एकता और सदभाव की दिशा में भी केंद्र शासन की सकारात्मक पहल है ।

श्री बलराम मिश्रा, अध्यापक, प्राथमिक शाला छैडोरिया, जिला रायगढ़

मैं यदि निजी अनुभव बताऊँ तो यही कहूँगा कि जब हमें सरकार द्वारा रेडियो शिक्षा कार्यक्रम के तहत रेडियो दिया गया और उससे ज्ञानवाणी आदि कार्यक्रमों से विद्यार्थियों को जोड़ने को कहा गया तो मैने पाया कि वे कई बार हिंदी के शब्दों को नहीं समझ पाते थे और हमारी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते थे ।
मैं एक दूसरा उदाहरण देना चाहूँगा – आज भी दूरस्थ और पिछड़े गाँवों में समाचार का सबसे विश्वसनीय माध्यम रेडियो है जिसमें आकाशवाणी और बीबीसी प्रमुखतः विश्वसनीय हैं । ऐसे ग्रामीणों, आदिवासियों, किसानों के लिए अपनी भाषा में समाचारों से अवगत होने का स्वर्णिम अवसर बहुत ही कारगर सुविधा है और इसके लिए इसके योजनकारों को बधाई देना होगा ।

अंत में जब मैंने अपनी माँ से पूछा - माँ आप क्या सोचती हैं ? तो उन्होंने कहा - बेटा, यह भाषा को लेकर यदि सरकारें सोचतीं हैं तो यह उनके सुधरते जाने का परिचायक है । अब मैं जब गाँव जाऊँगी तो गाँव की सहेलियों को इसकी बात बताऊँगी । वे भी अब मानक छत्तीसगढ़ी में बात कहने, लिखने का प्रयास कर सकती हैं ।

मैं जो कहना चाहता था वह तो सबों ने कह दिया । अब मैं क्या कहूँ ।
बस्स आप ही कुछ कहें...

Friday, July 04, 2008

बस्तर में नक्सलवादी हैं ही नहीं

बस्तर नक्सलवाद नहीं माओवादियों के हिंसक आतंक का गढ़ बन चुका है । आज का समूचा बस्तर आंतकवाद के घटोटोप में जी रहा है । अब यह सिद्ध हो चुका है कि बस्तर के आंतकवादियों को नक्सलवादी कहना नक्सलवाद को गाली देना होगा । यदि नक्सलवाद की सैद्धांतिकी भी सत्यनिष्ठ होती तो भी बस्तर में अविकसित आदिवासी, दलित, गरीब, भूमिहीन किसान का उत्थान और उसकी बराबरी का क्रांतिकारी अभियान संचालित होता, स्वयं उन्हीं के ख़िलाफ़ नरसंहार का तांडव नहीं मचा रहता । वे स्वयं बस्तर के विनाश का सबसे खतरनाक और नया इतिहास नहीं रचते होते । बस्तर-विपदा की जड़ में आदिवासी-शोषण का तर्क भले ही लोक-लुभावना हो सकता है, परंतु वही अंतिम वास्तविकता नहीं है ।

यदि नक्सली बस्तर में प्रभु-वर्गों के सुनियोजित शोषण, दमन, अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे होते तो बस्तर आज आदिवासियों की शिक्षा, चेतना, मानव अधिकार, सहित विकास का विश्वविद्यालय बन चुका होता । वहाँ दुनिया भर के समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, और योजनाकार रिसर्च करने आते होते और नक्सलियों से जनता के सम्यक विकास का पाठ सिखते होते । बस्तर का नक्सलवाद सारी दुनिया में पूजा जाता । उसे प्रजातांत्रिक विकास का विकल्प माना जाता और मानवीय विकास का अंतिम लोकाग्रही मॉडल भी घोषित कर दिया जाता।

बस्तर के आंतकवादियों का सबसे बड़ा सच यही है कि वे अपनी हिंसक और अमानवीय हरकतों पर किसी भी सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक नियंत्रण के सख्त विरूद्ध हैं । क्योंकि उनका एकमात्र लक्ष्य प्रजातंत्र को नेस्तनाबूत करके वहाँ माओवाद का विस्तार और साम्राज्य का स्थापना ही है, जो पूरी तरह भारतीय संविधान के विरूद्ध है । वर्तमान प्रजातंत्र की संवैधानिक व्यवस्थाओं की कोई भी दिशाबोध या अनुशासन उन्हें मंज़ूर नहीं है । आदिवासियों के विकास और उत्थान के नाम पर न वे कभी संवाद को राजी हुए, न ही वे प्रजात्रांतिक व्यवस्था के रास्ते, प्रजातांत्रिक विकास के लिए जनप्रतिनिधित्व के लिए तैयार हुए । यदि वे ग्राम, जनपद, जिला पंचायत साहित विधान सभा और संसद के रास्ते आगे आये होते तो भी बस्तर के विकास का उनका कथित सपना कब का पूरा हो चुका होता । वे और उनके कारिंदे ही आज बस्तर के जननायक होते । ऐसे में बस्तर का विकास भी कहीं अधिक तेज गति से होता। शांति और सुरक्षा के नाम पर देश-प्रदेश की अकूत दौलत यूँ ही नष्ट नहीं होती ।

बस्तर के पिछले तीन-चार दशकों के विकास-शास्त्र को पढ़ें तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि बस्तर का जितना शोषण अन्यों ने मिलकर किया है, उससे कहीं अधिक शोषण इन कथित नक्सलवादियों (मूलतः माओवादियों और वास्तव में आंतकवादियों) ने किया है । शक्तिशाली और नव हितनिष्ठ तो केवल आर्थिक या मानसिक शोषण करते रहे, माओवादियों ने तो विकास की जारी गति को ही बेअसर कर दिया, और सिर्फ इतना ही नहीं; उन्होंने अपनी पाशविक जिद्दी के लिए अमानवीय हत्या से भी कभी परहेज नहीं किया । सबसे ताज्जूब की बात तो यही कि इस दरमियान इनके आंतक का शिकार कोई प्रभुवर्ग का व्यक्ति नहीं हुआ । सिर्फ भोला-भाला, निहत्था, विकास की धीमी गति चाहने वाला आदिवासी ही मौत के घाट उतारा जाता रहा । यह कैसा द्वंद्व है विकासवादियों का ? सच तो यही है कि इन सालों में सारा बस्तर आतंकवादियों के ख़ूनी पंजों में फँस चुका था। उनकी सारी अस्मिता, सारी संस्कृति भी विकृति के कगार पर चली गई, इसके लिए कोई कोर-कसर भी इन माओवादियों ने नहीं छोड़ा । क्या आदिवासी नहीं जान चुके थे कि माओवादी का सारा आदिवासी प्रेम छद्म और राजनैतिक है । वे उसके हितचिंतक कभी नहीं रहे ।

ऐसे में माओवादी आंतकवाद से मुक्ति के लिए बस्तर की जनता जाग खड़ी होती है और शांति के लिए अग्रसर होती है वह माओवादियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन उठती है । जाहिर है उनका छद्म और पाखंड खंडित होने लगता है । उसे भय सताने लगता है कि कहीं उसके निरापद किले ही न ढ़ह जायें । जो लोग आदिवासियों की अग्रगामिता और आक्रोश से उपजे इस लोक-अभियान को सरकारी प्रयोग कहते हैं वे बिलकुल भूल जाते हैं कि आदिवासियों को उनके प्रतिरोध के लिए भी पहचाना जाता है। भूल यह भी कि जैसे आदिवासी विरोध करना जानता ही न हो ।

वे लोग, जो अपनी अमानवीय बुद्धिजीविता को सिद्ध करने के लिए ऐसे लोक-अभियानों से उपजी परिस्थितियों का तर्क देकर सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं, जानबूझकर यह भी भूल जाया करते हैं कि वे प्रकारांतर से आदिवासियों को चुप बैठने की सलाह भी देते हैं । और इस प्रकारांतर का निहितार्थ आदिवासियों को माओवाद से समझौता का मंत्र देना भी है जिस पर अब कोई भी आदिवासी या कोई भी प्रजातांत्रिक सरकार विश्वास नहीं कर सकता। ऐसे लोक अभियानों के विरोध का एक अर्थ माओवादियों के हिंसक माहौल को बनाये रखना भी है । ऐसे में यदि माओवादियों के हिंसक आतंकवाद के खिलाफ उठ खड़े होने वाले जन-समुदाय को प्रजातांत्रिक तौर पर सरकारी संबल देना गलत है तो माओवाद हिंसा के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलना उससे कहीं अधिक ग़लत है । गांधी के शब्दों में यही पाप है । यही अन्याय है । आख़िर उन्होंने ही तो कहा था – ‘मेरा विश्वास है कि जब मेरे सामने केवल दो विकल्प रह जायेंगे – कायरता और हिंसा – तो मैं हिंसा के लिए सलाह दूँगा ।’ वे यह भी कहते रहे – ‘मेरा विश्वास है कि बुराई से असहयोग करना वैसा ही फ़र्ज है जैसा अच्छाई से सहयोग ।’

नक्सलवाद का रहस्यवाद अँगरेज़ी कानून में है या छत्तीसगढ़िया-गैरछत्तीसगढ़िया के द्वारा फैलाये गये शोषण तंत्र में ? उसे, (जिसे में केवल आंतकवाद कहना ही उचित समझता हूँ) सुलझाने के लिए क्या प्रयोग कब-कब हुए? किस-किसने संचालित किया और किस-किसने लाचारी दिखाई ? किसने आदिवासियों की चेतना को ऊष्मा दी और किसने उसकी ज़ड़ताओं को आँच बनाकर अपने बदन की सेंकाई की ? इस विपदा से किसने शुतुरमुर्ग की तरह रेत मे अपना सिर फँसाये रखा और किसने सच्चा विमर्श किया ? फिलहाल, इन प्रश्नों के उत्तरों की मीमांसा में किसी वकीली जिरह में उलझने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है संकटग्रस्त बस्तर का साथ देना । वह प्रतिरोध की संस्कृति का मतलब जान चुका है उसे पूर्णतः नैतिक समर्थन हर छत्तीसगढ़िया की नैतिकता भी होगी । यह वक्त आरपार का है।

सचमुच यह वक्त आरपार का है । हमारी परीक्षा की घड़ी का समय है । हमें तय करना ही होगा कि हम किसके साथ चलेंगे ? आंतकवादियों के साथ या आंतक से मुक्ति के लिए तरसता, जूझता, शहीद होता बस्तर के साथ ? यदि हम अपनी निजी कुंठाओं को बिसारकर, ईमानदारियों के साथ बस्तर के पक्ष में खड़े हों तो, उसे शांति और सत्ता तक पहुँचाने से कोई नहीं रोक सकता, पर नेपाल की तरह नहीं, बिलकुल भारतीय शैली में और जिसके लिए आंतक, हिंसा, अमानवीयता से जुझने वाले हर प्रजातांत्रिक शिल्प को किसी भी दलील, किसी भी न्यायालय में गैर वाज़िब नहीं ठहराया जा सकता ।

Tuesday, June 17, 2008

‘ब्लॉग लेखन अनुपयुक्त है’

‘ब्लॉग लेखन अनुपयुक्त है ।’ मेरे ऊपर एक साथ चिट्ठाकार न भड़कें । यह मेरी टिप्पणी नहीं है । यह टिप्पणी है देश के प्रख्यात वामपंथी आलोचक आदरणीय नामवर सिंह की । आप पूछेंगे – यह उन्होंने कब कहा ? भई कल ही कहा । कहाँ कहा ? छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की एक पत्रकार वार्ता में कहा । क्यों कहा ? यह आप भी पता कर सकते हैं अपने मन-मनीषा पर केंद्रित होकर । वैसे इसका जवाब मन नहीं दे सकेगा । मन से पूछेंगे तो वह शायद आपको उकसाने की स्थिति तक ले पहुँचाये । हिंदी ब्लॉग के दीवाने तो उग्र भी हो सकते हैं । कुछ इसे बुद्धि का अजीर्ण निरूपित कर सकते हैं या फिर कुछ अति उत्साही और नामवर सिंह जी के बारे में खास तौर पर नही जाननेवाले, यह भी कह सकते हैं कि सिरफ़िरे के मुँह कौन लगे ? हम तो अपनी छंद, लय और ताल में इसी तरह चिट्टाकारी का गुणानुवाद करते रहेंगे । अंतरजाल पर हिंदी की अभिव्यक्ति की नदी को लबालब बनाये रखेंगे । चाहे उसका पानी मटमैटा या खर-पतवार सहित ही क्यों न रहे !


आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को गुरु माननेवाले और हिंदी भाषा की जीवंत आलोचना के लिए प्रसिद्ध नामवर सिंह जी इन दिनों रायपुर प्रवास पर हैं । केवल दो दिनों के लिए । यानी कल का दिन वे बीता चुके हैं और एक दिन यानी आज वे अपने समय के एक बड़े कवि मुक्तिबोध, गजानन माधव के बड़े चिरंजीव दिवाकर मुक्तिबोध (जो दैनिक भास्कर, रायपुर संस्करण के स्थानीय संपादक हैं) की किताब (शायद टिप्पणी और आलेख संग्रह) को लोकार्पित करने का पवित्र और आशीर्वादात्मक कार्य संपन्न करेंगे ।


मैं नहीं जानता कि हमारे ब्लॉगर्स बंधु उन्हें कितना गभीर लेंगे ? पर उनके निहितार्थ को एकदम ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता । मुझे लगता है, जब वे ऐसा सोचते हैं तो सारे भारत और उसके वर्तमान की स्थिति का मुआयना भी उनकी बुद्धि करती है । क्योंकि आलोचक मन से कम बुद्धि और तर्क से अधिक उवाचते हैं । और इस सोच या इस सोच से उत्पन निर्णय में हमारे देश के अनपढ़, अल्पपढ और ग़रीब, किसान, मज़दूर, कारीगर आदि आमजन भी उन्हें दिखाई देते हैं जिनमें से आधे लोग तो आज भी निरक्षर हैं । उनके गाँवों और कस्बों की हालत किसी से नहीं छिपी है । कहीं बिजली नहीं है, कहीं टेलिफ़ोन नहीं है । कहीं यह दोनों है तो उनके पास कंप्यूटर ख़रीदने की ताक़त ही नहीं है । यदि यह सब भी है तो उन्हें यह नही पता कि कंप्यूटर में वह ब्लॉग भी लिख सकता है । यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि क्या ब्लॉग लेखन ज़रूरी है सबके लिए ? अभिव्यक्ति के साथ अनभिव्यक्ति भी बहुत ज़रूरी है । कम से कम अंतरजाल पर । आख़िर गोपनता भी कई बार लाज़िमी होती है । वैसे भी बड़ा से बड़ा अभिव्यक्तिवादी समाज सब कुछ कहना नहीं चाहता । ऐसे सभ्य (?) समाजों का भी इतिहास गवाह रहा है कि वहाँ कुछ ही लोग अभिव्यक्ति के अधिकार को बनाये रखते हैं या फिर उसे बहाल करने के लिए संघर्षरत रहते हैं । हर कोई बोलता नही है । हर कोई लिखता नही है । कुछ लोग बिना कहे भी देश को आगे बढ़ाते रहते हैं । मानव समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हैं ।


