Sunday, May 18, 2008

किसने छीना बस्तर का मानवाधिकार ?


प्रजातंत्र कई रोगों से ग्रस्त हो चुका है । यहाँ प्रजा चींटी साबित हुई है और तंत्र पागल हाथी । राजनैतिक दल वास्तविक हकदारों के खिलाफ़ लड़ने में कारगर साबित नहीं हैं । जनप्रतिनिधि के रूप में हर किसी ने जनता के हिस्से को डकारने का कार्य किया है । सरकारी तंत्र में घनघोर शोषण है । कार्यपालिका के गलियारों तक गरीबों, दलितों, आदिवासियों की चीख-पुकार नहीं पहुँच पाती । उद्योगपतियों, व्यापारियों ने निरंकुश होकर जनता की गाढ़ी कमाई पर सेंध मारा है । बिचौलियों ने मनभर अनपढ़ों को लुटा है । न्याय चाँदी के सिक्कों के बिना मुहैया नहीं हो पाता । आम जन के स्वप्नों की रोज हत्या हो जाती है । कोई सुननेवाला नहीं । मानव होने का मूल अधिकार ही यहाँ चरितार्थ नहीं होता । यह सब ठीक है । भारतीय प्रजातंत्र का आत्मघाती यथार्थ भी है जिसके खिलाफ लड़ने की बात चलने पर आज हर कोई दूसरों के घर से भगतसिंह या सुभाषचंद्र के अवतरित होने की राह देखता है ।


पर इसके विकल्प में नक्सलवाद कैसा हल है जिसने सिर्फ अमानवीय विनाश का कलंक ही पोत दिया है हमारे मुँह पर । दूर जाने की नहीं कहूँगा । मेरे पड़ोसी जिले बस्तर को ही देख लें – और समूचे समय को ही नहीं । मात्र पिछले साल का मुआयना कर लें -


बस्तर में पिछले एक साल में यानी कि 2007 में नक्सलियों ने दौरान 635 हमले किये हैं । जाहिर है ये हमले जनता पर ही हुए हैं । ऐसी जनता, जो आदिवासी है । सीधी-सादी है । निर्दोष है । वन-प्रांत की स्थायी शांति चाहती है । इन हमलों में 242 बेकसुर नागरिकों को अपनी जान गवानी पड़ी है । इनमें से अधिकांश इसलिए मारे गये हैं क्योंकि उन्होंने नक्सलियों का साथ देने से इंकार कर दिया । इतना ही नहीं अपने माँ-बाप और घर-परिवार को छोड़कर जंगलों में रात दिन सेवा देते 125 सुरक्षा बल के जवान इन नक्सिलयों द्वारा मौत के घाट उतारे गये हैं । इसलिए कि ये दो रोटी की जुगाड़ में पुलिस में नौकरी करने के लिए विवश थे ।


क्या-क्या कहर नहीं ढ़ाया है बस्तर में प्रजातंत्र का विकल्प तलाशने वाले हिंसक लोगों ने इस बीच । उन्होंने न ननिहालों के स्कूलों को छोड़ा है न ही छोटे-मोटे दवाखानों को । इस दरमियान बार-बार बिजली का टॉवर गिरा दिया गया तो कभी सारे बस्तर की बिजली ही ठप्प कर दी गई । पंचायत भवन जहाँ ग्रामीण अपने विकास की रणनीति गढ़ते हैं को भी सरे आम इस दौरान सैकड़ों की सख्या में नेस्तनाबुत कर दिया गया है । आये दिन रेलवे की पटरियाँ उखाड़ दी गई जिससे किसी गर्भवती माँ का बच्चा पेट में ही मर गया, मरणासन्न बूढ़े बाप का मुँह तक उसके परिजन नही देख पाये । बरसों का प्यार इन आंतकियों के कारण टूट गया । दो प्रेमी जीवन भर के लिए बिछुड़ गये । पढ़ा-लिखा बेरोजगार समय पर साक्षात्कार नहीं दिला सका ।


