Friday, July 04, 2008

बस्तर में नक्सलवादी हैं ही नहीं

बस्तर नक्सलवाद नहीं माओवादियों के हिंसक आतंक का गढ़ बन चुका है । आज का समूचा बस्तर आंतकवाद के घटोटोप में जी रहा है । अब यह सिद्ध हो चुका है कि बस्तर के आंतकवादियों को नक्सलवादी कहना नक्सलवाद को गाली देना होगा । यदि नक्सलवाद की सैद्धांतिकी भी सत्यनिष्ठ होती तो भी बस्तर में अविकसित आदिवासी, दलित, गरीब, भूमिहीन किसान का उत्थान और उसकी बराबरी का क्रांतिकारी अभियान संचालित होता, स्वयं उन्हीं के ख़िलाफ़ नरसंहार का तांडव नहीं मचा रहता । वे स्वयं बस्तर के विनाश का सबसे खतरनाक और नया इतिहास नहीं रचते होते । बस्तर-विपदा की जड़ में आदिवासी-शोषण का तर्क भले ही लोक-लुभावना हो सकता है, परंतु वही अंतिम वास्तविकता नहीं है ।

यदि नक्सली बस्तर में प्रभु-वर्गों के सुनियोजित शोषण, दमन, अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ रहे होते तो बस्तर आज आदिवासियों की शिक्षा, चेतना, मानव अधिकार, सहित विकास का विश्वविद्यालय बन चुका होता । वहाँ दुनिया भर के समाजशास्त्री, शिक्षाशास्त्री, और योजनाकार रिसर्च करने आते होते और नक्सलियों से जनता के सम्यक विकास का पाठ सिखते होते । बस्तर का नक्सलवाद सारी दुनिया में पूजा जाता । उसे प्रजातांत्रिक विकास का विकल्प माना जाता और मानवीय विकास का अंतिम लोकाग्रही मॉडल भी घोषित कर दिया जाता।

बस्तर के आंतकवादियों का सबसे बड़ा सच यही है कि वे अपनी हिंसक और अमानवीय हरकतों पर किसी भी सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक नियंत्रण के सख्त विरूद्ध हैं । क्योंकि उनका एकमात्र लक्ष्य प्रजातंत्र को नेस्तनाबूत करके वहाँ माओवाद का विस्तार और साम्राज्य का स्थापना ही है, जो पूरी तरह भारतीय संविधान के विरूद्ध है । वर्तमान प्रजातंत्र की संवैधानिक व्यवस्थाओं की कोई भी दिशाबोध या अनुशासन उन्हें मंज़ूर नहीं है । आदिवासियों के विकास और उत्थान के नाम पर न वे कभी संवाद को राजी हुए, न ही वे प्रजात्रांतिक व्यवस्था के रास्ते, प्रजातांत्रिक विकास के लिए जनप्रतिनिधित्व के लिए तैयार हुए । यदि वे ग्राम, जनपद, जिला पंचायत साहित विधान सभा और संसद के रास्ते आगे आये होते तो भी बस्तर के विकास का उनका कथित सपना कब का पूरा हो चुका होता । वे और उनके कारिंदे ही आज बस्तर के जननायक होते । ऐसे में बस्तर का विकास भी कहीं अधिक तेज गति से होता। शांति और सुरक्षा के नाम पर देश-प्रदेश की अकूत दौलत यूँ ही नष्ट नहीं होती ।

बस्तर के पिछले तीन-चार दशकों के विकास-शास्त्र को पढ़ें तो स्पष्ट संकेत मिलता है कि बस्तर का जितना शोषण अन्यों ने मिलकर किया है, उससे कहीं अधिक शोषण इन कथित नक्सलवादियों (मूलतः माओवादियों और वास्तव में आंतकवादियों) ने किया है । शक्तिशाली और नव हितनिष्ठ तो केवल आर्थिक या मानसिक शोषण करते रहे, माओवादियों ने तो विकास की जारी गति को ही बेअसर कर दिया, और सिर्फ इतना ही नहीं; उन्होंने अपनी पाशविक जिद्दी के लिए अमानवीय हत्या से भी कभी परहेज नहीं किया । सबसे ताज्जूब की बात तो यही कि इस दरमियान इनके आंतक का शिकार कोई प्रभुवर्ग का व्यक्ति नहीं हुआ । सिर्फ भोला-भाला, निहत्था, विकास की धीमी गति चाहने वाला आदिवासी ही मौत के घाट उतारा जाता रहा । यह कैसा द्वंद्व है विकासवादियों का ? सच तो यही है कि इन सालों में सारा बस्तर आतंकवादियों के ख़ूनी पंजों में फँस चुका था। उनकी सारी अस्मिता, सारी संस्कृति भी विकृति के कगार पर चली गई, इसके लिए कोई कोर-कसर भी इन माओवादियों ने नहीं छोड़ा । क्या आदिवासी नहीं जान चुके थे कि माओवादी का सारा आदिवासी प्रेम छद्म और राजनैतिक है । वे उसके हितचिंतक कभी नहीं रहे ।