यूँ भी ब्लॉग लेखन पढ़े-लिखे और तकनीक से परिचित (और दक्ष भी ) तथा साधन संपन्न लोगों के वश की बात है, जिसके पास इतना समय भी हो कि वह ऐसा लिख सके । यदि उसके पास सारी योग्यतायें हैं तो भी क्या ज़रूरी कि उसकी अवस्था यानी कि आयु ऐसा करने में साथ दे । आख़िर जीने की दृष्टि और सृष्टि उम्र से भी तय होती है । फिर मानसिकता भी तो कोई चीज़ होती है मनुष्य के उद्यमों में । यह वास्तविकता है कि हमारी पुरानी पीढ़ी लेखन के नये तकनीक के बजाय पांरपरिक तरीकों पर अधिक विश्वास करती है । नामवर पुरानी पीढ़ी के दिग्गज हैं । वे प्रौढ़तम अवस्था मे है इन दिनों । तो वे अपने प्रौढ़तम विचार के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं ।

देश के युवा ब्लॉगरों को तनिक भी दुखी नहीं होना चाहिए कि नामवर उनके सपनों पर तुषारापात करनेवाले हैं । या फिर वे युवा विरोधी हैं । यह उनकी कथनी का विरोधाभास नहीं जो वे स्वयं स्वीकारते हैं और इस स्वीकारोक्ति में उच्चारते हैं कि नई पीढ़ी पर उन्हें भरोसा है । वे इसी प्रसंग में जन-जन की आवाज़ के लिए हिंदी अख़बारों को ही सक्षम बताते हैं । उनकी माने तो हिंदी साहित्यकारों या अध्यापकों की बनाई भाषा नहीं है । यह अख़बारों की बनाई गई है । और अख़बारनवीसी को सुधारने के भरोसेमंद कार्यकर्ता के रूप में वे युवाओं की ओर

जिस इंटरनेट पर आज का युवा अधिक आश्रित और विश्वास करता है, वह युवा (और कुछ प्रौढ़ और कुछ बूढ़े-सयाने भी) ब्लॉग लेखन पर भी विश्वास करता नज़र आ रहा है । ब्लॉग इंटरनेट का उत्पाद है । वह उसका भूगोल भी है । भूगोल को विस्तारित करते रहने वाला अधियानकवादी ताक़त भी है । मुझे यह कहना यहाँ प्रांसगिक लगता है कि ब्लॉग एक तरह का पत्रकारिता भी है या बन रहा है । इंटरनेट आधारित पत्रकारिता । इंटरनेट और हिंदी पत्रकारिता पर चिंतित दिखाई देनेवाले नामवर सिंह यह भी कहते हैं कि अँगरेज़ी अख़बार और इंटरनेट की नकल ने पत्रकारों की नौकरी को ख़तरे में डाल दिया है । बात में काफ़ी दम है ।

नामवर जब पत्रकारों को संबोधते हैं कि क्षेत्रीय अख़बारों में आंचलिकता का रंग झलकना चाहिए तब आज के हिंदी चिट्ठाकारों को भी उस संबोधन के समक्ष स्वयं को खड़ा देखना चाहिए और उसे अपने लिए कारगर मानना चाहिए । आख़िर हिंदी के सारे चिट्ठाकार दिल्ली या मुंबई के तो हैं नहीं कि एक ही मुहावरा, एक ही भाषा में अपनी बात रखें । हिंदी तो कई अंचलों और कई बोलियों से मिलकर अपनी प्रवहमानता को निरंतर बनाती है । वही असली मानकता भी है कि एक जैसी हिंदी सर्वत्र संभव भी नहीं है । न भारत में न विश्न में । स्थानीयता का संपुट न हो तो आपका अपने कहने के लिए आपकी भाषा में नया क्या होता है ? भाषा बासी लगती है या फिर अनुदित या फिर रटी-रटायी । यही विविधता ही तो हिंदी और हिंदुस्तान का चरित्र है जो हम सबको तथाकथित वैश्वीकरण के सैकड़ो-हजारों वर्ष पहले से ही सच्ची वैश्किता का पाठ सिखाता रहा है, जिसे हम वधुधैव कुटुम्बकम् जैसे पवित्र मंत्रों के रूप में जानते-मानते रहे हैं ।

आज की वैश्वकिता ( उपनिवेशवादी, बाज़ारवादी, अधिनायकवादी) के समक्ष अपने होने को बचाये रखने के लिए आंचलिकता को बचाये रखना सबसे बड़ी चुनौती है । यदि हम ऐसा नहीं कर सके तो हमारे होने पर ही संदेह उत्पन्न हो सकता है । हमारी पहचान गुम हो सकती है । हमारी भाषा की हत्या हो सकती है । हमारी संस्कृति को आत्महत्या करना पड़ सकता है । और इस हत्या और आत्महत्या में हिंदी के चिट्ठाकारों के लिए नामवर का यह संदेश या संकेत एक पवित्र पाठ भी हो सकता है । यानी कि यह हिंदी ब्लॉग की भाषा का बाईबिल हो सकता है ।

जो अपने ब्ल़ॉग लेखन को अपनी पत्रकारिता का हिस्सा मानते हैं उन्हें नामवर सिंह की इस बात पर गौर करना ही चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता की भाषा उस क्षेत्र के अनुसार होनी चाहिए, जो भाषा वहाँ बोली जाती है । जैसे छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी की मिठास रहे, बुंदेलखंड में बुंदेलखंडी । यही हिंदी पत्रकारिता है । यह ऐतिहासिक सच है कि यही पत्रकारिता परतंत्रता से मुक्ति पाने के आंदोलन में आम जनता को राजनीति का प्रशिक्षण देती थी । आज भी जिस तरह से पश्चिमी दुनिया की धूर्तता वैश्वीकरण के बहाने भारतीयता को लीलने की फ़िराक मे है, आंचलिकता या स्थानीयता का संबल ही उसके प्रतिरोध का कारगर हथियार हो सकता है ।

अब मानना, नहीं मानना हम निरंकुश चिट्ठाकारों के ऊपर है ।

जो स्कूल में नहीं होते वे सिर्फ़ बाल मज़दूर होते हैं


हम कभी गंभीर नही रहे कि हर बच्चा पाठशाला में रहे । शिक्षा के लगभग सभी संकल्पों, मसविदों, प्रस्तावों, आयोगों ने हर कोण से सभी के लिए प्राथमिक शिक्षा को अपरिहार्य माना फिर भी 6 से 14 वर्ष आयु समूह के सभी बच्चों की अनिवार्य दाखिले को अब तक सुनिश्चित नहीं सके हैं । वस्तुतः हम बच्चों की शाला से अंतरंगता के निहितार्थों को कई दशक बाद भी अपनी मनीषा में प्रतिष्ठित नहीं कर सके हैं । अपनी नपुंसक काहिली के दबाब में हम नैतिक उत्तरदायित्वों को तंत्र के मत्थे जड़ देते हैं । इस ‘हम’ में सिर्फ़ अनपढ़ और गरीब जनता ही नहीं, बल्कि हितनिष्ठ प्रभु वर्ग, बासी विचारों के उबटन में मुग्ध बुद्धिजीवी, सुस्त शिक्षाशास्त्री, पश्चिम दुनिया की योजनाओं के दीवाने रणनीतिकार, केवल सनसनीखेज़ तलाशती मीडिया और धोखेबाज राजनीतिक समूह भी हैं । सिंहावलोकन करें तो ये सारे यही पाठ पढ़ाते दिखाई देते हैं कि हम सिर्फ़ अपनी गरीबी को नियति मानकर व्यवस्था से चिढ़ना सीखें या फिर थकहार कर संकटमोचन चालीसा का पाठ करें पर स्वयं कुछ न करें ।गोया त्रासद अशिक्षा के रावणों और कंसो से मुक्ति के लिए सिर्फ अवध या मथुरा के ईश्वरों और उनके क्षत्रपों की ओर टकटकी लगाकर निहारना ही अंतिम रास्ता हो । यह प्राथमिक शिक्षा के प्रजातांत्रिकीकरण में यथास्थितिवादिता और वर्चस्ववादिता का स्थायी संस्कार नहीं तो और क्या है ?


वैसे सरकारी पहल पर संपूर्ण दाख़िला हेतु बकायदा हरसाल जून-जुलाई माह में शाला-प्रवेशोत्सवी सज-धज होती है । ऐसे उत्सवों की दाल में नये सीखों का तड़का मारा जाता है । उसमें अनुप्रयोगों का नया मिर्च-मशाला भी डाला जाता है । अचेतन और सुस्त मानसिकता वाले राजनीतिक गलियारों में सभी के लिए शिक्षा की राजनीतिक प्रतिबद्धता का स्मरण कराया जाता है । अन्य दैनंदिन औपचारिकताओं के बीच स्पेस निकालकर शिक्षा-तंत्र इसे एक अभियान का रूप देता है । तंत्र मानती है कि पालकों और स्वयं बच्चों से संपर्क और प्रेरणा के बल पर उन्हें शाला से जोड़ा जा सकता है या फिर वे शाला त्यागे बिना किसी कक्षा की संपूर्ण शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं । वैसे शालाप्रवेशोत्सव से एक औपचारिक वातावरण तो निर्मित होता है किन्तु यह सरकारी रूप में होता है असरकारी रूप में नही । फिर भी कुछ बच्चों को पाठशाला-परिसर में दाख़िल कराने से हम हर साल चुक ही जाते हैं । आख़िरकार ये कुछ, जो कुछेक नहीं बल्कि लाखों में होते हैं घुमा-फिराकर बालश्रमजनित कार्यों में धकेल दिये जाते हैं । क्योंकि ऐसे अल्पकालिक अभियान उत्सवी-दृष्टि या फिर तदर्थवाद के शिकार हो जाते हैं । यहाँ जोर आँकड़ों पर होता है वास्तविक उद्देश्यों पर नहीं । यह हमारे दर्जसंख्या वृद्धि अभियानों की वास्तविकता है।
हम अपने नौनिहालों की अशिक्षा के महाप्रश्नों लिए सुने-सुनाये और गैर परीक्षित तर्कों का सहारा लेकर अपना पिंड छूडा लेते हैं । यह हमारी नागरिकता के हीन बोध और विचारहीनता का ही तक़ाजा है कि गरीबी, शैक्षणिक साधनों के अभावों को ही अपनी अशिक्षा के कारणों में तलाशते हैं । यह सरासर झूठ है कि गरीबी प्राथमिक शिक्षा को हतोत्साहित करती है । कोई गरीब माँ-बाप नहीं चाहता कि उसके बच्चे उसकी पीड़ाओं और दंशो का उत्तराधिकारी बनें । वह इसीलिए शिक्षा को अपनी स्थिति को पलटने का अस्त्र मानता है । माहौल मिलने पर गरीब से गरीब माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य सुधारने के लिए अनेक त्याग करने को तत्पर रहता है । फिर ऐसा कौन बच्चा होगा जो अपने साथियों को स्कूल में जाते देखकर भी बकरी चराने जाने, मालिक के घर में नौकरी करने की ज़िद करेगा । अपने लिए श्रेयस्कर मानेगा । शायद कोई नहीं । वह मजबूर नहीं होता । पालक, मालिक और समाज तीनों मिलकर उसे मजबूर बना देते हैं । वह बाल मजदूर बन जाता है । ऐसे लोग उसके बालश्रम को गरीबी निवारण में योगदान मानते हैं । ऐसे वक्त क्या वे एक बच्चे के भविष्य की समस्था संभावनाओं का रास्ता नहीं रोकते होते हैं ?


प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्यता के पीछे न तो परिवार और ग़रीबी की कड़वी सच्चाई है न ही परिवार के अर्थोपाजन में बच्चों की बांछित सहभागिता का प्रश्न कि ऐसे बच्चे चाहकर भी शाला से नहीं जुड़ सकते । शिक्षा के प्रति अभिभावकीय उदासीनता, शिक्षा तंत्र की कुव्यवस्था, रोजी-रोजगार में शिक्षा की असंगतता और असमर्थता आदि सारे तर्क भी अबोध और रटे-रटाये हैं जो हमारी नकारात्क मानसिकता की ग्रहणशीलता के परिचायक हैं जिससे शत-प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य को हम हस्तगत नही कर पाये हैं ।


जो बच्चे स्कूल से बाहर होते हैं वे कुल मिलाकर बालश्रमिक ही होते हैं । चाहे वे वेतन हीन या परिवारिक कार्यों में हाथ बटायें या फिर किसी कठिन या सरल कार्य से रोजी अर्जित करें । ये भविष्य के गरीब ही होते हैं । हर तरह का बाल श्रम बच्चे के संपूर्ण विकास तथा बढ़ोतरी को नुकसान पहुँचाता है । किसी भी तरह के बालश्रम का समर्थन प्राथमिक शिक्षा के व्यापीकरण का विरोध ही है । बालश्रम का संपूर्ण उन्मूलन ही प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण का मूल रास्ता है । बालश्रमिकों के नाम पर पृथक और समानांतर परियोजना भी इसका विकल्प नहीं है । ऐसा माने बिना सभी बच्चों को पाठशाला के रास्ते पर नहीं लाया जा सकता । यदि यह सच नहीं होता तो रंगारेड्डी और आंधप्रदेश के हजारों गाँवों में इस दर्शन के सहारे शत-प्रतिशत बच्चों को शाला में लाया नही जा सकता और न ही वे निरंतर आगे की कक्षाओं में जाते । छत्तीसगढ़ भी यदि वास्तव में अपने सारे बच्चों को स्कूल में देखना चाहता है तो क्या उसे एम.वी. फाउंडेशन की उस रणनीति पर फिर से विचार नहीं करना चाहिए जिसे वह अराजक मानने का भूल कर चुका है पर जिसे मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु दिल से अपनाकर अधिक से अधिक बच्चों को पाठशाला तक पहुँचा चुके हैं ?

