Monday, January 09, 2006

परीक्षा का मतलब सिर्फ याद करना रह गया है ?

मैं सिर्फ अपनी बात कहना चाह रहा हूँ । मेरे तीन बच्चें हैं- प्रगति, प्रशांत और प्रतीक । वे तीनों पढाई में औसत दर्जे के विद्यार्थी हैं । साल भर स्कूल में जो पढाया जाता है, पढ लेते हैं । दो बच्चे ट्युशन भी पढते हैं-3-4 माह । मासिक मूल्याँकन में भी उत्तीर्ण हो जाया करते हैं । घर में उनकी मम्मी उन्हें हर दिन पढने को सचेत कराती भी रहती है । जैसे-जैसे परीक्षा का समय आता है, वे बडे भोर से जाग जाते हैं और अपना-अपना पाठ याद करते हैं । समय-सारिणी भी बनाते हैं पर उसका पूरा पालन शायद ही वे कर पाते हैं । मैं अपनी दुनिया में मगन रहता हूँ । बच्चों के बारे में माँ सबसे ज्यादा सतर्क जीव होती है । वह जाने क्या-क्या करती है । कभी याददाश्त बढाने के लिए बादाम घिसकर खिलाती है तो कभी बच्चों की अरुचि के बावजूद दूध में बोर्नबीटा नियमित देने पर विश्वास करती है । धार्मिक स्वभाव की माताएं सरस्वती या हनुमान जी के मूर्ति के सम्मुख पूजा करने की सलाह भी देती हैं । मेरी पत्नी परिश्रम को आधा ईश्वर मानती है । ऐसा नहीं है कि बच्चे सिर्फ देख कर ही सीखते हैं । ऐसा होता तो सारे के सारे बच्चे प्रतिभावान बच्चों को देखकर ही उनके मार्ग का अनुसरण कर लेते । शायद पढकर भी सभी बच्चे सीखते हैं । सच तो यह है कि बच्चा वही करता है जो वह करना चाहता है । जिसे करने में उसे मजा आता है । माहौल या पर्यावरण भी समूचे व्यक्तित्व का मूल नहीं हुआ करता । यह समाजशास्त्रीय सत्य भी है । कुछ तो जन्मजात गुण भी होते हैं । यहाँ हम वंशानुक्रम के सिद्धांतों या फिर शेक्सपियर की उक्ति का भी स्मरण कर सकते हैं । खैर........
परीक्षा सिर दर्द का पर्यायवाची भी है । जैसे-जैसे परीक्षा का समय नजदीक आता जाता है माता-पिता की चिंता भारत में गरीबी की तरह बढती जाती है । बच्चे भी प्रश्न-डायन के भय से तनाव-ग्रस्त होते चले जाते हैं । कुछ साल-भर अच्छी मेहनत नहीं कर पाने के कारण शार्टकट रास्ता भी अपनाने लगते हैं, जैसे कुंजी, गाईड का सहारा लेना । खाने-पीने में उनका मन कम होने लगता है । ठीक से नींद भी नहीं आती । पेट भी गडबड रहने लगता है । खेलना-कूदना लगभग बंद हो जाता है । भगवान तो है ना, ऐसे वाक्य उनके भी मस्तिष्क में उभरने लगता है । अधिकांश बच्चे रात-दिन रटने में संलग्न हो जाते हैं । स्कूल का पाठ उन्हें अन्य अपरिचित भाषा की तरह जटिल नजर आने लगता है । शिक्षक का चेहरा भी उन्हें किसी दुश्मन की भाँति दिखाई देता है । शिक्षक कहते हैं-“याद करो बच्चे” । माँ-बाप रट लगाये रहते हैं- “अब तो याद करलो बेटे”। पास-पडोस से भी स्वर गूँजने लगता है- “कैसे हो तुम लोग बच्चे, परीक्षा सर पर है और तुम हो कि पाठ याद ही नहीं कर रहे हो” । जिधर देखो-याद करो, याद करो, याद करो ।
क्या परीक्षा का मतलब सिर्फ याद करना रह गया है ? क्या वही बच्चा या विद्यार्थी प्रतिभावान् है जिसे रटने की विद्या आती है ? क्या स्मरण शक्ति ही मेधा का असली परिचय है ? क्या भारतीय परीक्षा पद्धति की यह सीमा है ? क्या आप भी सोचते हैं कि रटने की प्रवृति को बढावा देने वाली भारतीय परीक्षा पद्धति का कोई विकल्प जरूर हो सकता है ? आपके विचार जानने की प्रतीक्षा में......

3 comments:

Pratik said...

भारत के ज़्यादातर विद्यालयों में न जाने क्‍यों तोते की तरह रटने पर बहुत ज़ोर दिया जाता है। यह अपने आप में वक़्त और ऊर्जा की बड़ी बर्बादी है। खुद मुझे भी कई बार परीक्षाओं में सिर्फ़ इसलिये कम अंक मिले हैं, क्‍योंकि मैंने किताब की भाषा जस-की-तस उत्तर-पुस्तिका में नहीं उतारी। :) अगर रटने की यह प्रथा समाप्त हो सके, तो बच्‍चों का बड़ा ही कल्‍याण होगा।

अनुनाद सिंह said...

मेरे विचार से छोटी कक्षाओं में रटने का कारण है मातृ-भाषा मे न पढाना | पच्चो को जो चीज समझ में नहीं आयेगी तो रटने के सिवा विकल्प ही क्या है ?

Deepak/दीपक said...

अौर यही बच्चे बडे होकर IT expert, Engineers, Doctors व Businessmans बन जाते। दुनिया भर मे धूम मचाते है। पता नही कैसे ?