Friday, May 23, 2008

अंतरजाल पर आत्महत्या के मायने



आत्महत्या जैविक अस्मिता का नष्टीकरण है । और मनुष्य जन्म का भ्रष्टीकरण भी । वह जीवन के प्रतिरोध में मनुष्य का सबसे बड़ा निरुत्साही कदम है । वह आत्मघाती व्यक्ति के खिलाफ़ ही नहीं, मात्र परिजनों के विरूद्ध ही नहीं, समूचे समाज, देश, युग और मानव सभ्यता में भी भयानकतम काला धब्बा है । एक दृष्टि से वह हत्या से भी ज्यादा जघन्य है । अर्थात् मनुष्य द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा दुष्कर्म ।

अनेक बार तथाकथित प्रस्थिति, सामाजिक किन्तु थोथे अहंकार, सडियल मान्यताओं की गत्यात्मकता के लिए उसकी संस्तुति भी कर दी जाती है । कम से कम दृश्य माध्यम वाली कथा सीरियलों, चलचित्रों और यदा-कदा साहित्यिक उपन्यासों और कहानियों में भी पाठक ऐसे पात्रों को नायक या नायिका के रूप में देखने लगता है । पर सच कहें तो ऐसे समय पाठक आत्महत्यारे को अपना अनुसमर्थन देते हुए भी अनजाने में मनुष्यता को नकारता भी होता है । वह आत्महत्या को वैयक्तिक रूप से प्रांसगिक मानते हुए उसके लिए सामाजिक स्वीकृति की ज़मीन भी तैयार करता रहता है । ऐसे क्षणों में वह स्वयं को शेष-दुनिया की शुचिता, कल्याण का आंकाक्षी घोषित करते हुए जरूर आत्महत्या करने वाले के प्रति सहानुभूति भी रखता है परंतु क्या ऐसी पाठकीय सहानुभूति से आत्महत्या करने वाले उस पात्र की ज़िंदगी फिर से लौटाई जा सकती है । कदापि नहीं । और जब किसी पाठक, किसी व्यक्ति चाहे वह पिता, पति, पुत्र, पुत्री, परिवार, कुल, समाज, देश ही क्यों न हो को जीवन के पुनर्सर्जन की हैसियत नहीं तो उसे आत्म-हरण को मान्यता प्रदान करने का घोषणा करने का अधिकार कैसे भी सौंपा जा सकता है । इस तरह से क्या हम आत्महत्या को प्रोत्साहित नहीं करते रहते । बहुधा हम त्याग के बहाने आत्महत्या को हितकारी निरूपत कर दिया करते हैं । दरअसल हम ऐसे क्षणों में आत्महत्या करने वाले की हत्या को अपना मौन-स्वीकृति भी प्रदान करते रहते हैं । आप जाने क्या सोचते हैं पर व्यक्तिगत तौर पर मैं तो फिलहाल ऐसा ही सोचता हूँ । क्योंकि ऐसा सामाजिक अथ के लिए ऐसा त्याग भी किसी की इति की बुनियाद पर रचा गया होता है । यह अलग बात है कि पश्चिमी गलियारों में आत्महत्या को भी मनुष्य के अधिकारों में शामिल किये जाने की अनुगूंजे कभी-कभार सुनाई देती रहती है ।

आत्महत्या मनुष्य बोध के इतिहास में सदा अस्वीकृत रही है। हर युग और समाज ने उसे निंदनीय नज़रों से देखा है । धार्मिक आचार संहिताओं में उसे पाप माना गया है तो राष्ट्रीय विचार धाराओं में नागरिकता के खिलाफ कायराना अंदाज। सामाजिक मान्यताओं में उसे असामाजिक श्रेणी में रखा गया है । विधान की दृष्टि में अपकृत्य । दंडनीय अपकृत्य । लोक साहित्य में अवश्य वह नायक-नायिका के प्रतिस्पर्धी वचनों में आया है किन्तु उलाहना के लिए । प्रेम-प्राप्ति के लिए चेतावनी बतौर ।