Saturday, June 14, 2008

पश्चिम में अब रेडियो अधिक रेडियो कल भी था, कल भी रहेगा -अंबरीन हसनात

रेडियो सलाम नमस्ते की वाइस प्रेसिडेंट से बातचीत
(सहयोग- आदित्य प्रकाश सिंह)


1. अमेरिका जैसे पश्चिमी माहौल वाले देश में हिंदी रेडियो (रेडियो सलाम नमस्ते)लांच करने के पीछे आपकी सोच क्या थी ? इसके मूल में व्यावसायिकता थी या हिंदी का विस्तार या वैश्विक अनुसमर्थन या कुछ और ही ?
- रेडियो सलाम नमस्ते के लांच का मुख्य कारण डैलास की कंप्यूनिटी में एकता पैदा करना था और साथ ही साथ हम यह भी चाहते थे कि देश से दूर परदेश में रहने वाले देशी जनता के पाश उनकी तफ़रीह(मनोरंजन) का कोई सामान मुहैया किया जा सके । हमारा मकसद था कि दक्षिण एशियायी इस चैनल के ज़रिये अपनी भाषा सुन सकें और हिंदुस्तानी संगीत के ज़रिये अपनी संस्कृति को याद रखें । ये और बात है कि समुदाय और स्थानीय व्यावसाय का समर्थन और हमारी टीम उन तक मेहनत की वज़ह से हमे ना सिर्फ़ वित्तीय कामयाबी मिली बल्कि अंतरराष्ट्रीय शोहरत भी मिली ।


2. अमेरिका से वैश्विक रेडियो लांच करते वक्त रेडियो के समक्ष विद्यमान चुनौतियों को आपने किस तरह मूल्याँकित किया ?
-किभी भी नये व्यवसाय की तरह रेडियो सलाम नमस्ते को भी बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा । मसला न सिर्फ पैसों का था बल्कि अच्छी कला का भी था । क्योंकि डैलास में रहने वाले ज्यादातर देशी युनाइटेड़ स्टेट्स में काम की तलाश में आते हैं । सभी की पृष्ठभूमि गैरमनोरंजनात्मक क्षेत्र से होता है जिसकी वज़ह से अच्छे कलाकार की कमी बहुत ज्यादा महसूस होती है । कहने का आशय स्तरीय और योग्य कलावंतों को प्राथमिक दौर में तलाशना हमारे लिए दुष्कर कार्य था । इन कलावंतों की पहचान और संपर्क साधने की बात भी थी । इसके अलावा सिर्फ चंद लोगों के साथ इतनी बड़े व्यवसाय की बुनियाद रखना नामुमकिन नहीं लेकिन मुश्किल ज़रूर है । आप स्वयं समझ सकते हैं कि हिंदी रेडियो की उपलब्धता और आम हिंदीभाषियों में उसकी पहुँच बनाने में हमें किन-किन रास्तों से गुजरना पड़ा होगा । ऊपर से कानूनी औपचारिकताओं और मापदंड़ो में भी हमें खरा उतरना पड़ा होगा, पर हम ने हिम्मत नहीं हारी और अपने काम में ड़टे रहे ।


3. रेडियो सलाम नमस्ते की रणनीतियों में रेडियो की वापसी और उसकी प्रतिष्ठा जैसे उद्देश्यों को कैसे तरजीह दिया जा रहा है ?
- सलाम नमस्ते की शुरुवात प्रकारांतर से रेडियो की वापसी ही है । अमेरिका और पश्चिमी देशों में लोग टी.व्ही. से लगभग उबने लगे हैं । उन्हें अब टी.व्ही चिढाने-सा लगा है । रेडियो वहाँ पहले से था पर एक दौर ऐसा आया था जब ये इलेक्ट्रानिक मीडिया एक तरह से रेडियो को लीलने लगा था । शहरी वातावरण से रेडियो एक प्रकार से गायब होने लगा था किंतु अब रेडियो अधिक विश्वसनीय और दोस्ताना लगने लगा है । फिर से । यह मनोवैज्ञानिक रूप से सच है कि रेडियो के प्रति आम परिवार में जितना चिढ़ नहीं है उतना चिढ़ टी.व्ही के प्रति है। ऐसी परिस्थिति में रेडियो सलाम नमस्ते से यदि किसी तरह रेडियो की वापसी जैसी कोई स्थिति बनती है तो यह एक योगदान हो सकता है । हम रेडियो को पुनरप्रतिष्टित करने के लिए ही इसे इंटरनेट पर ऑनलाइन भी रख रहे हैं ताकि यह विश्व के श्रोताओं तक रेडियो के रूप में अलख जगा सके । एफ.एम. पर तो यह है ही । हम आने वाले दिनों में कुछ ऐसे खास आयोजन भी करने वाले हैं, रणनीतिपूर्वक ताकि लोगों में रेडियो के प्रति आस्था बढ़े ।


4. रेडियो सलाम नमस्ते को बहुभाषीय चैनल बनाने के पीछे कौन-सा लक्ष्यबोध है ?
- जैसा कि आप हमारे रेडियो के नाम से ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह रेडियो किसी एक मजहब या जात को प्रमोट नहीं करता बल्कि यह परदेश में रहने वाले तमाम साउथ एशियन (देशी) लोगों के लिए है । हिंदुस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में कुल मिलाकर तकरीबन 25 भाषायें बोली जाती हैं और हमारे खयाल में ये बहुत जरूरी है कि हम ज्यादा से ज्यादा इन भाषाओं को प्रमोट करें । वर्ना कहीं ऐसा न हो कि देश से बाहर लेने वाले नयी नस्ल कहीं अपनी पहचान ना खो दे । चैनल को बहुभाषीय स्तर पर प्रतिष्टित करने के मूल में भाषायी विभिन्नताओं के खतरों को शिथिल करने की जद्दोजहद भी है ताकि भाषायें सेतु बने, उन्हें लेकर मन मे भेद न रहे । वैश्वीकरण के इस दौर में एक ही भाषा अर्थात् अंग्रेजी के वर्चस्ववादी दीवारों के बीच भारतीय भाषाओं को वैश्विक परिवेश में ढालने की पहल के रूप में भी रेडियो सलाम नमस्ते को देखा जा सकता है किन्तु इसका दावा करना हमारे लिए अविनम्र कदम भी हो सकता है सो हम इसे भविष्य में आंकना चाहेंगे । अभी इसे दृढ़ता से कहना अवैज्ञानिक और अतिशयोक्ति होगी ।

5. रेडियो में हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं और लोकभाषाओं को वैश्विक बनाया जा सकता है ? इसकी संभावना को आप कैसे आंकते हैं ।
- हिंदी, ऊर्दू, पंजाबी और बहुत सी दूसरी भाषायें अब मुख्यधारा में भी पहचानी जाने लगी हैं और एक साउथ एशियन मीडिया चैनल होने की वजह से ये हमारा फ़र्ज है कि हम इन भाषाओं का प्रचार करें और इन्हें लाइम लाइट में लें । भारतीय भाषायें ही नहीं विश्व की कई भाषायें व्यवहार के अभाव में काल के गर्त में जा चुकी हैं । यह सभी को विदित है । आज जिस तरह की भाषायी राजनीति विश्व-बाजार में अपनी ताकतों का विस्तार कर रही है वह कम खतरनाक नहीं । यह प्रकारांतर से किसी एक भाषा की दुनिया को गढ़ने जैसा कदम साबित होने वाला है । क्या इसे अन्य भाषा की समाप्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए । सच कहें तो यह मनुष्यता के कई शैळियों के ध्वस्तीकरण की चालाकियाँ हैं । ऐसे संकटों का जो मूल्याँकन कर सकेगा जाहिर है कि वह क्योंकर अन्य प्रिय और समृद्ध किन्तु कमजोर पड़ती भाषाओं को विश्व फलक पर लाने का जोखिम नहीं उठायेगा । भाषायी विविधिता को बचाये बिना वैश्वीकरण बेकार है । यह ज्ञान, तकनीकी, विरासत, संस्कृति की विविधता को भी खत्म करने जैसा हो सकता है । अब जबकि वैश्वीकरण में भी गुजांयस है - खासकर सूचना और संचार की प्रविधियों में, जहाँ प्रिय और स्थानीय भाषाओं को विस्तारित करना ज्यादा कठिन नहीं तो रेडियो सलाम नमस्ते जैसे प्रयासों से विभिन्न संस्कृतियों, अभिरुचियों और मन की संवेदना को बचाया जा सकता है । और जाहिर है भाषाएं इनके मूल में हैं । आप इंटरनेट को ऐसी सकारात्मक दिशा में देख सकते हैं ।


6. क्या पश्चिम और खासकर अमेरिका में रेडियो की वापसी हो रही है ? क्या रेडियो की वापसी पूर्णतः संभव है ? क्या आपकी कोई खास कार्ययोजना है ?
- इसमें कोई शक नहीं है कि एफ.एम के आने से रेडियो बहुत तरक्की कर रहा है और हम चाहते हैं कि बढिया कार्यक्रम के ज़रिये हम उसे बहुत आगे ले जायें । हमारी आशा है कि ऊपरवाले की दया से और हमारे सुनने वालों की मदद से हम ज्लद ही युएसए के कई दूसरे शहरों तक पहुँच जायेंगे और वह दिन दूर नहीं जब रेडियो सलाम नमस्ते का नाम दुनिया के दूसरे देशों में भी सुना जा सकेगा ।


7. अत्याधुनिक तकनालॉजी वाले वैश्विक परिवेश में जहाँ बहुवैकल्पिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं रेडियो के प्रति विभिन्न वर्ग के श्रोताओं का रूझान कैसा है ? अंतरजाल यानी इंटरनेट की भूमिका इसमें किस तरह उपयोगी साबित हो रही है ? विस्तार से बताना चाहेंगे ।
- आज के दौर में जब बच्चे-बूढ़े और ज़वान सभी कंप्यूटर का इस्तेमाल आसानी से कर लेते हैं.... हमारी ऑनलाइन ब्राडकास्टिंग की वज़ह से सिर्फ युएसए की दूसरी स्टेट के श्रोता ही नहीं बल्कि दुनिया के कई दूसरे देशों में हमें सुना जाता है । हमारी ऑनलाइन सर्विस के ज़रिये लोग डैलास या न्यूयार्क में बैठे-बैठे गीतों के माध्यमस अपने मुहब्बत भरे संदेश भारत में रहने वाले अपने परिवार तक पहुँचा सकते हैं ।
हमारी ऑनलाइन सर्विस को सभी सुनने वाले बहुत पसंद करते हैं क्योंकि इसके ज़रिये रेडियो की कवायद नहीं होती, यदि उनके पास इंटरनेट की सुविधा है तो वे आसानी से सलाम रेडियो नमस्ते का मजा ले सकते हैं ।


8. हिंदी के वैश्वीकरण में रेडियो की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं ? इस दिशा में सरकार, समाज और मीडियाकर्मियों से कैसी अपेक्षा करते हैं ?

- हमारा मकसद है कि हम भारतीय भाषाओं और संस्कृति को जितना हो सके उन्नत बनायें क्योंकि अमेरिका में पलने वाली इस नयी नस्ल के लिए अपनी बुनियाद अपने जड़ों की पहचान कराना बहुत जरूरी है ।
मानस जी, जहाँ तक हिंदी के वैश्वीकरण का प्रश्न है और इसमें रेडियो की भूमिका मूल्याँकन है उसे लेकर मेरे मन में सकारात्मक विचार हैं । हिंदी का वैश्वीकरण में रेडियो बहुत रसमय और आकर्षक श्रव्य माध्यम है । इस में आप कई ऐसे रेडियो का नाम जानते हैं ही हैं जिनके हिंदी प्रसारण समूचे दुनिया में प्रसिद्ध हैं । यह केवल समाचारों या मनोरंजनात्मक चीजों का ही प्रसारण नहीं है अपितु हिंदी की ताकत और उसमें विद्यमान शक्ति और संस्कृति का भी प्रसारण है । हिंदी के वैश्वीकरण में जैसा कि हम सभी जानते हैं आज इंटरनेट सबसे कारगर भूमिका में है और जिसके माध्यम से हिंदी भाषा, साहित्य, गीत, संगीत, संस्कृति, आदि समूचे विश्व के लिए एक क्लिक पर उपलब्ध होने लगा है । ऑनलाइन पाठ्य सामग्री और ऑनलाइन दूरदर्शन के बनिस्पत रेडियो या ऑनलाइन रेडियो ऐसा घटक है जिसे किसी अन्य कार्य के मध्य भी सुन सकते हैं । रेडियो का आँख मूँदकर श्रवण भी अपनी ज़मीन की पहुँच सुलभ बना देता है । यहाँ श्रोताओं का भावबोध कहीं अधिक कारगर हो उठता है । संक्षेप में कहें तो रेडियो हिंदी सहित अन्य भाषाओं की वैश्विक स्थापना के लिए अतिमहत्वपूर्ण तकनीक है । जाहिर है विश्व बाजार में ऐसे रेडियो चैनलों की स्थापना को लेकर संबंधित देशों को अधिक उदार होना होगा ताकि उस देश के विविध भाषाभाषियों के लिए मनोरंजन सह ज्ञान का श्रव्य साधन भी उपलब्ध हो । विदेशों में भाषिक आधार पर गठित हिंदीभाषी संगठनों को भी जागरूकता का परिचय देना होगा । इसमें संस्कृतियों के संरक्षण का पाठ भी है । मीडियाकर्मियों को ऐसे कला माध्यमों को सकारात्मक दृष्टि से स्वीकारना चाहिए । खासकर उन्हें जो दृश्य माध्यमों के ग्लैमर और नोटों की वर्षा में नहा रहे हैं । यह दृश्य माध्यमों की विकृतियों से भाषायी समाज या समुदाय को बचाने जैसी भी उदारता होगी और इसकी जरूरत मैं समझती हूँ इस समय अधिक है ।


9. भारतीय रेडियो चैनलों के बारे में आप क्या सोचते हैं ? इस दिशा में सुधार के कदम किस तरह उठाये जा सकते हैं ? खासकर सरकारी नीतियों में किस तरह अधिकर खुलापन लाया जा सकता है ?
- युएसए में ज्यादा देशी रेडियो चैनल्स लोग शौकिया शुरू करते हैं, बिना किसी योजना के । ना उनके पास सही वित्तीय समर्थन होती है ना ही अच्छे कलाकार, जिस वज़ह से सुनने वाले उनकी मेहनता का उतना फायदा नहीं उठा सकते और निम्न व्यावसायिक योजना के कारण से उनका व्यापार या स्टेशन आखिर कार बंद हो जाता है ।
मैंने सुना है कि भारत में भी स्थानीय स्तर पर रेडियो चैनलों की स्थापना पर जोर दिया जा रहा है । और वहाँ नीतिगत उदारता भी है । रेडियो चैनलों की शुरुआत के लिए कानून यदि अधिक प्रजातांत्रिक और सरल हों तो भारत जैसे देश के लिए यह सुखद होगा । भारत की सांस्कृतिक और भाषायी विविधिता के संरक्षण के लिए भी यह एक कारगर कदम होगा । सामुदायिक रेडियो का विस्तार ग्रामीणों के उत्थान के लिए आवश्यक है । इस दिशा में भी वहाँ निर्णय लिया जाना चाहिए । रेडियो चैनलों की स्थापना के लिए प्रारंभिक शुल्क को किस तरह कम किया जाना चाहिए यह भी सोचने का विषय हो सकता है ताकि एक घराने के स्थान पर कुछ क्रियाशील समूह भी ऐसे रेडियो स्टेशनों की शुरुआत करने की हिम्मत जुटा सकें ।


