Thursday, January 14, 2010

इंडिया टुडे ने याद किया


इंडिया टुडे पढ़नेवालों के लिए तो नहीं किन्तु उनके लिए जो इंडिया टुडे नहीं पढ़ते या नहीं पढ़ पाते सिर्फ़ उनके लिए । मोह नहीं किन्तु जो छापा है इंडिया टुडे ने अपने 20 जनवरी, 2010 के अंक में उसे पाठकों के समक्ष रखने में क्या बुराई है ! तो लीजिए.....


नया समय, नए संदर्भ
बृजबाला सिंह
यह पुस्तक विश्वरंजन के साहित्यिक मन का दर्पण है । इसमें चुनी हुई 48 कविताएँ, आलेख, समीक्षा, डायरी तथा महत्वपूर्ण साक्षात्कार हैं, जिनमें उनका रचनाकार निरंतर गंभीर बना रहता है, जयप्रकाश मानस के संपादन कौशल का नमूना वह ‘पुरोवाक्’ है, जिसमें उन्होंने विश्वरंजन के सर्जक को परिभाषित ही नहीं बल्कि उदाहरण के साथ विश्लेषित भी किया है । पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के लिए रचनाकर्म एक साधना है, जो सृजन संघर्ष की गलियों में चल रही पूरी की जाती है । वे नहीं मानते कि कविता लिखना कोई सहज कार्य है ।


मानस ने विश्वरंजन की सृजनद-शक्ति एवं क्षमता में गहराई तथा विस्तार, दोनों देखा है: “विश्वरंजन की कविता नए समय, नए संदर्भों की कविता है, नई मात्र इस अर्थ में नहीं कि व नई विषयवस्तु, नए काव्य-प्रक्षेत्रों तक अपनी पहुँच को सिद्ध करती है, नई इस अर्थ में भी कि वे बासी होते मनुष्य को नई गरिमा और नई दृष्टि देती हैं (वजूद में हर समय बासी होने का डर रहता है )। शब्दों के मौन में अर्थ की नई वृष्टि करती हैं । नई सृष्टि का ख़ाका रचती हैं । साधारण मनुष्य के समय, समाज और संकटों की पहचान कराती हैं । उनकी कविता भयावह दृश्यों के बीच जान-बूझकर ओढ़ी गई चुप्पी को खरोंचते हुए हुए इंसान को सतर्क कराती है । इस मानवीय उद्यम की लय में कवि का मन पास-पड़ौस में तितर-बितर पड़े शब्दों को नए सिरे से ढूँढता है । उन्हें झाड़ता-पोछता है । नए संदर्भों के बरक्स ऐसे चित-परिचित शब्द स्वमेव ताजगी से भर उठते हैं । कवि का यही अर्थागम-सिद्धि कविता में विन्यस्त शब्दों को नई चमक से लैस कर देती है । जाहिर है, इस चमत्कृति में केवल कवि मन ही नहीं, मेधा की भी भूमिका उल्लेखनीय है।”


संग्रह की कविताओं में ‘भारत माता की जय’, ‘क्रांति की बातें मत करो’, के साथ-साथ बाज़ार के इर्द-गिर्द घूमती कई कविताएँ हैं जिनमें बाज़ार का प्रयोग व्यंग्य एवं विस्तार लिये हुए है – ‘बाज़ार के इर्द-गिर्द घूमती कुछ कविताएँ’, ‘बाज़ार की मार और आज का आदमी’, ‘तलाश बाज़ार से बाहर निकल आने की’....., ‘बाज़ार के खिलाफ जंग का पहला ऐलान’, ‘बाज़ार से लड़ना एक अनिवार्य हिमाकत है’, ‘बाज़ार वह मन है’….., जैसी कई कविताओं को संग्रहीत करके मानस ने विश्वरंजन के कविमन की उन तहों का पर्दाफाश किया है जिनमें सदियों से चले आ रहे बाज़ार का समापन हुआ है । बाज़ार जिसमें कभी एक वर्ग बिकता था, आज हर आदमी बिक रहा है, बहुत सस्ता । विश्वरंजन मानते हैं है कि अब बाज़ार से लड़ना ज़रूरी हो गया है क्योंकि आदमी अब बाज़ार की मार सहने में असमर्थता महसूसस करने लगा है । वह बाज़ार से निकलने का रास्ता खोज रहा है । कवि को पता है कि बाज़ार से लड़ना आसान नहीं है । लेकिन उम्मीद की किरण शेष है : बाज़ारी ख़ौफ़ और आतंक के कोहरे से लिपटे रहने के बावजूद सूरज से दोस्ती करने की कर रहे हैं बदस्तूर कोशिश और इसी कोशिश में शायद छुपा हो बाहर निकल आने का कोई रास्ता । विश्वरंजन को आत्मविश्लेषण का कवि मानते हैं मानस ।


संग्रह में साहब को केंद्र में रखकर भी बहुत सी कविताएँ हैं – ‘साहब सब जगह होता है’, ‘साहब का भी एक साहब होता है’, ‘साहब की एक मेमसाहब होती है’.... ‘कलेक्टर साहब और क्लबघर’ आदि । यहाँ भूखे लोगों की आँखों में जमी चुप्पी देखी जा सकती है । समय से पहले मुरझाने का अफ़सोस है । बचपन की दीवाली की यादें हैं तो एक बेहत्तर इंसान का स्वप्न है ।


विश्वरंजन ने कबीर को पहला क्रांतिकारी और सेक्युलर कवि माना है । उन्हें फ़िराक़ की शायरी में सदियों की आवाज़ सुनाई देती है । वे कलाकार हैं, आधुनिक कला को समझने की ज़िद है उनमें: यह कठिन काम है । कलाकृतियों, चित्रकला, पेंटिग्ज के पास जाना ही पड़ेगा आपको उनमें डूबने-उतराने के लिए । एक लेख में विश्वरंजन की अधूरी काव्य-यात्रा का वृत्तांत है । वे कविता के विषय से अधिक कविता की भाषा पर बल देते हैं । मैंने हमेशा यह कोशिश की है कि मैं अपने ‘मैनरिज्म’ में क़ैद होके न रह जाऊँ । मैं यह हमेशा यह पाता हूँ जब एक ख़ास ‘मैनरिज़्म’ ‘रेटॉरिक’ या ‘फॉर्म’ मुझे बाँधने लगती है, मेरे अंदर कविता मौन होने लगती है । क्योंकि मैं पैंटिग भी करता हूँ, मैं पैंटिग की ओर बढ़ जाता हूँ । जब पुनः कविता में लौटता हूँ, चाहता हूँ कि अंदाज़े-बयां बदला हुआ हो । मानस ने विश्वरंजन पर एकाग्र इस पुस्तक का संपादन करके पाठकों की अतिशय सहायता की है, विशेषकर उस दौर में जबकि गढ़ी जा रही है नए शब्दों को, अर्थों को चमका कर / कविता की पहली पंक्ति ।

कृति- एक नई पूरी सुबह (विश्वरंजन पर एकाग्र)
संपादक- जयप्रकाश मानस
प्रकाशक- यश प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य –
395 रुपये

4 comments:

आमीन said...

i will try

डॉ महेश सिन्हा said...

बधाई मानस जी और विश्वरञ्जन जी को

डॉ महेश सिन्हा said...

http://paanchwakhamba.blogspot.com/2010/01/blog-post_10.html

Anil Pusadkar said...

बधाई विश्वरंजन और जयप्रकाश,दोनो को।