इन सब सत्यों के बावजूद समकालीन जीवन का एक सच यह भी है कि आत्महत्याओं का रोग समाज में लगातार बढ़ता जा रहा है । समाजशास्त्र, दर्शन, चिकित्सा, जीव-विज्ञान आदि ज्ञान की शाखाओं में उसे लेकर व्यापक चिंता-चिंतन, अध्ययन-विश्लेषण भी होते रहे हैं । इमाइल दुर्खीम जैसे फ्रांस के समाजविज्ञानी ने ऐतिहासिक अध्ययन के पश्चात अपना सिद्धांत भी हमारे समक्ष रखा है । उधर फ्रायड़ ने भी आत्महत्या के कारणों पर मनोवैज्ञानिक कथ्य-तथ्य दुनिया को दिया है । सच कहें तो आत्महत्या को लेकर न केवल उच्च कक्षाओं के पाठ्यक्रमों में विस्तार हुआ है (खास कर समाज-दर्शन में) बल्कि इसे लेकर सरकारें, युनेस्को आदि वैश्विक संगठन भी चिंताकुल हैं, इसे हतोत्साहित करने के लिए कटिबद्ध हैं पर ताज्जुब होता कि सारी दुनिया में व्यक्तिगत चेतना में लगातार वृद्धि होने और मनुष्य की सत्ता को सर्वोपरि मानने वाले जीवन दर्शन, सोच, विचार के वैश्विक प्रतिष्ठा के बाद भी आत्महत्या की दर थमती नज़र नहीं आती है । चाहे वह महाराष्ट्र में किसानों द्वारा किया जाय या कहीं और । मूल में चाहे जो भी कारण रहे हों ।

समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मुझे छात्र-जीवन में पाठ्यक्रम में आत्महत्या को लेकर अब तक हुई समाजशास्त्रीय सिद्धांतों और विवेचनों को पढ़ने और समझने का भी मौका मिला है । परंतु गौतम पटेल ने जिस तरह से जीवन की महत्ता और सत्ता को केंद्र में रखकर आत्महत्या को सभी कोणों से देखने-परखने का प्रयास किया है वह स्तुत्य है । वह किसी विश्वविद्यालय के शुष्क आंकडों, सिद्ध विचारों का लेखा-जोखा मात्र नहीं । वह आत्महत्या के निषेध का सर्वोत्तम पाठ है । सरल और आत्मीय शैली में लिखी गई किताब । भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी किताब में एक मोहनी है ।(मोहनी यानी मधुमक्खी का मधुरस) जानते हैं गाँव-घर-जंगल में जहाँ-जहाँ मोहनी पाया जाता है वहाँ-वहाँ भौंरे भी मंडराते पाये जाते हैं । गौतम की किताब मोहनी का घर है । वहाँ सर्वत्र मोहनी रस बिखरा पड़ा है । यह मोहनी रस उनकी शैली और भाषिक सौंदर्य के कारण है । आपको इस किताब में रमने से एकबारगी लगेगा कि आप आत्महत्या जैसे शुष्क विषय पर नहीं पढ़ रहे हैं बल्कि कोई ललित निबंध बाँच रहे हैं । समाजशास्त्रीय विषय में भी लेखक ने जिस तरह रम्यता की गुंजाइश निकाली है वह साबित करता है कि यदि लेखक विशुद्ध साहित्यिक अनुशासनों पर कुछ काम करे तो वह अपनी उपस्थिति से इधर साहित्यिकि पाठकों को भी चौंका सकता है ।
चलिए इसे एक उदाहरण लेकर ही देखते हैं –