10. अन्य सभी माध्यमों के बीच रेडियो अपना भविष्य किस तरह निर्धारित करेगा ?
- टी.व्ही. का मजा उठाने के लिए देखने वाले को सब काम छोड़कर एक जगह बैठना होता है जबकि रेडियो के लिए सिर्फ कान दरकार है । जिसकी वज़ह से रेडियो हर जगह लोगों के साथ रहता है । आजकल की तेज रफ़्तार ज़िंदगी में लोगों के पास वक्त कम होता जा रहा है और वा कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेना चाहात है और इसी वज़ह से रेडियो मनोरंजन अधिक सुविधाकारी है । दूसरा यह के टी.व्ही. पर आये दिन नये कार्यक्रम और नये कलाकार आते हैं जिनके साथ देखने वाले का कोई संबंध नहीं बन पाता जबकि रेडियो के प्रस्तोता का अपने सुनने वाले से आवाज़ का एक अनदेखा पर बहुत ही करीब का रिश्ता होता है । सो हमें टी.व्ही. चैनल्स से कोई डर नहीं.... रेडियो कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा । सलाम नमस्ते ।

Tuesday, June 10, 2008

सबरंग में कौन

11 जून व्यस्ततम दिनों में से एक निकला ।
आदित्य जी का ई-पत्र आया है और फोन भी । ई-पत्र ज़रा विलंब से पढ़ सका । यानी आज । क्योंकि कल दिन भर दिल्ली से प्रकाशित सोपान नामक मासिक पत्रिका से जुड़े मित्र उमाशंकर मिश्रा के साथ लगा रहा । सोपान ग्रामीण विकास की मीमांसा करने वाली स्वयंसेवी संगठन की पत्रिका है । पठनीयता भी है उसमें । बायलैग्वल है – हिंदी और अँगरेज़ी में छपती है । उमा बता रहे थे अब उड़िया भाषा में भी वह पढ़ी जा सकेगी । जेट्रोफा की खेती को लेकर जिस तरह का शोषण और लूट हुआ है भारतीय किसानों की वह सरकारी नीति के दोगलेपन की चुगली तो करती ही है । इस माह के अंक में उसकी परत दर परत पड़ताल की गई है । मित्र को धन्यवाद जो उसने पत्रिका की एक प्रति मुझे भी भेंट की और कुछ लिखने का आग्रह किया । मानसून आ धमका है शायद इधऱ । फुहार की भाषा से तो यही लग रहा था । मित्र आया तो मुझे स्कूटी में बैठकर शहर घूमने और भींगने का आनंद भी मिल गया । शुक्र है कि सर्दी नहीं लगी । मित्र सलवा जुडूम यानी नक्सलवाद के खिलाफ बस्तर मे चल रहे आंदोलन (आदिवासियों के द्वारा) का जायजा लेना चाहते हैं । बस्तर जाने की भी उनकी इच्छा है । वैसे तो बस्तर मे पत्रकारों को नक्सली नहीं सताते । पर क्या पता कब क्या हो जाये । उनकी इच्छा थी कि मैं भी साथ चलूँ । पर... कल रायगढ़ जाना है ।


अथ आदित्य उबाच.....
लिखते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी..... । भई क्यों नही जायेगी ? और क्यों नहीं जाना चाहिए ? बात इसीलिए तो की जाती है कि वह कहीं तो जाये । मैं उनके पत्र में खो जाता हूँ.....
आज से १० वर्ष पहले एक भारतवासी उच्च शिक्षा हेतु अमेरिका आया था, यहाँ आकर उसे लगा उसकी हर तमन्नाएँ पूरी हो जायेगी और जुट गया सपनों को पूरा करने में । फिर भी भीड़ मे कहीं ना अपने को अकेला महसूस कर रहा था । आख़िर मिल गयी एक सुनने एवं समझनेवाली एक रूसी बाला । चढ़ गया प्रेम रंग और चल पड़ी जीवन की नौका । बड़े गर्व से यात्रा कर आया भारत । साथ मे रूसी पत्नी जो थी । पाँच वर्षों मे एक पुत्र की प्राप्ति हुई साथ-साथ रूसी बाला को ग्रीन कार्ड भी मिल गया । ग्रीन कार्ड प्राप्त होते गोरी के नखरे शुरू हो गए, भारतीय भोजन, मित्र, संगीत सब उसे अब सरदर्द साबित होने लगे । बेचारा भारतवासी असमंजस मे आ गया, उसके सारे भारतीय मित्रों पर रोक लग गयी, अपने ही घर में चावल-दाल-सब्जी तक पकाने की मनाही ।पूजा-पाठ के सामान सब गराज मे रख दिए गए ।
भारतीय होने के नाते उसने लाख कोशिश की पर कोहरा और घना होता चला गया । आख़िर वही हुआ जिसका डर था तलाक-डिवोर्स ।


आज स्थिति यह है कि अपने ही पुत्र को कोर्ट के आदेशानुसार मात्र शनि एवं रविवार रख पाता है । पुत्र जोशुआ सोम से शुक्र अपनी मम्मी के साथ रूसी जीवन जीता है और फिर शनि-रवि टूटी-फूटी हिन्दी में अपने भारतवासी पिता के साथ ।
सचमुच अमेरिका मे विविधताओं की कमी नही ....................


आख़िर भारतवासी की माँ भी अमेरिका अपने पौत्र को देखने पहुंची , कहते है भाषा एवं माँ -निश्छल होती है । अपने पौत्र का अभिनन्दन तिलक-टीके से किया पर रूसी बाला को यह भी एक जादू-टोना का तिल्स्सम सा लगा भारतीय संस्कृति की हर परम्परा दिन ब दिन अस्वीकार कर कर दी गयी और रूसी बाला का स्वार्थ से भरा चेहरा साफ दिखने लगा । अमेरिका मे ऐसी घटनाएँ ही भारतवंशियों के मन मे कई संशय भरे प्रश्न खड़ा कर देते हैं ।


आज इतना ही फिर कभी.....अमेरिका की विविध तावों पर कुछ न कुछ लिख भेजा करूंगा ।
अब इस यथार्थ को लेकर कुछ प्रश्न भी न उठें तो बात भी कैसे दूर तक गई । इस वक्त मन में बहुत उमड़न-घुमड़न है ।


सबरंग पर पूर्णिमा दीदी...
आदित्य जी का आग्रह है कि मैं रेडियो सबरंग पर पूर्णिमा वर्मन की गुच्छा गुलमोहर का पारूल की आवाज़ मी एक बार सुने । वे पूर्णिमाजी का टेलिफून नम्बर भी चाहते हैं । बतियाने के बड़े विश्वासी जो हैं आदित्य । अब मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि दीदी संपूर्णतः अंतर्मुखी हैं । विदेश में भी रहकर भारतीयता को दिल से जीती हैं । हमारे जैसे फटीचर भाई को भला कैसे फोन नम्बर दे सकती हैं । वैसे दीदी जब शादी होकर चली जाती है ससुराल तो वह भाईयों की नही रह जाती । दोस्तों की नहीं रह जाती । कई बार वह अपने माँ-बाप की भी नही रह जाती । वह अपने नये परिवार के आदर्शों और मूल्यों पर स्वयं को अधिनियंत्रित करती है । चाहे दुख से या फिर चाहे निजी संस्कारों या इच्छा से । कई बार फोन नम्बर देना भी सिरदर्द साबित हो जाता है । फिर दीदी का बड़ा काम है हिंदी अंतरजाल पर । रात दिन लगी रहती हैं । वैसे मैं आदित्यजी को यह बताना चाहूँगा कि दीदी पहले मुझसे बहुत सारी रचनात्मक बातें कर लेती थी । पर पता नहीं क्यों अब चुप्पी साध ली हैं । मुझे लगता है यह तब से हुआ जब से मैं सृजनगाथा के संपादन में व्यस्त रहने लगा । खैर...

Sunday, June 08, 2008

रसास्वाद और पाठ का पर्याप्त आग्रह

जब तक हिंदी के प्राध्यापकों ने अपने उत्तरदायित्वों को संपूर्ण रचनात्मकता के साथ निभाया तब तक हिंदी आलोचना गतिमान बनी रही । उसे ठोस ज़मीन मिलती रही । वहाँ सबकी खोज-खबर होती रही । सबकी धुलाई-पोंछाई होती रही । तब वहाँ केवल शास्त्रीयता का आग्रह नहीं था अपितु नये विकल्पों की मीमांसा भी हो रही थी । इतिहास में इसकी संपूर्ण गवाहियाँ हैं । नये काव्य और इसी तरह भाँति-भाँति के आंदोलनों से आलोचना का सूत्र उसकी मुट्ठी की पकड़ से बाहर होता चला गया । इसमें विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा में डिग्री की अपरिहार्यता और उसके अर्थलाभ से जुड़ते चले जाने का घटाटोप भी कम उत्तरदायी नहीं । धीरे-धीरे आलोचना प्राध्यापकों के हाथ से रचनाकारों के कब्जे में जाने लगा ।

रचनाकारों के आलोचक हो जाने से हिंदी आलोचना को नया आयाम तो मिला किन्तु वह गुटनिरपेक्ष नहीं रह सकी । वह निजी मुगालतों के फिलसन की शिकार होने लगी । रातों-रात अखिल भारतीय बनने-बनाने का गोरखधंधा चल निकला । इस दरमियान आयातित विचारों के बादलों की गड़गड़ाहट से भी हिंदी आलोचना की शास्त्रीयता और गतिमयता भोथरी होती रही । भले ही साहित्य को परखने के नये-नये सौदंर्यशास्त्रों से लेखकों-पाठकों का परिचय हुआ किन्तु इन्हीं कारणों से जो सबसे बड़ी हानि हुई, वह है – केवल चित-परिचित या समानधर्मा रचनाकारों की ‘पूँछ-परख’ । यह ‘पूछ-परख’ भी होती तो कदाचित् नयी पीढ़ी के रचनाकारों को एक आश्वस्ति मिलती । आज भी हिंदी की दुनिया में इसी दौर की नदी अबाधता के साथ बहे जा रही है। ऐसे दौर में जब पद्मश्री मुकुटधर पांडेय को छायावाद के जनक के रूप में स्थापित करने का संघर्ष और उसमें सफल हाने वाले आलोचक (शिक्षाविद्) डॉ. बलदेव का बिना किसी वादाग्रह के डॉ. जे.आर.सोनी जैसे रचनाकार के समग्र (अब तक लिखे गये) के आधार पर उनके व्यक्तित्व का परीक्षण हमारे सम्मुख आता है तो वह सुखद क्षणों का अवसर मुहैया कराता जान पड़ता है ।

इधर आधुनिक छत्तीसगढ़ी लेखन में श्री सोनीजी प्रमुख कथाकारों में गिने जाते हैं । यों तो छत्तीसगढ़ी में लिखे गये उपन्यासों को उँगलियों में गिना जा सकता है किन्तु चंद्रकला, पछतावा और उढ़रिया उपन्यासों के कथ्य पारंपरिक विषयवस्तुओं को तोड़ते हैं । वे समकालीन यथार्थ और संघर्ष के मध्य नये पाठ की तरह हैं । बलदेव जी इन उपन्यासों को नये आस्वाद के साथ पढ़ने के सारे संकेतों को यहाँ बड़ी सरलता से जुटाते जान पड़ते हैं । चंदकला को आंचलिक उपन्यास की तरह पढ़ा जाय तो उसे छत्तीसगढ़ के समकालीन जीवन की गंभीर पड़ताल भी कहा जा सकता है । कथासंग्रह मितान, नगमत, नीरा और रंग-झांझर भी हमे निहायत यथार्थ की ओर ले जाती हैं । यहाँ जो भी कथायें हैं वे अपनी सादगी में पाठकों को बाँधे रखने में सक्षम हैं । यह दीगर बात है कि शिल्प को ही कहानी मानने के आदी हो चुके समकालीन पाठकों को यहाँ निराशा हो सकती है । सोनी जी अपने व्यक्तित्व से दूर कभी नहीं जाते । यहाँ भी उनका व्यक्तित्व उनकी रचनाओं के साथ पूर्ण सामंजस्यता बने हुए है । ऐसा कम होता है कि दोनों मे एकाकार हो । कृतिलेखक बलदेव को नये पाठक इस समीक्षा के लिए भी याद रखना चाहेंगे ।
मैं निजी तौर पर सोनीजी को उनकी यात्राप्रियता के लिए भी जानता हूँ । यात्रा को वे पर्यटन नहीं अपितु नये अनुभव की यात्रा के रूप मे देखते रहे हैं । वे चीज़ों को उसके आरपार देखने के प्रयास मे सफल रहे हैं । यद्यपि उनकी जटिलता और संश्लिष्टता उतना सरल नही है जैसा हम देखने के आदी हैं । मैं स्वयं मारीशस को छोड़कर इंग्लैंड और श्रीलंका की साहित्यिक यात्रा में उनके साथ रहा हूँ । इस बीच उनके व्यक्तित्व को गहरे से समझने का मुझे भी बड़ा मौका मिला है । मॉरीशस, श्रीलंका और इंग्लैड पर लिखी गई उनकी किताबें सामान्य से सामान्य पाठकों के लिए भी सांस्कृतिक यात्रा का सुखद आस्वाद जुटाती हैं । डॉ. बलदेव की माने तो कई बार वे सूचनाओं के संकलक जैसा भी ज़रूर दिख पड़ते हैं पर इसकी भी महत्ता ऐसी किताबों के बहाने साबित तो हो ही जाया करती हैं । बलदेव जी ने उनकी काव्यात्मक संस्मरणों का विशद अनुशीलन किया है इस किताब में ।
वे देश-परदेश सर्वत्र और सर्वदा जे.आर.सोनी बने रहते हैं । वे कभी भी अपने होने को द्विविधा के पचड़े में नहीं उलझाते । उनका लोकधर्मी व्यक्तित्व कभी भी पराये आलोक की चकाचौंध में नहीं उलझ सकता । उनकी सात्विकता उनके व्यक्तित्व की निशानी है । बाह्याभ्यंतर से वे सात्विक हैं । इसलिए दलित लेखन के बाद भी वे दलितों के समय-सम्यक आक्रोश को तवज्जो नही देते । खासकर अपनी लेखनी में । उनके पात्र सदैव मर्यादा और समाज-सम्यक विकास के लिए निजी संघर्ष को वरेण्य मानते हैं । उनके सहयोगी स्वभाव का भी विशद उल्लेखीकरण भी इस कृति को पठनीय बनाता है । पठनीय इसलिए कि सोनी जी जातिवादी मानसिकता के लेखक नहीं । वे मनुष्यता के लेखक हैं । इसलिए वे निजी जीवन में भी लेखकों, कलाकारों, सहकर्मियों और ज़रूरतमंदों के सहयोग मे आगे देखे जाते हैं ।
यूँ तो जातिगत चेतना के कोण से देखने वालों को सोनीजी का अब तक का लेखन वंचितों को समर्पित प्रतीत होगा । इसके बावजूद उनमें वह पूर्वाग्रह नहीं है जिससे साहित्य का मूल मापंदड़ खंडित होता है । साहित्य निहायत निजी नहीं होता । साहित्य बहुजन के लिए भी नहीं होता । उससे भी बढ़कर वह सबका होता है । यही उसका होना है । साहित्य यानी सहित । सहित भाव ही साहित्य का प्रजातंत्र है । भले ही वह अपने में संपूर्णः न हो । भले ही उसमें सबके स्वप्नों की सरंक्षण-क्षमता न हो । पर उसमें यदि किसी का भी अवमानना है तो वह सहित भाव दूरी बनानेवाला शब्दों का भूसा के अलावा कुछ नहीं । कृतिकार ने जगह-जगह यह सिद्ध किया है कि निजी आक्रोश तो जैसे उनके(सोनीजी) यहाँ मिलता ही नहीं । भले ही दलित आलोचकों को इसमें निराशा हो सकती है कि सोनीजी एक बड़े दलित लेखक बनते-बनते चुके जा रहे हैं पर उनका दलित चिंतन इससे कहीं भी भोथरा नहीं होता, बल्कि वे भारतीय जीवन पंरपरा की वैचारिक ज़मीन और सामाजिक यथार्थ के पहाड़ दोनों को नाप कर निष्कर्ष देते हैं । यही उनका रचनात्मक संघर्ष भी है । डा. बलदेव कहते हैं – ‘’डॉ. सोनी ने किसी को गुरू नहीं बनाया, वे तो जन्मजात गुरू घासीदास के शिष्य हैं ।‘’ हिंदी में दलित लेखन को हम बाबा अंबेडेकर के विचारों से अनुकूलन करते चलते हैं । यह अनुकूलन दलितों, वंचितों, पिछड़ों और सताये गये लोगों को एक गहरी आत्मीयता और आत्मविश्वास भी उपलब्ध कराता है । पर कहीं न कहीं किसी वाद की ओर भी धकेलता है । सोनी जी का दलित चिंतन इस मायने में भी भिन्न और नये आलोक के साथ निरंतर बना रहा है कि उनके लेखन में गैर दलित साहित्यकारों, आलोचकों, और पाठकों के लिए भी रसास्वाद और पाठ का पर्याप्त आग्रह है । हो भी क्यों नहीं । वे मूलतः संत प्रकृति के हैं । हृदय में वैष्णवता को बिठाये बगैर एक सफल लेखक होना कठिन है और सतनाम के गायक गुरूघासीदासजी के सिद्धांतों, आदर्शों, जीवन-दर्शन को विस्तार देने वाले श्री सोनी वैसा चाह कर भी नहीं कर सकते जो भारतीय समाज की विश्वव्यापी छवि को ध्वस्त करे ।