ऐसे में माओवादी आंतकवाद से मुक्ति के लिए बस्तर की जनता जाग खड़ी होती है और शांति के लिए अग्रसर होती है वह माओवादियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन उठती है । जाहिर है उनका छद्म और पाखंड खंडित होने लगता है । उसे भय सताने लगता है कि कहीं उसके निरापद किले ही न ढ़ह जायें । जो लोग आदिवासियों की अग्रगामिता और आक्रोश से उपजे इस लोक-अभियान को सरकारी प्रयोग कहते हैं वे बिलकुल भूल जाते हैं कि आदिवासियों को उनके प्रतिरोध के लिए भी पहचाना जाता है। भूल यह भी कि जैसे आदिवासी विरोध करना जानता ही न हो ।

वे लोग, जो अपनी अमानवीय बुद्धिजीविता को सिद्ध करने के लिए ऐसे लोक-अभियानों से उपजी परिस्थितियों का तर्क देकर सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं, जानबूझकर यह भी भूल जाया करते हैं कि वे प्रकारांतर से आदिवासियों को चुप बैठने की सलाह भी देते हैं । और इस प्रकारांतर का निहितार्थ आदिवासियों को माओवाद से समझौता का मंत्र देना भी है जिस पर अब कोई भी आदिवासी या कोई भी प्रजातांत्रिक सरकार विश्वास नहीं कर सकता। ऐसे लोक अभियानों के विरोध का एक अर्थ माओवादियों के हिंसक माहौल को बनाये रखना भी है । ऐसे में यदि माओवादियों के हिंसक आतंकवाद के खिलाफ उठ खड़े होने वाले जन-समुदाय को प्रजातांत्रिक तौर पर सरकारी संबल देना गलत है तो माओवाद हिंसा के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलना उससे कहीं अधिक ग़लत है । गांधी के शब्दों में यही पाप है । यही अन्याय है । आख़िर उन्होंने ही तो कहा था – ‘मेरा विश्वास है कि जब मेरे सामने केवल दो विकल्प रह जायेंगे – कायरता और हिंसा – तो मैं हिंसा के लिए सलाह दूँगा ।’ वे यह भी कहते रहे – ‘मेरा विश्वास है कि बुराई से असहयोग करना वैसा ही फ़र्ज है जैसा अच्छाई से सहयोग ।’

नक्सलवाद का रहस्यवाद अँगरेज़ी कानून में है या छत्तीसगढ़िया-गैरछत्तीसगढ़िया के द्वारा फैलाये गये शोषण तंत्र में ? उसे, (जिसे में केवल आंतकवाद कहना ही उचित समझता हूँ) सुलझाने के लिए क्या प्रयोग कब-कब हुए? किस-किसने संचालित किया और किस-किसने लाचारी दिखाई ? किसने आदिवासियों की चेतना को ऊष्मा दी और किसने उसकी ज़ड़ताओं को आँच बनाकर अपने बदन की सेंकाई की ? इस विपदा से किसने शुतुरमुर्ग की तरह रेत मे अपना सिर फँसाये रखा और किसने सच्चा विमर्श किया ? फिलहाल, इन प्रश्नों के उत्तरों की मीमांसा में किसी वकीली जिरह में उलझने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है संकटग्रस्त बस्तर का साथ देना । वह प्रतिरोध की संस्कृति का मतलब जान चुका है उसे पूर्णतः नैतिक समर्थन हर छत्तीसगढ़िया की नैतिकता भी होगी । यह वक्त आरपार का है।

सचमुच यह वक्त आरपार का है । हमारी परीक्षा की घड़ी का समय है । हमें तय करना ही होगा कि हम किसके साथ चलेंगे ? आंतकवादियों के साथ या आंतक से मुक्ति के लिए तरसता, जूझता, शहीद होता बस्तर के साथ ? यदि हम अपनी निजी कुंठाओं को बिसारकर, ईमानदारियों के साथ बस्तर के पक्ष में खड़े हों तो, उसे शांति और सत्ता तक पहुँचाने से कोई नहीं रोक सकता, पर नेपाल की तरह नहीं, बिलकुल भारतीय शैली में और जिसके लिए आंतक, हिंसा, अमानवीयता से जुझने वाले हर प्रजातांत्रिक शिल्प को किसी भी दलील, किसी भी न्यायालय में गैर वाज़िब नहीं ठहराया जा सकता ।

3 comments:

Smart Indian said...

आपने सत्य ही कहा है. आतंकवाद को महिमामंडित करने वाले न सिर्फ़ राष्ट्रदोही हैं बल्कि मानवता के शत्रु भी हैं. साथ ही प्रशासन को भी अधिक जिम्मेदार होकर आम आदमी की जान व अस्मिता की रक्षा के लिए अधिक प्रतिबद्ध प्रयास करने होंगे.

सतीश सक्सेना said...

अलग सा लिखते हैं आप, इस विषय पर बहुत कम जानकारी है ब्लॉग जगत पर, आशा है आप लिखते रहेंगे !

Swami Pramodanand said...

very nice.
u cn visit
http://no2terror.blogspot.com