Tuesday, December 08, 2009

माओवादी कार्पोरेट नेटवर्क के बंधुआ मजदूर

इधर प्रजातंत्र को जड़ से ध्वस्त करने के लिए उद्यत नक्सलियों से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों का संयुक्त अभियान यानी आपरेशन ग्रीन हंट शुरू ही नहीं हुआ है, उधर नक्सलियों के प्रकारांतर से हिमायती दिल्ली में चीखने-चिल्लाने लगे हैं कि देश को युद्ध की विभीषिका में झोंका जा रहा है । इन अनर्गल प्रलापियों में शामिल हैं – अरुंधति राय, सरोज गिरी, गौतम नवलखा, बी.डी.शर्मा, वरवर राव, प्रो.जगमोहन, पी.ए. सेबास्टैन, हरीश धवन जैसे अनेक जाने-माने लोग और पीयूसीएल, पीयुडीआर, भाकपा माले (लिबरेशन), आरडीएफ़ जैसे अनेक संगठन ।

बार-बार झूठ को दोहरा कर सच का आभास कराने में प्रवीण इन संगठनों और बुद्धिजीवियों की बात पर विश्वास करें तो भारतीय राजसत्ता द्वारा 1 नवंबर, 2009 से जनता के खिलाफ शुरू हो चुके इस युद्ध के कई हफ्ते बीत चुके हैं। और तो और, इस युद्ध में मारे जानेवाले आदिवासियों की संख्या रोज-ब-रोज बढ़ रही है । उसी तरह जलाये गये गाँवों, विस्थापितों, घायलों और गिरफ्तार लोगों की संख्या भी बढ़ रही है । नक्सली-दुष्प्रचार की हद देखिए कि इनके अनुसार संयुक्त दल ने वायुसेना के हेलिकॉप्टरों और अमेरिकी खुफिया सैटेलाइटों की मदद से सेना के शीर्ष अधिकारियों के नेतृत्व में दंडकारण्य और इसके आसपास के इलाकों में ऑपरेशन शुरू कर दिया है । इतना ही नहीं, नवंबर के मध्य में 12 से अधिक गाँव पूरी तरह मिटा दिये गये, उनके निवासियों को जंगल में और अधिक भीतर शरण लेने पर मजबूर किया गया । दंडकारण्य में दो अलग-अलग और उड़ीसा में एक जनसंहार की घटनाएँ सामने आयीं, जिनमें 17 से अधिक आदिवासी सरकारी सैन्य बलों द्वारा मारे गये । जबकि दंडकारण्य यानी बस्तर में ऐसा इन पंक्तियों के लिखे जाने तक कुछ भी नहीं हुआ है।

पिछले ही दिनों, 4 दिसम्बर, 2009 को इस फोरम की बकायदा दिल्ली में बैठक हुई जिसमें कहा गया कि यह युद्ध कॉरपोरेट्स की तरफ से उनके फायदे के लिए भारत सरकार द्वारा आदिवासियों के जीवन को निशाना बनाते हुए लड़ा जा रहा है । विश्वव्यापी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था अभी 1929 के बाद से सबसे गंभीर संकट झेल रही है, अपनी सभी निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को मंदी के दलदल में और गहरे तक डुबोते हुए । सैन्य औद्योगिक तंत्र-जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों और भारत के बड़े व्यावसायिक हित हैं - युद्ध चाह रहा है । यानी यह तथाकथित युद्ध ख़िलाफ कॉरपोरेट्स करवा रहे हैं ।

यह किसी से नहीं छिपा है कि आपरेशन ग्रीन हंट जिसे कथित मानवाधिकार बुद्धिजीवी आदिवासी नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध परिभाषित कर रहे हैं, मूलतः आदिवासी इलाकों को नक्सली विध्वंस, उत्पात और हिंसा से मुक्त करने का अभियान है । यह अभियान सीधे-सीधे उन अराजकतावादी ताकतों के विरुद्ध है जो प्रजातांत्रिक विकास-प्रक्रिया, संविधान, चुनाव आधारित प्रतिनिधित्व प्रणाली, न्याय व्यवस्था और कार्यपालिका को पिछले कई वर्षों से खुली चुनौती दे रहे हैं । यह अभियान उनके ख़िलाफ़ है जो बम, बंदूक और बारूद को अंतिम विकास का औजार मानते हैं। यह अभियान उनके ख़िलाफ़ है, जो आदिवासी और तुलनात्मक रूप से वंचित और आदिवासियों के रहवासी क्षेत्रों के सार्वजनिक संसाधनों का लगातार विनाश कर रहे हैं । यह अभियान उनके ख़िलाफ़ हैं, जो ऐसे जनपदों में अपनी स्थायी रणनीति के तहत संचालित जनयुद्ध के विरूद्ध आदिवासियों को मर-खप जाने के लिए विवश कर रहे हैं । यह अभियान उनके ख़िलाफ़ है जिनका बातचीत पर किंचित विश्वास नहीं है और जो मात्र हिंसा और आंतक के सहारे अपनी सिद्धि की रोमानी सपने में जी रहे हैं । और यह सब पिछले 4 दशकों की नक्सली गतिविधि से स्वतः प्रमाणित हो चुका है ।