उनके लेखन में आम आदमी तो सर्वत्र है - अपने दुःख दैन्यता के साथ । पर उसके साथ संपूर्ण समाज भी है जिसका हृदय परिवर्तन ज़रूरी है (जिसमें लेखक को सफल माना जा सकता है) न कि उसके खिलाफ विष-वमन और डॉ. सोनी इस मायने में मुख्यधारा के लेखक हैं । उनकी किताबों (सतनाम के अनुयायी, सतनाम की दार्शनिक पृष्ठभूमि और गुरू घासीदास की अमर कथाएँ) में वर्णित गुरू केवल सतनामी समाज का मार्गदर्शक नहीं । वह संपूर्ण मानवता का हितैषी हैं । डॉ. बलदेव ने इस बहाने सोनी जी की दृष्टि, नैतिकता, विचारधारा की परिपक्वता को तराशा है । किसी लेखक को जानने के लिए बलदेव जी की यह आलोचना पद्धति शुष्कता में भी वर्षा की रिमझिम फुहार की मानिंद है ।

डॉ. बलदेव ने बबूल की छाँव और मोंगरा के फूल (काव्यकृतियाँ) की मींमासा बड़ी बारीक नज़रों से की है । मीमांसाका से सहमति देते हुए निजी तौर पर मै भी इतना ही कहना चाहूँगा कि सोनीजी का काव्याकार उनके गद्यकार से पिछड़ता जान पड़ता है । हो सकता है कि सोनी जी का निजी जीवन प्रशासनिक आपाधापी में गद्यमयता के बीच गुजरने के कारण जीवन के लय, छंद और गति के मध्य सामंजस्य न बैठा पा रहा हो । हो तो यह भी सकता है कि गद्य ही उनका प्रिय माध्यम है । पर अल्प समय में उनका विपुल लेखन बड़ों-बड़ों के लिए इर्ष्या का विषय भी हो सकता है ।

डॉ. बलदेव द्वारा डॉ. जे. आर. सोनी जी पर केंद्रित यह किताब साहित्यानुरागियों के लिए पठनीय, शोध-छात्रों के लिए मार्गदर्शीय, सतनाम अनुयायियों के लिए संग्रहणीय और विमर्शवादियों के लिए विचारणीय है । विश्वास है छत्तीसगढ़ी साहित्य की दिशा को तराशने में संलग्न डॉ. बलदेव और स्वयं डॉ. जे.आर.सोनी की साधना से भविष्य में कुछ और भी सार्थक, और भी महत्वपूर्ण मिल सकेगा । फिलहाल मेरे निजी विचार ऐसे हैं, इत्यलम् नहीं ।

Friday, June 06, 2008

अमेरिका में सामाजिकता निश्चित नहीं ?

फिलहाल अमेरिकन समाज में सामाजिक संबंधों की हालात पर अंतिम निष्कर्ष निकालना कठिन हो गया है । ख़ासकर स्त्री-पुरुष संबंधों पर मुझे दो-दो राय और दो तरह की राय मिली हैं । यह दीगर बात है कि दोनों एक दूसरे को तीर्यक रेखा पर नही काटती पर कहीं न कहीं दोनों की राय से मुझे लगता है अब विवेक का सहारा लेना पड़ेगा । अमेरिका में प्रवासी जीवन बिताना बहुत कठिन लगता है । सामाजिक भविष्य वहाँ कितना सुरक्षित है, कहा नहीं जा सकता । उत्तरआधुनिकता वहाँ से कब की गुज़र चुकी है । अब लोग उससे आगे के जीवन-दर्शन पर केंद्रित हैं या उसकी तलाश में हैं । मैं ठहरा भारतीय जिसे अभी-अभी चार-छः साल हुए उत्तरआधुनिकता के बारे में पढ़ने-सुनने को मिल रहा है । वह भी मात्र साहित्य में । मैं समझ नहीं पाता कि उत्तरआधुनिकता के बाद कौन सा समय आयेगा ? क्या उत्तर-उत्तर आधुनिक समय आयेगा !

मेरे आसपास तो ठीक तरह से आधुनिक समय भी नहीं आ सका है तब कब वहाँ उत्तर आधुनिक समय आयेगा । आज भी लोग और समाज सामाजिक मूल्यों पर जीते हैं । केवल आधुनिक कहलाने की गरज़ से ही कुछ पारिवारिक संबंधों और दैहिक संबंधों के बारे में उन्मुक्त जीवन को तरजीह देते हैं । वैसे उन्हें भी इसका सच्चा अनुयायी नहीं माना जा सकता है । क्योंकि वे अपने एकांत क्षण में एक माता-पिता के रूप में अपराध-बोध से गुज़रते हैं । प्रेम-विवाह मूलतः शहर का रोग है । अइसमे सहशिक्षा का भी योगदान है । समलैंगिकता अभी बहुत दूर है भारत से । जबकि अमेरिका में यह कानूनी रूप धारण करता जा रहा है । दैहिक सुख के पीछे विपर्यय आकर्षण है । इसमें पुरुष और स्त्री की अनिवार्यता है । किसी भी दर्शन के नाम पर उसे हम भारतीय शायद ही समर्थन दें । विवाह को हम एक संस्कार मानते हैं । प्रेम विवाह को भी हम भले ही असामाजिक दृष्टि से लेते हैं पर वैदिक काल और उसके बाद भी ऋषि पंरपरा में उसके चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं ।

आदित्यजी ने लिखा है-
जय प्रकाश,
चलिए मन के अवकाश मे अच्छी बातें कर लेते हैं, आख़िर ब्लॉग का सदुपयोग तो हो रहा
लावण्या जी मुझसे ज़्यादा अनुभवी हैं अत: उनकी हर बात का स्वागत है वैसे अमेरिका कि या किसी देश कि बातें तो हरि अनंत ,हरि कथा अनंता .... जैसी है ?

मैं जब नया-नया अमेरिका मे अपनी पुत्री का स्कूल मे नामांकन कराने गया था तो ऑफ़िस में
पूछा गया कि - आप किस तरह के पिता है ? प्रश्न मेरे लिए अटपटा था । फिर उन्होंने पूछा कि -
१.आप नैचुरल पिता है या
२.सौतेले या
३.गोद लिए हुए ?
एक भारतीय के लिए आप स्वयं सोचें क्या मन :स्थिति होती होगी

यहाँ अमेरिकन मित्रों को एक बार भारतीय शादी की विडियो दिखाई थी, लड़की को फूलों से सजे बिस्तर पर शरमाई-सी बैठी देख सभी ने पूछा कि -क्या लड़की इस शादी से खुश नही ? क्यों चुप सी बैठी है ?
इसे क्यों फूलों के पिंजरे मे बंद कर रखा है ? कौन समझाए इन्हें शर्म-लज्जा कि बात ।

चलिए बातें बहुत है, क्रमश: .......... मंगल कामनाओं के साथ
आदित्य प्रकाश
डैलास

और उधर लावण्याजी का अभिमत है -
अमरीका हो या भारत, एक ही बात हम किसी भी विषय के बारे में नहीं कह सकते ! हर विषय के अपवाद हमेशा ही रहते हैं --अमरीका मेँ कई तरह की विडम्बनाएँ, विषमताएँ, कठिनाइयाँ, यहाँ के रोज के जीवन का हिस्सा हैं – सुख-सुविधा, आधुनिकता के साथ-साथ एकाकीपन, विलुप्त होते पारिवारिक रिश्ते, एक खालीपन, हिंसा, अत्याधिक खुलेपन से उत्पन्न होते टकराव्, व्याभिचार, समलैंगिक संबंध, शराब्, नशीले पदार्थों का सेवन, समाज के लिये, भविष्य के लिये क्या लायें गेये सोचनेवाली बात है"....

यहाँ सामाजिक विषमताएँ ऐसी हो चलीं हैं जिनसे ये एक डर लग रहा है की तथाकथित सामाजिक व साँस्कृतिक मूल्यों का क्या होगा ?
लावण्या जी से विस्तार से पूछना ही पड़ेगा कि वे निजी तौर पर क्या परिवर्तन देख चुकी हैं ? आगे किस तरह का समाज वहाँ विकसित हो रहा है ? क्या इस अनिश्चितता की आँधी में सब कुछ उड़ जायेगा ? भारतीयता भी ? जो अभी वहाँ गर्व से कह पाते है कि वे अमेरिका में भी रहकर मन और आत्मा से भारतीय बने हुए हैं.....

कामचोर इसे ना पढ़ें..

कर्मण्यता वाले मुद्दे मे कुछ अन्य प्रसंगों पर लावण्या दीदी सहमत नहीं है । वैसे उनकी असहमति से भी सहमत हुआ जा सकता है और माना भी जा सकता है कि अमरीका एक ऐसा देश है जहाँ के लोगों कार्यक्षमता, सफलता, इच्छाओँ को पूरा करने, ज़िंदगी को अपने तरीके से जीने की कोई सीमा ही नहीँ । वे अमेरिकन शादी के अन्य पहलूओं पर भी जैसे समलैंगिक विवाह पर भी ध्यान बंटाना चाहती हैं । मैं उस पर भी चर्चा करना चाह रहा था । खासकर भारतीय मूल के परिवारों में युवक-युवतियों की मानसिकता पर..


इस बीच यानी पिछले दो तीन दिनों में चाहकर भी उनसे इस मुद्दे पर विमर्श नहीं कर सका । पर करूँगा ज़रूर । फ़िलहाल तो सुधीर नारायण शास्त्री जी को बधाई देने का मन कर रहा है । सुनेंगे तो आप भी उन्हें तहेदिल से बधाई दिये बिना नहीं रहेंगे । हाँ, बहानेबोजों, कामचोरों, सुस्त लोगों को इससे ज़रूर अरुचि हो सकती है । हो भी क्यों नहीं –

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।

..... पर शास्त्रीजी ने इसे पलटकर रख दिया है । वे कभी भी दाता राम के भरोसे नहीं रहे जबकि वे स्थायी रोजगार पर थे । रोज काम किया । पूरे समय काम किया । हरदम काम किया । बिना थके, बिना रुके । ऐसे ही लोगों के लिए गीता में ‘कर्मयोगी’ प्रयुक्त हुआ है । कृष्ण भी यही चाहते थे कि हर मनुष्य कर्मयोगी बने । जिसे जो भूमिका मिली है उसी को संपूर्णतः जीना ही कर्मयोग है । इस कर्मयोग को शास्त्रीजी ने अपनी कठिन साधना और अटूट विश्वास से साबित कर दिखाया है ।


अलाल सरकारी कर्मियों, नौकरशाहों, अंधे राजनेताओं पर खिसियाते-खिसियाते थक जाने वाले समय में मेरे लिए यह ठीक उसी तरह है जैसे भरी दोपहरी वाली यात्रा में कोई झरना दिख गया हो । शांत, स्निग्ध जल से आपुरित ।

ऐसे किसी कर्मयोगी के बारे में मैंने आज तक नहीं सुना जो जीवन भर नौकरी करता रहे और एक भी दिन अवकाश पर भी न देखा जाय । इस नेक ख़बर के अनुसार बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग [बेस्ट] की समिति के पूर्व सचिव सुधीर नारायण शास्त्री ऐसे ही एक सरकारी कर्मचारी रहे हैं, जिनका नाम छुट्टियाँ न लेने के लिए गिनीज बुक आफ व‌र्ल्ड रिका‌र्ड्स के लिए प्रस्तावित किया जा रहा है।


हो सकता है कि इस समाचार से बहुत सारे भारतीय सहमत न हों और वे यह कहते हुए देखे जायँ कि हूँह – यह तो रिकार्ड के नाम पर किया गया काम है । परंतु इसे मात्र रिकार्ड बनाने की गरज़ से देखा जाना कर्मयोग की तौहीनी होगी । यह कर्मनिष्ठा है जिसकी आज भारत को महती ज़रूरत है । इसके बग़ैर उन्नति के शिखरों को स्पर्श करना कठिन होगा । हर स्तर पर ।