“जीते-जागते रहने का नाम है जीना और जीते जी मर जाने का नाम है आत्महत्या । प्राणधार अथवा प्राणधारण करने वाले को ही बने रहना अथवा प्राण धारण किये रहना ही प्राणी का परम कर्त्तव्य है। दूसरे शब्दों में हर हाल में जीवन के दिन बिताना ही जीना है। इसमें अगर-मगर,किन्तु-परन्तु, लेकिन, फिर भी के लिए कोई स्थान नहीं । निष्कर्ष यही कि हमें हर हाल में जीना है। मत्स्य नियम अर्थात बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। यह नियम तब भी था अभी भी है और आगे भी रहेगा । इसे हम किसी भी कीमत पर बदल नहीं सकते । जंगली विधान अर्थात बड़े वृक्षों के नीचे छोटे वृक्ष नहीं पनप सकते । अतीत में भी नहीं, वर्तमान में भी नहीं और भविष्य में भी नहीं । यह एक प्राकृतिक विधि है। इसमें परिवर्तन प्रकृति को भी मान्य नहीं मवेशी कानून अर्थात् जिसकी लाठी उसकी भैंस ।”

इस किताब के पाठकों के लिए यह बोनस होगा । हिंदी में जिस तरह से साहित्येतर विषयों का लेखन कम हुआ है इसके पीछे पठनीय आकर्षण का अभाव रहा है । शिल्प और शैली की जटिलता के कारण इधर आसपास के तथाकथित अंतरराष्ट्रीय कवि भी अपने पास-पडौस के पाठकों में नहीं पढे जा रहे हैं । ऐसे दौर में जटिल सामाजिक समस्या को रम्य और साहित्यिक अंदाज में प्रस्तुत कर गौतम ने फिर एक बार याद कराया है कि लिखा ऐसा ही जाना चाहिए जो पाठकों के चित्त को घेरे रख सके । जो उसके मन-मनीषा में शब्दों की दुनियावालों से चिढ़ उत्पन्न न कर सके और सांस्कृतिक दुनिया में यह नकार न जनम सके कि वह आखिर क्यों कर पढे।

गौतम की दृष्टि मूलतः आध्यात्मिक रही है । वे किसी चीज को भारतीय परंपरा के अक्स में देखते-परखते हैं । शायद यही कारण है कि आत्महत्या जैसी विषय-वस्तु को परत-दर-परत खोलते वक्त वे मूल्याँकन में भारतीय मान्यताओं की कसौटी को अपने समक्ष तवज्जो देते हैं । इसका मतलब यह नहीं कि वे पश्चिम की सर्वमान्य विचारधाराओं, इतिसिद्ध दृष्टियों को नकारते चलते हैं । वे अपने निष्कर्ष में मनुष्य जन्म को सर्वोपरि देखते हैं । तर्कों को इस तरह प्रतिष्ठित करते हैं कि कोई जीवन से हारा हुआ व्यक्ति इसे पढ़ ले तो शायद ही वह आत्महत्या का विचार न त्यागे ।

इस ई-किताब में आत्महत्या के इतिहास, कारणों, परिस्थितियों, लक्षणों, निदानों, मान्यताओं और विचारों को 16 अध्यायों में संजोया गया है । इस शोधात्मक किताब में आत्महत्या को रोकने की दिशा में कार्यरत सामाजिक संस्थाओं की सम्यक जानकारी भी दी गयी है । इस मायने में यह किताब केवल साहित्यिक पाठकों के लिए ही नहीं बल्कि समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने वालों, समाज अध्येताओं के लिए भी महत्वपूर्ण बन पड़ी है ।

