Monday, July 06, 2009

प्रमोद वर्मा, विश्वरंजन और कुछ लोग

प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह पर विशेष

‘कुछ लोग’ प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । ‘कुछ लोग’ यह भी नहीं जानते कि हर कोई प्रमोद वर्मा को नहीं जान सकता । वैसे ‘कुछ लोग’ स्वयं के बारे में भी नहीं जान पाते । बात ऐसे ‘कुछ लोगों’ की नहीं हो रही है । बात उनकी होनी चाहिए जो लोग प्रमोद वर्मा को कुछ-कुछ जानते हैं, उनके कुछ अनजाने को भी स्वयं और समूची दुनिया के लिए जानना ज़रूरी समझते हैं। विश्वरंजन उन कुछ लोगों में अव्वल हैं जो प्रमोदजी को जानने-समझने और समझाने के लिए मूर्खतापूर्ण आरोपों, कुढ़ों, फब्तियों की संभावना का आंकलन किये ब़गैर कठिन धर्मनिर्वहन में लगे हैं । निहायत संवेदनशील जो ठहरे ।

कठिन इसलिए कि कुछ लोगों के मुताबिक उन्हें सिर्फ़ पुलिस महानिदेशक होना चाहिए । आत्मावान् मनुष्य नहीं । विचारवान् नहीं । उन्हें संस्कृति-वंस्कृति से कोई लेना-देना नहीं चाहिए। मैं उनसे पूछता हूँ – हुजूर, मुझे क्यों धंसा दिया आपने समारोह के संयोजन में? जब आप जैसे बड़े आदमी को राज्य के पालनहार और जिम्मेदार क़िस्म के ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कह देते हैं कि विश्वरंजन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष नहीं बन सकते तो वे हमारे जैसे कीडे-मकोड़े (सामान्य आदमी)को किस तरह निपटाने की सोच रहे होंगे ? जैसे प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान उनकी अपनी सरकारी बपौती है जहाँ वे जिसे चाहे उसे बैठायें । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान कोई राजनीतिक पद तो है नहीं कि उस पर शीर्षस्थ राजनेता के पिछलग्गू को ही बिठाया जाय । उन्हें कौन समझाये कि यह देश और राज्य के साहित्यकारों की साहित्यिक संस्था है जिसमें विश्वरंजन अपने सभी सदस्यों के आग्रह पर वह गैरराजनीतिक, गैरलाभकारी पद का गुरुत्तर भार स्वीकार किये हैं । शायद इसलिए कि वे प्रमोदजी को गुरुतुल्य मानते रहे हैं । शायद इसलिए कि उनमें फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और स्वतंत्रताकामी सपूत का ख़ून भी दौड़ता है । शायद इसलिए भी कि वे राज्य को विचारवान, गुणवान और सुसंस्कृत बनाने का सपना भी देखते हैं । शायद इसलिए कि वे और अफसरों की तरह सिर्फ अपनी हेकड़ी में मरना नहीं चाहते । यह बिलकुल दीगर बात है कि ऐसे ‘कुछ लोग’ अक्सर किसी कुंठा का शिकार होकर उलजूलूल बकते रहते हैं और राजनीति में यह सब चलता भी रहता है ।

वैसे ऐसे ‘कुछ लोगों’ को अपने ही राज्य के नियम-क़ायदों का ज्ञान नहीं होता कि उनका कोई भी अधिकारी कला, साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास से संबंधित वह सभी कार्य कर सकता है जो राज्य की संप्रभुता को चुनौती न देता हो । ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कहते पाये जा सकते हैं कि आप अपनी ज़मीर को छोड़कर आयोजन के बहाने रुपया बटोर रहे हैं और कुछ हिस्सा मुझे भी दे रहे हैं । भई क्या बात है, जैसे जीवन-भर पुलिस विभाग में रहते हुए विश्वरंजन को कुछ नहीं मिला....तो चले साहित्य के बहाने पैसा कमाने । जैसे विश्वरंजन किसी भूखमर्रे किसिम के मेट्रिक पास नेता है जो बड़ा से बड़ा राजनीतिक पद पाजाने के बाद भी चंदा दलाली से ज्यादा नहीं सोच सकता । तौबा-तौबा। कुछ तो लिहाज़ करो फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और संग्राम सेनानी के संस्कारवान नाती पर.....