शास्त्री 1977 से बेस्ट की सेवा में आये । एक नवंबर, 1990 को बेस्ट समिति के सचिव का पदभार ग्रहण करने के बाद से अपने अवकाश ग्रहण की तारीख के बीच उन्होंने रविवार के अलावा सिर्फ़ एक अवकाश लिया। वह भी तब जब वे बीमारी के कारण वह चलने-फिरने की स्थिति में भी नहीं थे।

अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान वह प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के लिए जाने जाते हैं। बधाई और प्रणाम उनकी पत्नी शैलजाजी को भी जिन्होंने काम के प्रति अपनी पति की प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्हें छुट्टी लेने के लिए कभी अपने किसी दबाव के घेरे में नहीं लिया ।


शायद ही कोई कामकाजी पति इतना भाग्यशाली होगा जिसकी पत्नि शैलजाजी की तरह नाज़ नखरा न करती हो । गलती से ऐसे जोड़े यदि अपने गाँव शहर से दूर किसी सेवा या नौकरी में हों तो पूछिए मत । ऐसे परिवारों में आये दिन किसी न किसी नये जगह की सैर के लिए विवाद होता रहता है । छुट्टी के दिन बाज़ार की सैर । पार्क की सैर । मीनाबाज़ार की घुमाई । पति की कर्मठता जाये भाड़ में । कार्यालय का काम जाये भाड़ में । आम आदमी जाये भाड़ में ।
जो भी हो यह कामचोर लोगों के लिए पढ़ने योग्य नहीं है ।
शास्त्री जी आपको मैं नमन करता हूँ । शत्-शत् नमन ।

Tuesday, June 03, 2008

अमेरिका में घास छिलते हैं आदित्यजी

अंतरजाल यानी नयी दुनिया रचने का तकनीक
अंतरजाल को लेकर भले ही पुरानी पीढ़ी लाख कुढ़ती रहे । भले ही जड़वादी मानसिकता के शिकार यानी पुरातनपंथी उसे लाखों कोसते रहें कि उससे मानवीय संबंधों की शुचिता बाधित होगी, आदि-आदि; पर अंतरजाल है बड़े ही काम की चीज़ । वह संबंधों की नयी दुनिया रचने का भी कामयाब तकनीक है । वह ऐसी जादुई बस्ती है जहाँ बेघरबार ठिकाना ढूँढ़ सकते हैं । भले ही वह फैंटेसी जैसा क्यों ना हो, वहाँ अज्ञात और अपरिचित से भी मिलने-बतियाने का वर्चुअल स्पेस है । उसे सिर्फ़ कुंठित और दैहिक बोधों के फ़िलॉल्सपी झाड़कर एकबारगी ख़ारिज़ करना बेमानी होगा । और माना कि वहाँ ऐसा होता भी है तो उसमें स्वयं अंतरजाल का कम, ऐसे लोगों की रूचि और आदत का दोष अधिक माना जाना चाहिए । शुक्लता और कृष्णता कहाँ नहीं है । प्रकृति में भी । चयन का विवेक तो मनुष्य को ही जगाना पड़ेगा । सो इसी कथित विवेक के चलते वर्षों पहले एक दिन हम दोनों टकरा गये और आज आत्मीयता को स्पर्श करते संबंध पर दोनों का विश्वास है । मेरे ई-मित्र को आप आदित्य प्रकाश सिंह के नाम से जान सकते हैं ।


आदित्य पिछले डेढ़ दशक से युएसए के डैलास में रहते हैं । उत्तरप्रदेश स्थायी ठीयां । वे रेडियो सलाम नमस्ते में हिंदी साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों के संयोजक हैं । यदि मेरा अनुमान सच है तो यह काम वे शौंकिया तौर पर करते हैं । वैसे पेशे से वे वैज्ञानिक हैं । नेपाल में बड़े बिगड़ैलों को महाविद्यालय में हिंदी पढ़ा चुके हैं । कितना कहूँ उनके बारे में...बड़े ही रोचक और दोस्ती जोड़ू आदमी हैं भाई ।

अंतरजाल के माध्यम से दुनिया भर के कवियों से स्वयं पहल करके बतियाते रहते हैं । कुशल-क्षेम के प्रश्चात जब वे फ़ोन पर ही बानगी की पेशकश करते हैं तो ऐसा कोई कवि नहीं होता जो वहीं मोबाइल या फोन पर न शुरू हो जाय । अमुमन इसी की फ़िराक में ही तो रहता है कवि । पर यदि आप उन्हें प्रवासी जानकर ठग या उलझा नहीं सकते । दूसरों की उत्कृष्ट रचना भी नहीं पढ़ सकते । बड़ों-बड़ों की कविता याद है उन्हें । लगे हाथ वे भी अपनी कविता भी सुना देते हैं । वैसे उनकी अपनी कविता क्या है, जानना चाहेंगे आप ? चलव मैंहीच हा बताये देत हंव (चलिएमैं ही बताये देता हूँ) - रामधारी सिंह दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली, महादेवी वर्मा, हरिवंशराय बच्चन, पंत, निराला, जाने कितने नामवरों की कवितायें उन्हें मुखाग्र हैं । दरअसल यही वे कवि हैं जो प्रत्येक भारतीय के उसके अपने कवि हैं । और उनकी कविताएँ एक गंभीर पाठक की भी कविताएँ...


तो.....मैं ठहरा अल्प-मुद्राधारी । चाहकर भी उनसे दूरभाष पर बात नहीं कर पाता । वे ही फ़ोनवा खटखटाते हैं । वैसे मैं फिलहाल यहाँ न तो अंतरजाल पर कुछ बकबास करने वाला हूँ न ही मित्र के बारे में लिखने बैठा हूँ । दरअसल मैं मित्र के बहाने कुछ ख़ास बात रखना चाह रहा हूँ - कि हम भारतीय कितने अलाल हैं ? कि हम भारतीयों में स्वयंसेवा के प्रति कितनी लापरवाही है ? कि हम दैनिक-वृतियों में निजी स्तर पर कितने सक्रिय रहते हैं ?

अमेरिका में घास छिलते हैं आदित्यजी
मूल बात की ओर आपको ले चलूँ तो......परसों भोर से उनका मोबाइल बज उठा – का हो, गुडाकेश, का करत बानी ? वे बता रहे थे – अभी-अभी लॉन का घास छिलकर वे सुस्ता रहे हैं, सोचा आपकी ख़बर ले लूँ, याद से गायब जो नहीं होते हैं ।
मैंने कहा – आप का कह रहे हैं ?
हाँ भाई, मैं घास ही छिल रहा था । - मैं ज़रा आश्चर्य के घेरे में स्वयं को पा रहा था -
मुहावरा फरमा रहे हैं क्या ?
अरे नहीं भई...

वे बोलने लगे – मानस जी, यहाँ हर कोई अपने बँगलों में लॉन की सफाई करता है । यह नित्य-प्रति का कार्य है । और इसमें बुराई भी नहीं....मन भी बहल जाता है... प्रकृति का स्पर्श भी हो जाता है और ज़रा व्यायाम भी । इसमें अमीर से अमीर आदमी भी संकोच नहीं करता....और यही वह सभ्यता है जो अमेरिका को अमेरिका बनाता है । लोग अपने छोटे-छोटे काम स्वयं किया करते हैं । हमें भी अपना देश बहुत पसंद है पर यही वो बात है जिससे अमेरिका हमे अपनी ओर खींचे रखता है और भारत की जीवन-शैली देखकर मन भर जाता है....

अब मेरी बारी थी – ....और हमारे यहाँ घास मज़दूर काटते हैं । चाहे वो लॉन का हो या फिर खेत का । कितना अजीब है कि यहाँ घास काटना छोटा काम माना जाता है । दरअसल घास भारतीय मन में भरा पड़ा है । जो छँटने का नाम ही नहीं लेती । जब घास छँट जाये तो हम भी अमेरिकनों की तरह समृद्ध हो सकते हैं । पर जाने कब छँटेगी यह घास.....


मानस जी, आप भी जानते हैं... भारत में जब कभी बाढ़, भूकंप, महामारी, सूखा आदि आपदायें आती हैं तो आपको छोटे-छोटे बच्च आगे बढ़कर सेवा करते दिखाई नहीं देंगे । अमेरिका में स्कूली बच्चे सहित हर उम्र के लोग आपातकालीन स्थिति में स्वयं बिना किसी अपील, बिना किसी प्रेरणा, बिना किसी राजनीति, बिना किसी स्वार्थ के सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं । भारतीयों ने साधारण जीवन में ऐसा करना सीखा ही नहीं है । उन्हें हम सिखाते ही नहीं । हम जाति, मजहब, धरम, वर्ग, योग्यता, रंग-रूप आदि के आधार पर ही मित्रधर्म निभाने की बात करते हैं । जिस परमार्थ की हम भारतीय बार-बार दुहाई देते हैं वह हमारा दंभ है । दरअसल हम स्वार्थ से उबर ही नही पाये हैं । हम भारतीय मनुष्य को मनुष्यता के नाम पर नहीं उसकी निजी विशिष्टताओं के आधार पर देखते हैं । और यही वह बुराई है जिससे भारतीयों में आपसी सद्भाव भी कम है । कभी मुंबई दहक उठता है और कभी गुजरात ।


मैं मन ही मन सोच रहा था कि अब तो हमारे स्कूलों में भी व्यावहारिक शिक्षा का पाठ मृतप्रायः है । मुझे याद आ रहा था कि कैसे हमें गुरूजी कक्षा से बाहर क्यारियों में फूल उगाना सिखाते थे, छोटी-मोटी खेती कराते थे, गाँव भर में घूम-घूम कर चावल इक्कठा करवाते थे और उसे किसी गरीब बच्चे को भी दिलाते थे । आज तो सामुदायिक भावना के नाम पर स्कूल में सिर्फ खेलकूद ही है जिसे हम सामुदायिक भावना की शिक्षा कह सकते हैं । धीरे-धीरे हमने सब कुछ खत्म कर दिया और आज तो स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए भी समाज को मध्यान्ह भोजन का लालच देना पड़ रहा है । क्या हो गया समाज को ? क्या हो गया लोगों को ? यह कैसा समय आ गया है हमारे देश में......


अब तो निजी स्तर पर ही ऐसी कोशिशें की जा सकती हैं । निरर्थक लाज तजकर । अपनी ऐंठ छोड़कर । हम जितने आत्मनिर्भर होगें । विकास का रास्ता उतना ही साफ़ होता चला जायेगा । ऐसे समय जो सबसे ज़्यादा याद आते हैं – उनमें गाँधीजी अव्वल हैं । वे यही तो कहा करते थे । वे दक्षिण अफ्रीका में जब तक रहे अपने लैट्रीन रूम की सफ़ाई स्वयं करते रहे । बा ने आपत्ति जताया – यह आप क्या रहे हैं ? तब गांधीजी ने उन्हें समझाया था कि बा जो अपनी गंदगी धो नहीं सकता वह औरों की गंदगी कैसे धो सकता है ।


अमेरिका में हिंदी पढ़ाये 5000 डॉलर पायें
ऐसा हो ही नहीं सकता कि आदित्य बातचीत करें और उस दरमियान मधुशाला की पंक्तियाँ न कहें । भले ही मधुशाला के रचनाकार बच्चनजी पर तत्समय और आज भी आलोचकों की ओर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने युवा-पीढ़ी को शराबखोरी की ओर धकेला गया, सच तो यह भी है कि मधुशाला की हर पंक्ति किसी न किसी जीवन-दृष्टि का रहस्य खोलती हैं और आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं –

बैर कराती मंदिर मस्ज़िद मेल कराती मधुशाला ।

बात हम अमेरिका में हिंदी की नौकरी की करने वाले थे । आदित्य ने मुझे समझाइस दी कि मैं अमेरिकन दूतावास को निवेदन करूँ कि वे जो मुझे ग्रीन कार्ड देना चाहते हैं उसे नियमित रूप से बाद में विचार करने की श्रेणी में रख दें । क्योंकि अभी अमेरिका में स्थायी रूप से नहीं रह पाने का मतलब फिर कभी नहीं रहने की संभावना का क्षीण होना नहीं है । इसका मतलब कि जब मैं चाहूँ वहाँ आ सकूँ । उनका सुझाव है - मैं चाहूँ तो इसी वीज़ा का फ़ायदा उठाकर अभी अमेरिका में रह सकता हूँ और मुझे हिंदी पढ़ाने के लिए 5000 अमेरिकन डॉलर प्रतिमाह युनिवर्सिटिज दे सकती हैं । वे चाहते हैं कि टैक्सॉस, ऑस्टिन या हार्वर्ड आदि में से किसी को अपना बायोडेटा भेज दूँ । वे मदद भी कर देंगे ।


पाँच साल में तीन शादियाँ
आदित्य बता रहे थे कि यहाँ सभी नौकरी अस्थायी होती हैं पर यहाँ काम या जॉब का अभाव नहीं रहता । वे चाहते हैं कि मुझे विचार करना ही चाहिए...

आदित्य फिर बताते हैं – मानसजी, अमेरिका ऐसा देश है जहाँ जॉब और संबंधों में स्थायी गारंटी कभी नहीं होती । यह अमेरिकनों की आदत भी है । यानी कि सब कुछ अनिश्चित । कम से कम भारतीय मानसिकता में तो ऐसी स्थितियो को अनिश्चित माना जाता है ।

अब वे मुझे पारिवारिक संबंधों की ओर ले चल रहे थे जो पश्चिमी सभ्यता में आम है – वे जहाँ सेवा देते हैं, एक 52 वर्षीया महिला भी है । वह अब तक 3-3 शादियाँ कर चुकी है । इसमें से तीसरी शादी हाल ही में संपन्न हुआ है । माँ जिंदा है । पिछले दिनों वह भी बिगड़ी हुईं थीं । यहाँ क्लब में आते-जाते भी प्यार हो जाता है । यहाँ प्यार का मतलब देहसुख है । भारत जैसा स्थायी भाव कहाँ इसमें ।

मैंने पूछा भाई जी, वहाँ प्रवासी भारतीयों पर इसका क्या प्रभाव हो रहा है ?

- भारतीय लोग ऐसे संबंधों पर कम विश्वास करते हैं । हाँ कुछ पंजाबी ऐसी शादियों में विश्वास करने लगे हैं.... खरबूजे को देखकर कब तक खरबूजा रंग नहीं बदलेगा... आप ही बताइये ना... हम भारतीय खरबूजा जल्दी रंग नहीं बदलेगा... विश्वास किया जाना चाहिए ।

दिनकर और ज्ञान प्रकाश की कविता
वे आगे कहने लगे – मैं सदैव सुंदर बातों के लिए ही चिंता करता हूँ और उसी उद्यम में लगा रहता हूँ ।
‘बड़ा ज्ञान वही जिसमें व्यर्थ की चिंता न हो । बड़ा आदमी वही जो जीवन भर काम करे । बड़ी कविता वही जो मनुष्य आदि भूमि को सुंदर बना दे ।’ - दिनकर की पंक्तियाँ मेरे कानों में विदेशी भूमि से साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी । आदित्य जी एक दूसरी कविता को लेकर जारी थे...