नक्सलियों का मूल उद्देश्य देश में माओवादी शासन पद्धति की स्थापना है, वंचितजनों के अधिकारों की बहाली नहीं। यदि वे वचिंतजनों या आदिवासियों के हित में संघर्ष कर रहे होते तो नक्सलियों के हाथों मारे जानेवालों में आदिवासियों की संख्या सर्वाधिक नहीं होती । अब तक किसी जनपद में माओवादी विकास के उपक्रम में कोई रोल मॉडल दृश्यमान होता, जिसे प्रजातांत्रिक विकास के विकल्प के रूप में सार्वजनिक स्वीकृति मिल चुकी होती । यदि वे मन, कर्म और वचन से बस्तर के हितैषी होते तो उनके विरोध में कोई ‘सलवा जुडूम’ जैसा किसी प्रतिरोधी आंदोलन का सूत्रपात ही नहीं हुआ होता । प्रजातंत्र में जनअधिकारों की बहाली, शोषण से मुक्ति और विकास के लिए लामबंद पहल की पूरी छूट है । कानून और संवैधानिक प्रावधान भी इससे सहमत हैं किन्तु हिंसक रास्तों के सहारे सारे समाज को अशांत और भयग्रस्त बना देने की अनुमति कैसे चंद बुद्धिजीवियों या किसी हिंसक संगठन को दी जा सकती है ?
आज नक्सली आंतक के पर्याय बन चुके हैं । आज नक्सली स्वयं को विकास-विरोधी साबित कर चुके हैं । ऐसी परिस्थितियों में आदिवासी क्षेत्रों में शांति-बहाली का कौन-सा रास्ता शेष बचा है ये बुद्धिजीवी बताने में पूर्णतः असमर्थ हैं । दरअसल ये बुद्धिजीवी एकतरफा मानवाधिकार के हिमायती हैं – जिन्हें सिर्फ़ नक्सलियों का ही अधिकार दिखता है, जिसे वे आदिवासी के अधिकार के रूप में प्रस्तुत करते हैं । आख़िर इन आदिवासियों को नक्सली नेताओं ने पिछले 40 वर्षों में बुनियादी हक के लिए प्रचलित व्यवस्था के ख़िलाफ़ सिर्फ़ हिंसात्मक, आंतककारी और विध्वसक संघर्ष का विकल्प ही क्यों कर सुझाया ? अपने प्रभाव क्षेत्र में पले-बढ़े और युवा हो चुके वनपुत्रों को नक्सलियों ने कृषक, कारीगर, कलाकार, मास्टर, डाक्टर, मिनिस्टर बनाने के बजाय सशस्त्र सैनिक में क्यों तब्दील कर दिया ? इन्हें क्योंकर गुरिल्ला ट्रेनिंग दी गई ? क्या नक्सली आदिवासियों की एक समूची पीढ़ी को भविष्य में आदिवासी भाई की ही हत्या के लिए पूर्व नियोजित तरीके से तैयार नहीं कर रहे थे ? उन्हें नक्सलियों ने विकास के लिए संघर्ष के सर्वमान्य चेतनात्मक और सभ्य तरीकों से आख़िर क्यों नहीं जोड़ा ? और शांतिपूर्ण जीवन शैली और ऐतिहासिक रूप से धीमी प्रगति पर विश्वास करने वाली वन विश्वासी आदिवासी इसी नक्सलवादी जिद्दी के कारण आत्महंता दौर से गुजरने के लिए विवश कर दिया गया है । इन सारे प्रश्नों के कोड़े भी ऐसे बुद्धिजीवियों की पीठ पर बरसाने जाने चाहिए, जो देश में भ्रम का धंधा करते हैं ।

इन बुद्धिजीवियों में से शायद ही किसी ने पिछले 2-3 दशकों में ऐसी कोई अपील, विचार समक्ष प्रस्तु किये है, जिसमें नक्सलवादियों का रूझान हिंसामुक्त एवं ध्वंसमुक्त संघर्ष की ओर विकसित हो सके । इन्हें और इनकी प्रगतिशील विचारों के अंतर्द्वंद्व को साफ़ साफ़ पहचाना जा सकता है – ये वही हैं जो आदिवासियों द्वारा संचालित सलवा जुडूम को हिंसक किन्तु कथित आदिवासियों द्वारा संचालित नक्सवादी हिंसा को कल्याणकारी सिद्ध करते फिरते हैं । ऐसे बुद्धिजीवियों से देश और समाज को कम खतरा नहीं जो बुद्धि का व्यवसाय करते हैं। इन बुद्धिजीवियों की हरकतों, बयानों, विचारों और आलेखों का विश्लेषण किया जाये तो ये माओवादी कार्पोरेट नेटवर्क के बंधुआ मजदूर की तरह दिखाई देते हैं, जो दंतेवाड़ा से दिल्ली और कांकेर से कनाड़ा तक फैले हुए हैं, और जिनका एकमात्र पेशा नक्सलवादियों के पक्ष और व्यवस्था के विपक्ष में वैचारिक वातावरण तैयार करना है ।
कम से कम छत्तीसगढ़ के लोगों को बुद्धिजीविता के ऐसे तिलिस्मी रहस्यों के बारे में सोचना ही होगा अन्यथा भविष्य उन्हें माफ नहीं करेगा ।

3 comments:

Suresh Chiplunkar said...

very nicely written... excellent post

डॉ महेश सिन्हा said...

आपकी व्यथा सही है . आपके जज्बे को नमन

Hitendra SIngh said...

राष्ट्रीय प्रेस विशेषकर हिन्दू जैसे अख़बार, तहलका और आउटलुक जैसी पत्रिकाएँ और एन.डी.टी.वी. जैसे चैनल इन तथाकथित मानवाधिकारवादियों और छद्म नक्सलियों के साथ हैं। इनका छत्तीसगढ़ में बहिष्कार होना चाहिये। उचित लिखा है आपने।
-हितेन्द्र सिंह