विश्वरंजन कुछ नहीं कहते, सिर्फ मुस्काते देते हैं- जैसे उनकी मुस्कान में ये सारे भाव-उत्तर छुपे हुए हों कि मानस, ऐसे ‘कुछ लोग’ जो कम पढ़ लिखे होते हैं, जीवन-भर यही काम करते रहते हैं । और ऐसे लोग सिर्फ राजनीति में नहीं साहित्य में भी होते हैं । तुम और हम और बहुत सारे लोग भी ऐसे ‘कुछ लोगों’ जैसे नहीं होते । शायद इसलिए प्रमोदजी जैसे विभूतियों पर कुछ होने की पहल हो पाती है ।

प्रमोदजी ऐसे ‘कुछ लोग’ की चिंता नहीं किया करते थे । वे जानते थे कि समाज में ‘कुछ लोग’ ऐसे होते ही हैं जो वे कुछ करें तो ठीक । दूसरा कुछ करे तो गलत । ऐसे लोग जीवन भर विघ्नसंतोषी बने रहते हैं । दरअसल ऐसे लोग ऐसे मौकों पर अपनी विशेषज्ञता प्रतिपादित करने के लिए जुमले उछालते हैं । ताकि आप उन्हें मनायें तुलसीदास की पंक्ति को याद करते हुए – प्रथमहू बंदऊँ खल के चरना । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो बड़े बड़े लेख लिख सकते हैं परन्तु दिये गये विषय पर लिखने में उन्हें नानी याद आ जाती है । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जिन्हें लगता है कि वे प्रमोदजी जैसे छोटे साहित्यकार पर लिखकर अपने बडप्पन को छोटा करने का ख़तरा नहीं उठा सकते । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो आपके हर कामों में मीन-मेख निकालकर ऐसे आयोजनों में आपकी अस्थिपंजर एक कर देते हैं । कुछ नहीं मिला तो प्रूफ की ओर इशारा करके आपके निष्कलुष श्रम पर ऊँगलियाँ उठा देते हैं । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो भीतर से तो ऐसे पवित्र आयोजनों से जुड़े होते हैं किन्तु आपको पता ही नहीं लगता कि वे अपना मूल्य कब और कैसे आपसे वसूल लेते हैं ।

साहित्यवाले भी समाज से आते हैं । जैसा समाज वैसे ही उसके साहित्यकार । किस-किस पर रोयें ? किस किसकी कितनी परवाह करें । परवाह करेंगे तो राज्यहित में ऐसे काम नहीं कर सकते । चलिए... चलते-चलते भैया परदेशीराम वर्मा जी के उस आलेख की भी चर्चा कर लेते हैं जिसका देह संपूर्ण पवित्र है किन्तु उसमें धड़ लगा है वह निहायत अपवित्र है यानी उनके शब्दों में जी हाँ, वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । केवल उनकी पूजा करते हैं । भई बिना जाने कोई किसी की पूजा भला क्योंकर करेंगा ? लेख में मेरा जिक्र करके उन्होंने कुछ पर्दादारी कर दी है । उसका रहस्य खोल देते हैं । हाँ, मुझे उन्होंने कहा था कि वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते पर उन पर केंद्रित इस आयोजन में ज़रूर आयेंगे । तब मैंने यह भी कहा था कि आप आ रहे हैं यही प्रमोद जी को जानना है । मैंने यह भी कहा था कि कुछ लोग आपको और कुछ लोग मुझे भी नहीं जानते जिसके लिए हम जिंदगी भर लगे रहते हैं कि लोग हमें जाने । उस समय संस्थान के अध्यक्ष भी विश्वरंजनजी भी साथ थे । बात तो हुई छत्तीसगढ़ी में पर विश्वरंजन जी सब समझ रहे थे । उन्होंने सहर्ष आयोजन में पधारने की स्वीकृति भी दी थी कि वे ज़रूर प्रमोदजी पर बोलेंगे । इसके पहले भी सुधीर शर्मा ने बताया था कि इस आयोजन को लेकर परदेशीराम वर्मा का कहना है कि उन्हें सिर्फ संवाद में रखा गया है जबकि उन्हें अच्छे आसंदी में रखे जाने की उम्मीद थी । मैंने मित्रों की चर्चा में बिना किसी पाप के अशोक सिंघई जी को कह दिया जो संस्थान के उपाध्यक्ष हैं कि वे उन्हें मनालें । तो उन्होंने उसी तरह परदेशीजी को हड़का दिया जैसे एक मित्र को दूसरा मित्र हड़का देता है और दोनों एक दूसरे को ऐसे तो कई बार हड़का चुके होंगे । इसके कुछ ही दिन बात मुझे परदेशीजी का पत्र मिल गया कि उन दिनों जब प्रमोद जी पर केंद्रित आयोजन हो रहा होगा वे अन्यत्र व्यस्त रहेंगे अतः अपनी शुभकामनायें ही भेज सकते हैं । अब मैं तय ही नहीं कर पा रहा हूँ कि ऐसी शुभकामनाओं का क्या उपयोग किया जाये ? आपमें से किसी को इसका दिव्यज्ञान तो कृपया मुझे अवश्य सूचित करें ।

6 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

मेरी लगातार व्‍यस्‍तता के बीच ही पिकप नहीं कर पाये फोनों के घनघनाहटों के पीछे प्रिटेड आमंत्रण पत्र और कल और आज का आलेख था।

दिव्‍यज्ञान के लिये हम ध्‍यान लगाने की कोशिस करते हैं भईया और दस तारीख को आपकी सेवा में हाजिर हो रहे हैं।

शरद कोकास said...