बंशी की सुरीली आवाज़ दूर से आ रही
कर्ण कुट में मधुर सी लगती
प्रेम भाव जगा रही
सर उठा कर गगन से ताल मिला रही

यह उनके बड़े भाई ज्ञान प्रकाश जी की कविता है जो लंदन मानचेस्टर में 30 वर्षों से चिकित्सक हैं और मन से कवि । खाली रहते हैं तो कवितायी कर लेते हैं । यह उनके बचपन की आदत है । आदित्य बता रहे थे – पहले बड़े भाई ने लिखा था – शांत भाव जगा रही । किशन महराज ने कहाकि शांत भाव को प्रेम भाव कर दो । कविता पूरी मुकम्मल हो जायेगी ।


अरूण प्रकाश जी को बधाई
सच ही है जिस व्यक्ति कें कंधे पर भार हो वही खुशनसीब है । वैसे अब आदित्यजी के सोने का समय हो रहा है पर कुछ खुशख़बरी देना शेष है सो बता रहे हैं -

अमेरिका के हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी संस्थानों, प्राथमिक हिन्दी के शिक्षकों एवं हिन्दी के छात्रों को वर्षों से जिस पाठ्य पुस्तक और अभ्यास पुस्तिका की अभिलाषा और आवश्यकता थी, वह पूरी हुई है । 490 पेजों की पूरी तरह रंगीन और दफ्ती की बाइंडिंग की यह पुस्तक और इसके साथ सीडी पर अभ्यास एवं चित्र शब्दावली अब आपके हाथों में है। वर्षों की मेहनत और व्यक्तिगत धन से यह सम्भव हुआ है। आपसे अनुरोध है कि इसको अपनाएं। यह आपको जून में उपलब्ध होगी। दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी सीखने के लिए यह पुस्तक अन्य भाषाओं की पुस्तकों के स्तर की है। इस पुस्तक की सामग्री तैयार करने में हिन्दी के वरिष्ठ विद्वान और शिक्षक डाक्टर हर्मन वान ओल्फेंन की महत्त्वपूर्ण सहायता प्राप्त है। क़ीमत 40 डॉलर, अभ्यास पुस्तिका 5 डॉलर और चित्र शब्दावली सीडी की क़ीमत 10 डॉलर है। पूरे सेट की कीमत 50 डॉलर है।

पुस्तक के चित्र कितने सुंदर हैं सचमुच--- अरुण प्रकाशजी आपको कोटिशः बधाई ।

Friday, May 23, 2008

अंतरजाल पर आत्महत्या के मायने



आत्महत्या जैविक अस्मिता का नष्टीकरण है । और मनुष्य जन्म का भ्रष्टीकरण भी । वह जीवन के प्रतिरोध में मनुष्य का सबसे बड़ा निरुत्साही कदम है । वह आत्मघाती व्यक्ति के खिलाफ़ ही नहीं, मात्र परिजनों के विरूद्ध ही नहीं, समूचे समाज, देश, युग और मानव सभ्यता में भी भयानकतम काला धब्बा है । एक दृष्टि से वह हत्या से भी ज्यादा जघन्य है । अर्थात् मनुष्य द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा दुष्कर्म ।

अनेक बार तथाकथित प्रस्थिति, सामाजिक किन्तु थोथे अहंकार, सडियल मान्यताओं की गत्यात्मकता के लिए उसकी संस्तुति भी कर दी जाती है । कम से कम दृश्य माध्यम वाली कथा सीरियलों, चलचित्रों और यदा-कदा साहित्यिक उपन्यासों और कहानियों में भी पाठक ऐसे पात्रों को नायक या नायिका के रूप में देखने लगता है । पर सच कहें तो ऐसे समय पाठक आत्महत्यारे को अपना अनुसमर्थन देते हुए भी अनजाने में मनुष्यता को नकारता भी होता है । वह आत्महत्या को वैयक्तिक रूप से प्रांसगिक मानते हुए उसके लिए सामाजिक स्वीकृति की ज़मीन भी तैयार करता रहता है । ऐसे क्षणों में वह स्वयं को शेष-दुनिया की शुचिता, कल्याण का आंकाक्षी घोषित करते हुए जरूर आत्महत्या करने वाले के प्रति सहानुभूति भी रखता है परंतु क्या ऐसी पाठकीय सहानुभूति से आत्महत्या करने वाले उस पात्र की ज़िंदगी फिर से लौटाई जा सकती है । कदापि नहीं । और जब किसी पाठक, किसी व्यक्ति चाहे वह पिता, पति, पुत्र, पुत्री, परिवार, कुल, समाज, देश ही क्यों न हो को जीवन के पुनर्सर्जन की हैसियत नहीं तो उसे आत्म-हरण को मान्यता प्रदान करने का घोषणा करने का अधिकार कैसे भी सौंपा जा सकता है । इस तरह से क्या हम आत्महत्या को प्रोत्साहित नहीं करते रहते । बहुधा हम त्याग के बहाने आत्महत्या को हितकारी निरूपत कर दिया करते हैं । दरअसल हम ऐसे क्षणों में आत्महत्या करने वाले की हत्या को अपना मौन-स्वीकृति भी प्रदान करते रहते हैं । आप जाने क्या सोचते हैं पर व्यक्तिगत तौर पर मैं तो फिलहाल ऐसा ही सोचता हूँ । क्योंकि ऐसा सामाजिक अथ के लिए ऐसा त्याग भी किसी की इति की बुनियाद पर रचा गया होता है । यह अलग बात है कि पश्चिमी गलियारों में आत्महत्या को भी मनुष्य के अधिकारों में शामिल किये जाने की अनुगूंजे कभी-कभार सुनाई देती रहती है ।

आत्महत्या मनुष्य बोध के इतिहास में सदा अस्वीकृत रही है। हर युग और समाज ने उसे निंदनीय नज़रों से देखा है । धार्मिक आचार संहिताओं में उसे पाप माना गया है तो राष्ट्रीय विचार धाराओं में नागरिकता के खिलाफ कायराना अंदाज। सामाजिक मान्यताओं में उसे असामाजिक श्रेणी में रखा गया है । विधान की दृष्टि में अपकृत्य । दंडनीय अपकृत्य । लोक साहित्य में अवश्य वह नायक-नायिका के प्रतिस्पर्धी वचनों में आया है किन्तु उलाहना के लिए । प्रेम-प्राप्ति के लिए चेतावनी बतौर ।

इन सब सत्यों के बावजूद समकालीन जीवन का एक सच यह भी है कि आत्महत्याओं का रोग समाज में लगातार बढ़ता जा रहा है । समाजशास्त्र, दर्शन, चिकित्सा, जीव-विज्ञान आदि ज्ञान की शाखाओं में उसे लेकर व्यापक चिंता-चिंतन, अध्ययन-विश्लेषण भी होते रहे हैं । इमाइल दुर्खीम जैसे फ्रांस के समाजविज्ञानी ने ऐतिहासिक अध्ययन के पश्चात अपना सिद्धांत भी हमारे समक्ष रखा है । उधर फ्रायड़ ने भी आत्महत्या के कारणों पर मनोवैज्ञानिक कथ्य-तथ्य दुनिया को दिया है । सच कहें तो आत्महत्या को लेकर न केवल उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में विस्तार हुआ है (खास कर समाज-दर्शन में) बल्कि इसे लेकर सरकारें, युनेस्को आदि वैश्विक संगठन भी चिंताकुल हैं, इसे हतोत्साहित करने के लिए कटिबद्ध हैं पर ताज्जुब होता कि सारी दुनिया में व्यक्तिगत चेतना में लगातार वृद्धि होने और मनुष्य की सत्ता को सर्वोपरि मानने वाले जीवन दर्शन, सोच, विचार के वैश्विक प्रतिष्ठा के बाद भी आत्महत्या की दर थमती नज़र नहीं आती है । चाहे वह महाराष्ट्र में किसानों द्वारा किया जाय या कहीं और । मूल में चाहे जो भी कारण रहे हों ।

समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मुझे छात्र-जीवन में पाठ्यक्रम में आत्महत्या को लेकर अब तक हुई समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और विवेचनों को पढ़ने और समझने का भी मौका मिला है । परंतु गौतम पटेल ने जिस तरह से जीवन की महत्ता और सत्ता को केंद्र में रखकर आत्महत्या को सभी कोणों से देखने-परखने का प्रयास किया है वह स्तुत्य है । वह किसी विश्वविद्यालय के शुष्क आंकडों, सिद्ध विचारों का लेखा-जोखा मात्र नहीं । वह आत्महत्या के निषेध का सर्वोत्तम पाठ है । सरल और आत्मीय शैली में लिखी गई किताब । भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी किताब में एक मोहनी है ।(मोहनी यानी मधुमक्खी का मधुरस) जानते हैं गाँव-घर-जंगल में जहाँ-जहाँ मोहनी पाया जाता है वहाँ-वहाँ भौंरे भी मंडराते पाये जाते हैं । गौतम की किताब मोहनी का घर है । वहाँ सर्वत्र मोहनी रस बिखरा पड़ा है । यह मोहनी रस उनकी शैली और भाषिक सौंदर्य के कारण है । आपको इस किताब में रमने से एकबारगी लगेगा कि आप आत्महत्या जैसे शुष्क विषय पर नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि कोई ललित निबंध बाँच रहे हैं । समाजशास्त्रीय विषय में भी लेखक ने जिस तरह रम्यता की गुंजाइश निकाली है वह साबित करता है कि यदि लेखक विशुद्ध साहित्यिक अनुशासनों पर कुछ काम करे तो वह अपनी उपस्थिति से इधर साहित्यिकि पाठकों को भी चौंका सकता है ।
चलिए इसे एक उदाहरण लेकर ही देखते हैं –

“जीते-जागते रहने का नाम है जीना और जीते जी मर जाने का नाम है आत्महत्या । प्राणधार अथवा प्राणधारण करने वाले को ही बने रहना अथवा प्राण धारण किये रहना ही प्राणी का परम कर्त्तव्य है। दूसरे शब्दों में हर हाल में जीवन के दिन बिताना ही जीना है। इसमें अगर-मगर,किन्तु-परन्तु, लेकिन, फिर भी के लिए कोई स्थान नहीं । निष्कर्ष यही कि हमें हर हाल में जीना है। मत्स्य नियम अर्थात बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। यह नियम तब भी था अभी भी है और आगे भी रहेगा । इसे हम किसी भी कीमत पर बदल नहीं सकते । जंगली विधान अर्थात बड़े वृक्षों के नीचे छोटे वृक्ष नहीं पनप सकते । अतीत में भी नहीं, वर्तमान में भी नहीं और भविष्य में भी नहीं । यह एक प्राकृतिक विधि है। इसमें परिवर्तन प्रकृति को भी मान्य नहीं मवेशी कानून अर्थात् जिसकी लाठी उसकी भैंस ।”

इस किताब के पाठकों के लिए यह बोनस होगा । हिंदी में जिस तरह से साहित्येतर विषयों का लेखन कम हुआ है इसके पीछे पठनीय आकर्षण का अभाव रहा है । शिल्प और शैली की जटिलता के कारण इधर आसपास के तथाकथित अंतरराष्ट्रीय कवि भी अपने पास-पडौस के पाठकों में नहीं पढे जा रहे हैं । ऐसे दौर में जटिल सामाजिक समस्या को रम्य और साहित्यिक अंदाज में प्रस्तुत कर गौतम ने फिर एक बार याद कराया है कि लिखा ऐसा ही जाना चाहिए जो पाठकों के चित्त को घेरे रख सके । जो उसके मन-मनीषा में शब्दों की दुनियावालों से चिढ़ उत्पन्न न कर सके और सांस्कृतिक दुनिया में यह नकार न जनम सके कि वह आखिर क्यों कर पढे।

गौतम की दृष्टि मूलतः आध्यात्मिक रही है । वे किसी चीज को भारतीय परंपरा के अक्स में देखते-परखते हैं । शायद यही कारण है कि आत्महत्या जैसी विषय-वस्तु को परत-दर-परत खोलते वक्त वे मूल्याँकन में भारतीय मान्यताओं की कसौटी को अपने समक्ष तवज्जो देते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि वे पश्चिम की सर्वमान्य विचारधाराओं, इतिसिद्ध दृष्टियों को नकारते चलते हैं । वे अपने निष्कर्ष में मनुष्य जन्म को सर्वोपरि देखते हैं । तर्कों को इस तरह प्रतिष्ठित करते हैं कि कोई जीवन से हारा हुआ व्यक्ति इसे पढ़ ले तो शायद ही वह आत्महत्या का विचार न त्यागे ।

इस ई-किताब में आत्महत्या के इतिहास, कारणों, परिस्थितियों, लक्षणों, निदानों, मान्यताओं और विचारों को 16 अध्यायों में संजोया गया है । इस शोधात्मक किताब में आत्महत्या को रोकने की दिशा में कार्यरत सामाजिक संस्थाओं की सम्यक जानकारी भी दी गयी है । इस मायने में यह किताब केवल साहित्यिक पाठकों के लिए ही नहीं बल्कि समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने वालों, समाज अध्येताओं के लिए भी महत्वपूर्ण बन पड़ी है ।

जैसे कि हम सब जानते हैं कि आज नई पीढ़ी लगातार किताबों से विमुख होती जा रही है । नये ज़माने की प्रौद्योगिकी भी उसे किताबों से दूर ले जाने का षडयंत्र कर रही है । ऐसे समय में खासकर तब जब दुनिया के समस्त ज्ञान-विज्ञान और मनुष्य द्वारा खोजे, सिद्ध किये गये कौशलों को अंतरजाल पर रखने की स्वस्थ शुरूआत हो चुकी है । गौतम द्वारा इसे सीधे अंतरजाल पर रखना सामयिक कदम है । आज भले ही हम कह लें कि अंतरजाल की संस्कृति भारत में नहीं चलेगी । पर ऐसा कहना परिवर्तन की शाश्वत गति को नकारना भी होगा । भारतीय प्रतिभा और उसके देन को भी नकारना होगा । क्योंकि यह तो बिलगेट्स भी समझ चुके हैं कि ज्ञान के विश्वव्यापी माध्यम इंटरनेट को नित नया और चिरंतन बनाये रखने के लिए भारतीय प्रतिभा को नकारना अब असम्भव होगा । और सच्चे अर्थों में अंतरजाल या इंटरनेट गाँव-घर के ज्ञान, कौशल, शिक्षा, सिद्धि, पद्धति को वैश्विक बनाने का मानवीय सरोकारों से भरा संचार माध्यम भी है । केवल मनोरंजन और अपकृत्यों को प्रोत्साहित करने वाला माध्यम नहीं । और यह भी सच है कि जब तक हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक कौशलों को अंतरजाल पर नहीं रखेंगे तो नयी पीढ़ी क्योंकर पोर्न साइट की ओर नहीं लपकेगी । मेरा व्यक्तिगत मानना तो यह भी है कि जब हम इंटरनेट को हिंदी की ताकत, क्षमता और दक्षता से नहीं समृद्ध नहीं कर सकते यानी एक बड़ी रेखा नहीं खेंच सकते तो किस मुँह से कह सकते हैं कि पश्चिम हमारी भावी पीढ़ी को विकृति की ओर धकेल रहा है ।