एक आँकड़े के अनुसार मात्र पिछले 365 दिन में ही नक्सलियों ने 55 प्रायमरी शाला भवन, 8 पंचायत भवन, 9 शाला आश्रम, 9 छात्रावास, 8 आंगनबाड़ी केन्द्रों को नष्ट कर दिया है । इसके अलावा अन्य 18 भवनों को इन्हीं तथाकथित प्रजाहितैषियों ने नष्ट किया कर दिया गया है । जिससे करोड़ों रूपयों की सार्वजनिक संपत्ति स्वाहा हो चुकी है । यह केवल सरकारी हानि नहीं । यह जनता के खून-पसीनों से संचित धन की भी हानि है, जिसमे बस्तर के आदिवासियों का भी हिस्सा है । जिसमें समूची भारतीय जनता का भी अंशदान है ।


जो बस्तर के आदिवासियों की शांति झीन लेना चाहते हैं । जो माँ-बाप से उसके निर्दोष बेटों का सहारा छीन लेना चाहते हैं । जो जनता के क्रांतिकारी विकास के नाम पर उनके घरों, अस्पतालों, सामुदायिक भवनों को ध्वस्त कर दें । जो उनके घरों की बिजली को सप्ताहों, महीनों के लिए ठप्प कर दें । जो बस्तर की माँ-बेटियों की इज्जत पर दाग डाल दे वह उनके कैसे हितैषी हो सकते हे ?

अब ऐसे में यदि दशकों से आंतकित और स्थायी शोषण से बस्तरिहा ग्रामीण मुक्ति चाहे । वह जंगली आंतकवाद से लड़ने का संकल्प ले । वह राहत शिविरों में आसरा ले । उस पर भी उन शिविरों में नक्सली हमला करते रहें । ऐसी दुःसह और दारुण परिस्थितियों में नक्सलियों के खिलाफ बस्तरवासियों की ओर से खड़ा किया गया सलवा जुड़ूम अभियान जबरिया रोकना सरकार के लिए क्या अमानवीय नहीं होगा ? ऐसे अभियानों को तथाकथित मानवअधिकार और सुविधाओं के अभाव के नाम पर रोक लगाना क्या नक्सलवाद को तरजीह देना उचित होगा – न्यायिक दृष्टि से । वह भी सिर्फ इसलिए कि उसके विरोध में धंधेबाज प्रचारकों, हल्ला करने बुद्धिजीवियों की सक्रियता कहीं अधिक है । क्या मानवअधिकार सिर्फ बुद्धिजीवियों के लिए बनाया गया है ? मानवअधिकार इसलिए नहीं बनाया गया है कि आप नक्सलियों का साथ दें और संदेहास्पद होने पर मानवअधिकार के हनन के नाम पर खूब चींखे-चिल्लायें । अपनी ताकत और संपर्क के बल पर पूरी दुनिया में पोस्टर चिपकादें । और एक सिरे से भूल जायें कि वहाँ आदिवासियों का हनन हो रहा है । वह भी आपके तथाकथित मानवअधिकार के हनन से दशकों पहले । तब आप कहाँ थे ?


आदिवासियों के मानवाधिकार की निरंतरता में न तो नक्सली संलग्न हैं बुद्धिजीवी, समाजसेवी, न ही आदिवासी लेखक । अब समय आ गया है कि आदिवासी अपने लेखक तैयार करें । अपने बुद्धिजीवी तैयार करें । परसेंटखाऊ समाजसेवी संस्थाओं की पहचान करें जो उनके बीच रहते हैं और नक्सलियों (यानी आदिवासियों को इस्तेमाल करने वाले स्वार्थी, हिंसक और राजनैतिक लडाकूओं) से भी जुड़े रहते हैं । आदिवासी समाज के पढ़े लिखे तबकों को अब जागना ही पड़ेगा कि वे अपने पत्रकार तैयार करें जो दुनिया भर में उनकी बातों को भी सामने रखें । वरना अधिक पढ़े लिखे लोग उन्हें हर बार, हर कोण से पराजित करते ही रहेंगे ।