जैसे कि हम सब जानते हैं कि आज नई पीढ़ी लगातार किताबों से विमुख होती जा रही है । नये ज़माने की प्रौद्योगिकी भी उसे किताबों से दूर ले जाने का षडयंत्र कर रही है । ऐसे समय में खासकर तब जब दुनिया के समस्त ज्ञान-विज्ञान और मनुष्य द्वारा खोजे, सिद्ध किये गये कौशलों को अंतरजाल पर रखने की स्वस्थ शुरूआत हो चुकी है । गौतम द्वारा इसे सीधे अंतरजाल पर रखना सामयिक कदम है । आज भले ही हम कह लें कि अंतरजाल की संस्कृति भारत में नहीं चलेगी । पर ऐसा कहना परिवर्तन की शाश्वत गति को नकारना भी होगा । भारतीय प्रतिभा और उसके देन को भी नकारना होगा । क्योंकि यह तो बिलगेट्स भी समझ चुके हैं कि ज्ञान के विश्वव्यापी माध्यम इंटरनेट को नित नया और चिरंतन बनाये रखने के लिए भारतीय प्रतिभा को नकारना अब असम्भव होगा । और सच्चे अर्थों में अंतरजाल या इंटरनेट गाँव-घर के ज्ञान, कौशल, शिक्षा, सिद्धि, पद्धति को वैश्विक बनाने का मानवीय सरोकारों से भरा संचार माध्यम भी है । केवल मनोरंजन और अपकृत्यों को प्रोत्साहित करने वाला माध्यम नहीं । और यह भी सच है कि जब तक हम भारतीय अपनी सांस्कृतिक कौशलों को अंतरजाल पर नहीं रखेंगे तो नयी पीढ़ी क्योंकर पोर्न साइट की ओर नहीं लपकेगी । मेरा व्यक्तिगत मानना तो यह भी है कि जब हम इंटरनेट को हिंदी की ताकत, क्षमता और दक्षता से नहीं समृद्ध नहीं कर सकते यानी एक बड़ी रेखा नहीं खेंच सकते तो किस मुँह से कह सकते हैं कि पश्चिम हमारी भावी पीढ़ी को विकृति की ओर धकेल रहा है ।

भले ही आप कह लें कि खिलेगा तो देखेंगे । पर कहाँ-कहाँ तक आप खिलायेंगे । भले ही आप मिठलबरा की आत्मकथा सुनाकर ऐसे लोगों से अपने आसपास को बचा सकते हैं । पर उनका क्या होगा जिनके आसपास भी ऐसे मिठलबरे पाँव जमाये हुए हैं और जो उखडने का नाम ही नहीं लेते । भले ही आप यह चीखते चिल्लाते रहें कि आपके किसी खास ने सरस्वती को भी संपादित किया था । पर यह कितने लोगों को सुनाई देगी । पर मुझे इस समय संतोष है कि भविष्य के सबसे कारगर माध्यम इंटरनेट पर जहाँ आत्महत्या पर और जिस पर हिंदी में कोई सामग्री नहीं थी अपनी समूची किताब को ई-किताब में गौतम ने तब्दील कर दिया है । इससे हिंदी ही समृद्ध होगी समूचे विश्व में ।

यह अलग बात है कि यह किताब भविष्य में प्रिंट में भी आयेगी । ज्यादा से ज्यादा पाँच सौ प्रतियों में । जिसे ज्यादा से ज्यादा वे पाँच सौ पाठकों तक पहुँचा सकेंगे । पर इंटरनेट पर इस कृति के आने से अब दुनिया भर के सभी हिंदी पाठक इसका फायदा हजारों वर्ष तक उठा सकेंगे और गौतम पटेल का नाम अंतरजाल पर आत्महत्या लिखने वाले पहले कृति लेखक के रूप में शुमार किया जाता रहेगा । आप उन्हें एक गंभीर लेखक के रूप में नहीं लेगें इसके उनका क्या बिगड़ेगा ?


समीक्षित कृति
कृति-आत्महत्या
लेखक- गौतम पटेल
प्रकाशक - वैभव प्रकाशन, रायपुर
मूल्य- 100 रुपये

1 comment:

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

आपको इस हेतु क्या कहूं कैसे कहूं मानस जी गौतम पटेल जी दोनों को बधाइयां अच्छा विषय चुना है . कृति डाक से भेजें या डाक का पता देन मैं ड्राफ्ट भेजे देता हूँ
pl. mail me girishbillore@gmail.com