भले ही आप कह लें कि खिलेगा तो देखेंगे । पर कहाँ-कहाँ तक आप खिलायेंगे । भले ही आप मिठलबरा की आत्मकथा सुनाकर ऐसे लोगों से अपने आसपास को बचा सकते हैं । पर उनका क्या होगा जिनके आसपास भी ऐसे मिठलबरे पाँव जमाये हुए हैं और जो उखडने का नाम ही नहीं लेते । भले ही आप यह चीखते चिल्लाते रहें कि आपके किसी खास ने सरस्वती को भी संपादित किया था । पर यह कितने लोगों को सुनाई देगी । पर मुझे इस समय संतोष है कि भविष्य के सबसे कारगर माध्यम इंटरनेट पर जहाँ आत्महत्या पर और जिस पर हिंदी में कोई सामग्री नहीं थी अपनी समूची किताब को ई-किताब में गौतम ने तब्दील कर दिया है । इससे हिंदी ही समृद्ध होगी समूचे विश्व में ।

यह अलग बात है कि यह किताब भविष्य में प्रिंट में भी आयेगी । ज्यादा से ज्यादा पाँच सौ प्रतियों में । जिसे ज्यादा से ज्यादा वे पाँच सौ पाठकों तक पहुँचा सकेंगे । पर इंटरनेट पर इस कृति के आने से अब दुनिया भर के सभी हिंदी पाठक इसका फायदा हजारों वर्ष तक उठा सकेंगे और गौतम पटेल का नाम अंतरजाल पर आत्महत्या लिखने वाले पहले कृति लेखक के रूप में शुमार किया जाता रहेगा । आप उन्हें एक गंभीर लेखक के रूप में नहीं लेगें इसके उनका क्या बिगड़ेगा ?


समीक्षित कृति
कृति-आत्महत्या
लेखक- गौतम पटेल
प्रकाशक - वैभव प्रकाशन, रायपुर
मूल्य- 100 रुपये

Thursday, May 22, 2008

शब्द


अपने अँधेरे में पड़ा था चुपचाप
आदमी उसके पास पहुँचा
जाग उठा वह
नहा उठा रोशनी से आदमी भी
सिर्फ़ इतना ही नहीं
नहा उठी सारी दुनिया उसकी रोशनी में
निहायत नये चीज़ – अपने नामकरण संस्कार से
संस्कारित हो उठा सारा संसार
जैसे शिशु के आने पर नाच उठता है बाँझ का परिवार

(रचनाकाल-12 मई 2007)

Wednesday, May 21, 2008

शहर में



यहाँ भी -
सूरज उगता है पर नगरनिगम के मलबे के ढेर से
चिड़िया गाती है पर मोबाईल के रिंगटोन्स में
घास की नोक पर थिरकता हुआ ओस भी दिखता है पर वीडियो क्लिप्स में
अल्पना से आँगन सजता है पर प्लास्टिक स्टीकरों वाली
थाली में परोसी जाती है चटनी, अचार पर आयातित बंद डिब्बों से
बड़े-बडे हाट भरते हैं पर कोई किसी को नहीं भेंटता
लोग-बाग मिलते हैं एक दूसरे से पर बात हाय-हैलो से आगे नहीं बढ़ती
चिट्ठियाँ खूब आती हैं पर ई-मेल में मन का रंग ढूँढे नही मिलता
खूब सजती हैं पंडालें पंडों की पर वहाँ राम नहीं होते
उठजाने की ख़बर सभी तक पहुँचाती हैं अखबारें पर काठी में कोई नहीं आता
इस पर भी शहर जाना चाहते हो जाओ
पर तुम्हें साफ-साफ पहचाना जा सके
जब भी लौट कर आओ

Sunday, May 18, 2008

किसने छीना बस्तर का मानवाधिकार ?


प्रजातंत्र कई रोगों से ग्रस्त हो चुका है । यहाँ प्रजा चींटी साबित हुई है और तंत्र पागल हाथी । राजनैतिक दल वास्तविक हकदारों के खिलाफ़ लड़ने में कारगर साबित नहीं हैं । जनप्रतिनिधि के रूप में हर किसी ने जनता के हिस्से को डकारने का कार्य किया है । सरकारी तंत्र में घनघोर शोषण है । कार्यपालिका के गलियारों तक गरीबों, दलितों, आदिवासियों की चीख-पुकार नहीं पहुँच पाती । उद्योगपतियों, व्यापारियों ने निरंकुश होकर जनता की गाढ़ी कमाई पर सेंध मारा है । बिचौलियों ने मनभर अनपढ़ों को लुटा है । न्याय चाँदी के सिक्कों के बिना मुहैया नहीं हो पाता । आम जन के स्वप्नों की रोज हत्या हो जाती है । कोई सुननेवाला नहीं । मानव होने का मूल अधिकार ही यहाँ चरितार्थ नहीं होता । यह सब ठीक है । भारतीय प्रजातंत्र का आत्मघाती यथार्थ भी है जिसके खिलाफ लड़ने की बात चलने पर आज हर कोई दूसरों के घर से भगतसिंह या सुभाषचंद्र के अवतरित होने की राह देखता है ।


पर इसके विकल्प में नक्सलवाद कैसा हल है जिसने सिर्फ अमानवीय विनाश का कलंक ही पोत दिया है हमारे मुँह पर । दूर जाने की नहीं कहूँगा । मेरे पड़ोसी जिले बस्तर को ही देख लें – और समूचे समय को ही नहीं । मात्र पिछले साल का मुआयना कर लें -


बस्तर में पिछले एक साल में यानी कि 2007 में नक्सलियों ने दौरान 635 हमले किये हैं । जाहिर है ये हमले जनता पर ही हुए हैं । ऐसी जनता, जो आदिवासी है । सीधी-सादी है । निर्दोष है । वन-प्रांत की स्थायी शांति चाहती है । इन हमलों में 242 बेकसुर नागरिकों को अपनी जान गवानी पड़ी है । इनमें से अधिकांश इसलिए मारे गये हैं क्योंकि उन्होंने नक्सलियों का साथ देने से इंकार कर दिया । इतना ही नहीं अपने माँ-बाप और घर-परिवार को छोड़कर जंगलों में रात दिन सेवा देते 125 सुरक्षा बल के जवान इन नक्सिलयों द्वारा मौत के घाट उतारे गये हैं । इसलिए कि ये दो रोटी की जुगाड़ में पुलिस में नौकरी करने के लिए विवश थे ।


क्या-क्या कहर नहीं ढ़ाया है बस्तर में प्रजातंत्र का विकल्प तलाशने वाले हिंसक लोगों ने इस बीच । उन्होंने न ननिहालों के स्कूलों को छोड़ा है न ही छोटे-मोटे दवाखानों को । इस दरमियान बार-बार बिजली का टॉवर गिरा दिया गया तो कभी सारे बस्तर की बिजली ही ठप्प कर दी गई । पंचायत भवन जहाँ ग्रामीण अपने विकास की रणनीति गढ़ते हैं को भी सरे आम इस दौरान सैकड़ों की सख्या में नेस्तनाबुत कर दिया गया है । आये दिन रेलवे की पटरियाँ उखाड़ दी गई जिससे किसी गर्भवती माँ का बच्चा पेट में ही मर गया, मरणासन्न बूढ़े बाप का मुँह तक उसके परिजन नही देख पाये । बरसों का प्यार इन आंतकियों के कारण टूट गया । दो प्रेमी जीवन भर के लिए बिछुड़ गये । पढ़ा-लिखा बेरोजगार समय पर साक्षात्कार नहीं दिला सका ।


एक आँकड़े के अनुसार मात्र पिछले 365 दिन में ही नक्सलियों ने 55 प्रायमरी शाला भवन, 8 पंचायत भवन, 9 शाला आश्रम, 9 छात्रावास, 8 आंगनबाड़ी केन्द्रों को नष्ट कर दिया है । इसके अलावा अन्य 18 भवनों को इन्हीं तथाकथित प्रजाहितैषियों ने नष्ट किया कर दिया गया है । जिससे करोड़ों रूपयों की सार्वजनिक संपत्ति स्वाहा हो चुकी है । यह केवल सरकारी हानि नहीं । यह जनता के खून-पसीनों से संचित धन की भी हानि है, जिसमे बस्तर के आदिवासियों का भी हिस्सा है । जिसमें समूची भारतीय जनता का भी अंशदान है ।


जो बस्तर के आदिवासियों की शांति झीन लेना चाहते हैं । जो माँ-बाप से उसके निर्दोष बेटों का सहारा छीन लेना चाहते हैं । जो जनता के क्रांतिकारी विकास के नाम पर उनके घरों, अस्पतालों, सामुदायिक भवनों को ध्वस्त कर दें । जो उनके घरों की बिजली को सप्ताहों, महीनों के लिए ठप्प कर दें । जो बस्तर की माँ-बेटियों की इज्जत पर दाग डाल दे वह उनके कैसे हितैषी हो सकते हे ?

अब ऐसे में यदि दशकों से आंतकित और स्थायी शोषण से बस्तरिहा ग्रामीण मुक्ति चाहे । वह जंगली आंतकवाद से लड़ने का संकल्प ले । वह राहत शिविरों में आसरा ले । उस पर भी उन शिविरों में नक्सली हमला करते रहें । ऐसी दुःसह और दारुण परिस्थितियों में नक्सलियों के खिलाफ बस्तरवासियों की ओर से खड़ा किया गया सलवा जुड़ूम अभियान जबरिया रोकना सरकार के लिए क्या अमानवीय नहीं होगा ? ऐसे अभियानों को तथाकथित मानवअधिकार और सुविधाओं के अभाव के नाम पर रोक लगाना क्या नक्सलवाद को तरजीह देना उचित होगा – न्यायिक दृष्टि से । वह भी सिर्फ इसलिए कि उसके विरोध में धंधेबाज प्रचारकों, हल्ला करने बुद्धिजीवियों की सक्रियता कहीं अधिक है । क्या मानवअधिकार सिर्फ बुद्धिजीवियों के लिए बनाया गया है ? मानवअधिकार इसलिए नहीं बनाया गया है कि आप नक्सलियों का साथ दें और संदेहास्पद होने पर मानवअधिकार के हनन के नाम पर खूब चींखे-चिल्लायें । अपनी ताकत और संपर्क के बल पर पूरी दुनिया में पोस्टर चिपकादें । और एक सिरे से भूल जायें कि वहाँ आदिवासियों का हनन हो रहा है । वह भी आपके तथाकथित मानवअधिकार के हनन से दशकों पहले । तब आप कहाँ थे ?


आदिवासियों के मानवाधिकार की निरंतरता में न तो नक्सली संलग्न हैं बुद्धिजीवी, समाजसेवी, न ही आदिवासी लेखक । अब समय आ गया है कि आदिवासी अपने लेखक तैयार करें । अपने बुद्धिजीवी तैयार करें । परसेंटखाऊ समाजसेवी संस्थाओं की पहचान करें जो उनके बीच रहते हैं और नक्सलियों (यानी आदिवासियों को इस्तेमाल करने वाले स्वार्थी, हिंसक और राजनैतिक लडाकूओं) से भी जुड़े रहते हैं । आदिवासी समाज के पढ़े लिखे तबकों को अब जागना ही पड़ेगा कि वे अपने पत्रकार तैयार करें जो दुनिया भर में उनकी बातों को भी सामने रखें । वरना अधिक पढ़े लिखे लोग उन्हें हर बार, हर कोण से पराजित करते ही रहेंगे ।


क्या यह गंभीर और असामान्य परिस्थिति नहीं है ? क्या इस जन आंदोलन को बीच में छोड़ देना न्यायिक कदम होगा ? ऐसे क्षणों में इस आंदोलन को नैतिक रूप से सरकार ने समर्थन दिया है और बस्तर में 3400 विशेष पुलिस अधिकारियों(SPO) की नियुक्ति की है तो बुराई क्या है ? ये वही युवा हैं जो नक्सलियों से तंग आ चुके हैं । उनकी माँगों की पूर्ति करते उनके परिवार के लोग थक चुके हैं । यदि वे भटक कर भी नक्सलियों का साथ दे रहे थे और अब उनके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तो इसमें उनका आत्मसुधार और सत्य के प्रति आग्रह ही है । आखिर वे नक्सलियों यानी की अराजक तत्वों का साथ क्यों दें ? अराजक तत्वों के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रारंभ सलवा जुडूम में क्यो न योगदान करें ? यह न करने का मतलब नक्सिलयों का साथ देना भी होगा । जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।


जो पुलिस की कार्यप्रणाली को जानते हैं वे समझ सकते हैं कि विशेष पुलिस अधिकारियों की व्यवस्था का पुलिस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है। एसपीओ की उपस्थिति से ग्रामवासियों में नये आत्मविश्वास आया है । उन्हें लगने लगा है कि उनके कोई अपना उनकी सुरक्षा के लिए अब कटिबद्ध है । ये नक्सलवाद के हिंसक गतिविधियों को रोकने और जूझने की मुहिम में भी सुत्रधार की तरह प्रशासन का हाथ बटा रहे हैं । हम याद करें असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में ऐसे शक्तिबल की आवश्यकता ज़रूरी मानी गई है ।

जब नक्सली प्रजातंत्र को नहीं मानते । जब नक्सली अपनी न्यायप्रणाली चाहते हैं । और अपनी सिद्धि (यानी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति)के लिए कोर्ट, मानवाधिकार फोरमों, लेखक-पत्रकार संगठनों, मीडिया का सहारा तो ले सकते हैं । पर आदिवासियों के शोषण, दमन, अत्याचार, मानवाधिकार के बारे में कुछ नहीं कर सकते । यहाँ तक की प्रजातांत्रिक तौर पर राजनीतिक सत्ता के लिए भी पहल नहीं कर सकते । तब ऐसी परिस्थितियों में क्या 2008 में बस्तर के आदिवासियों को नक्सलवादियों के हवाले फिर से छोड़ दिया जाय ? उन्हें कैंपो से लौटा दिया जाय ? और पुलिस शहरों के थानों में चैन की नींद सोती रहे ?