क्या यह गंभीर और असामान्य परिस्थिति नहीं है ? क्या इस जन आंदोलन को बीच में छोड़ देना न्यायिक कदम होगा ? ऐसे क्षणों में इस आंदोलन को नैतिक रूप से सरकार ने समर्थन दिया है और बस्तर में 3400 विशेष पुलिस अधिकारियों(SPO) की नियुक्ति की है तो बुराई क्या है ? ये वही युवा हैं जो नक्सलियों से तंग आ चुके हैं । उनकी माँगों की पूर्ति करते उनके परिवार के लोग थक चुके हैं । यदि वे भटक कर भी नक्सलियों का साथ दे रहे थे और अब उनके खिलाफ उठ खड़े हुए हैं तो इसमें उनका आत्मसुधार और सत्य के प्रति आग्रह ही है । आखिर वे नक्सलियों यानी की अराजक तत्वों का साथ क्यों दें ? अराजक तत्वों के खिलाफ सर्वसम्मति से प्रारंभ सलवा जुडूम में क्यो न योगदान करें ? यह न करने का मतलब नक्सिलयों का साथ देना भी होगा । जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है ।


जो पुलिस की कार्यप्रणाली को जानते हैं वे समझ सकते हैं कि विशेष पुलिस अधिकारियों की व्यवस्था का पुलिस एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है। एसपीओ की उपस्थिति से ग्रामवासियों में नये आत्मविश्वास आया है । उन्हें लगने लगा है कि उनके कोई अपना उनकी सुरक्षा के लिए अब कटिबद्ध है । ये नक्सलवाद के हिंसक गतिविधियों को रोकने और जूझने की मुहिम में भी सुत्रधार की तरह प्रशासन का हाथ बटा रहे हैं । हम याद करें असाधारण परिस्थितियों में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जम्मू-कश्मीर में ऐसे शक्तिबल की आवश्यकता ज़रूरी मानी गई है ।

जब नक्सली प्रजातंत्र को नहीं मानते । जब नक्सली अपनी न्यायप्रणाली चाहते हैं । और अपनी सिद्धि (यानी प्रजातांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति)के लिए कोर्ट, मानवाधिकार फोरमों, लेखक-पत्रकार संगठनों, मीडिया का सहारा तो ले सकते हैं । पर आदिवासियों के शोषण, दमन, अत्याचार, मानवाधिकार के बारे में कुछ नहीं कर सकते । यहाँ तक की प्रजातांत्रिक तौर पर राजनीतिक सत्ता के लिए भी पहल नहीं कर सकते । तब ऐसी परिस्थितियों में क्या 2008 में बस्तर के आदिवासियों को नक्सलवादियों के हवाले फिर से छोड़ दिया जाय ? उन्हें कैंपो से लौटा दिया जाय ? और पुलिस शहरों के थानों में चैन की नींद सोती रहे ?

5 comments:

जितेन्द्र दवे said...

bhaisaheb, aapne to aankhe khol dene vaali baat likhi hain. bahut hi gahan aur khojparak jaanakaari ke liye dhanyvaad. khushi ki baat hai ki sach kaa saath dene vaale aap jaise log bharatbhoomi mein ab bhi mauzood hain.

जितेन्द्र दवे said...

bhaisaheb, aapne to aankhe khol dene vaali baat likhi hain. bahut hi gahan aur khojparak jaanakaari ke liye dhanyvaad. khushi ki baat hai ki sach kaa saath dene vaale aap jaise log bharatbhoomi mein ab bhi mauzood hain.

Sanjeet Tripathi said...

बहुत सही!!
सहमत!

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

सामयिक वैचारिक आलेख के लिये धन्‍यवाद ।
छत्‍तीसगढ में आदिवासी लेखक व पत्रकार तो निश्चित ही होंगे पर उन्‍हें मौका नहीं दिया गया है, उनके लेखनी व शव्‍दों को निश्चित ही परिष्‍कृत करने की आवश्‍यकता है पर यदि उनके लेखों आदि को प्रकाशक मौका देंगें तभी यह संभव हो पायेगा । इसके साथ ही आदिवासी अस्मिता व वर्तमान परिवेश से संबंधित (जैसा कि यह लेख है के साथ ही)कविता, कहानी, लेख आदि के नियमित प्रकाशन की भी आवश्‍यकता है चाहे वह आदिवासियों के द्वारा लिखा गया हो या गैर आदिवासी के द्वारा ।

MANNU LAL THAKUR said...

aapki bate sach hai.aadivasi samaj ko apni pahchan banani hogi or pahchan karni shikhni hogi