जयप्रकाश जी ,चलिए आज आपके ब्लॉग तक पहुंच ही गया और आज ही पाल से पूछ रहा था मै भाई प्रमोद जी के वंशज हम भी है लेकिन हमे कुछ पता ही नही है खैर प्रमोद जी से हमे जो मिला है और प्रमोद जी ने मुझे जिस तरह recognise किया है वह मेरी नीजि सम्पत्ति है लेकिन आप ऐसे लोगों के पास जाते ही क्यों हैं जो इस बात का महत्व नही जानते .खैर यह विश्वरंजन जी की उदारता है इस बात मे कोई शक नही .खैर 10 तारीख को मुलाकात हो रही है किसीके ना आने से प्रमोद जी का महत्व कम नही हो जाता .एक और बात, हमने सुना है उसी दिन ब्लॉगर्स मीट भी रखी है आपने. भई मै भी आजकल ब्लॉगर हो गया हूँ ज़्यादा नही पाँच-छह ब्लॉग पर लिख रहा हँ कभी समय मिले तो देखें इस क्षेत्र मे तो आप सीनियर हैं

Anonymous said...

ये परदेशी राम कौन ???

raju said...

nameste,
mai apne baare me batana bilkul fijul samajhta hun, kyonki mai apni pahachan se santust nahi hun vo meri aur meri atmaa ko pradarshit nahi karte aur yahi karan hai ki mai apne astitva ki khoj me laga rahata hun, bahari nahi antarik. bahari astitva to dhokaa hai banaayaa huaa hai ya jabardasti ban gaya hai dusro ke dvaraa.
mene aapka lekh padaa to hriday me uthane vaali ak sanka ka samadhan aapse karna chahata hun, jo bahut hi sadabhavana purvak hai aur koi anyatha nahi hai, aur ye samathan mere astitva tak pahuchane me sahayak hoga. meri sanka ye hai ki, lakdee jalati hai apne guna ke karan, na to usame usaka sahayog hota hai aur na hi viroth, aag lakdee tak pahuchati hai aur vah jal uthati hai.na svatantrata na pertantrata na vichar na chhal keval gun bas. aur usme se nikalane vaala taap pavitra hota hai, aur uska ujala andhere ko door karata hai jisase saamaaj ko fayada hota hai. vese hi lekhak aur vishaya lakdee aur aag hote hai, vishaya lekhak tak pahuchata hai aur lekhak likhane lagata hai, na koi sahayog na koi viroth, keval gun, na svatantra na pertantrata na vichaar na chhal, keval gun. aur usme se nikalane vala lekh me taap bhi hota hai or prakash bhi, aur vo lekh bhi pavitra hota hai aag ki tarah.ek taraf vo apane taap se buraai ko jalata hai aur dusri taraf apne prakash se agyana rupi andhakaar ko hatakar gyan rupi prakash bhi failata hai vo vaataavaran bilkul hi pavitra hota hai.
kya aajkal lekh aise he likhe jate hai? aur yadi likhe jate hai to usake taap se buraiyo ka naas hota hai aur usake prakash se agyantaa rupi andhakar ka naas hokar gyaan rupi prakash failata hai, kya aajkal ka vaataavaran pavitra ho rha hai? yadi nahi ho rahaa hai to lekh kahi khaali man ki upaj to nahi, jisame na taap hai or na hi prakash bilkul apavitra.

Anonymous said...

Vishwaranjan ko wo hi samajh sakta hai jo ek khule wicharon ka ho aur intellectually bahut sound ho. vishwaranjan ko samajh pana har ke bas ki baat nahi. ve bahut ucch koti ke chintak, vicharak aur sudharak hain.

Anonymous said...

vishwaranjan ko samajh pana har ke bas ki baat nahi. vishwaranjan ko samajh ne ke liye aap ko khule vicharon ka hona aur intellectually hona behad aavashayak hai. unke vicharon me bahut ucch koti ki samjh aur durdarshta hoti hai. ve ek behad imandar aur ucch koti ke vicharak hain.
aur rahi baat unko samajh ne ki to agar har koi unko samajh ne lage to phir duniya se nimn koti ke log aur bewokuf mit jayenge jo ki sambhav nahi kyunki prakriti hamesha is duniya me balance bana ke chalti hai jo bigad jayega aur jo ki prakriti hone nahi de sakti.