Thursday, March 26, 2009

।। नक्सलियों के बयानों के पीछे की वास्तविकता ।।


हाल ही में नक्सलियों ने जनता-सरकार की माँग की है । किससे की है ? क्या सरकार से की है? यदि वह माँग सरकार से है तो प्रश्न उठता है कि सरकार तो नक्सल विरोधी है । भविष्य की हर सरकारें चाहे उस सरकार को कोई भी दल संचालित करे, नक्सलविरोधी भी होगी । क्योंकि नक्सलवाद का रास्ता प्रजातंत्र की पतन की ओर ले जाता है । और कैसे कोई भी दल स्वयं प्रजातंत्र को ध्वस्त करने की गतिविधियों का अनुमोदन कर सकती है ! क्योंकि ग़रीबी, शोषण, उत्पीड़न व भेदभाव मिटाने के नाम पर भी ख़ूनी हिंसा के समर्थन का साफ़ मतलब अमानवीय, असंवैधानिक और दूसरी तरह का दमन भी हो सकता है । यही अंतिम विकल्प तो नहीं । हिंसा, भय, आंतक के सहारे यदि सामाजिक क्रांति हो सकती है तो उसकी आवाज जनता से आनी चाहिए । जाहिर है यह आवाज़ जनता की ओर से नहीं, नक्सलियों की ओर से आ रही है जिन्होंने बस्तर में अब तक ऐसा कोई जनप्रिय कार्य नहीं किया जिससे बल पर उसका कोई सदस्य प्रजातांत्रिक तरीके से सरकार के किसी घटक के सदस्य बन पाता । यदि वे वास्तव में जनता की सरकार के स्वप्नाकांक्षी होते तो ऐसी कौन सी शक्ति है जो उन्हें जनता का व्होट पाने से रोक सकती है । इसका साफ मतलब है कि न वे जनता के लिए हैं, न वे जनता हैं, न वे जनता द्वारा संचालित व्यवस्था के पक्षधर हैं । ‘जनता की सरकार’ की आवाज़ आड़ मात्र है ठीक जैसा वे पहले जनता की पक्षधरता की धूर्त चालों के सहारे बस्तर के भोली-भाली जनता के बीच पैठ बनाकर अब अपने असली एंजेंडे पर उतर आये हैं । दरअसल जनता उनके एंजेडे में ही नहीं है । वे स्वयं भी जानते हैं कि कोई भी प्रजातांत्रिक सरकार नक्सलियों की खूनी क्रांति पर विश्वास नहीं करती । कर ही नहीं सकती।


ऐन चुनाव के समय उनका ‘जनता की सरकार’ की माँग करना जनता को दिग्भ्रमित करना है । मतदाता की सोच को प्रभावित करना है । दरअसल नक्सलियों के दो रूप हैं । एक स्वांग के भीतर वे जनता के पक्ष में बात करते हैं दूसरी स्वांग में वे ठीक जनता के ख़िलाफ़ कार्यवाही करते हैं । चुनाव का बहिष्कार जैसा उनका ऐलान ऐसे स्वांगों का नमूना है । वे जानते हैं कि प्रजातंत्र का प्रवेश-द्वार चुनाव है। और चुनाव में यदि वे हिस्सा लेंगे तो उन्हें प्रजातंत्र पर विश्वास जताना पड़ेगा, जैसा कि उनका लक्ष्य ही नहीं है, सो वे चुनाव बहिष्कार की बात करते हैं । और इस चुनाव बहिष्कार के बहाने हिंसक गतिविधियों का सहारा लेकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विरूद्ध जनता के मन में अविश्वास भरते हैं । चुनाव के अधिकार से वंचित करते हैं । यानी कि वे सिर्फ यही दबाब बनाने की कोशिश करते हैं कि जनता के लिए मात्र नक्सलवाद ही एकमात्र उपाय है । क्या सामाजिक बदलाव के विरूद्ध यह नादिरशाही और मध्ययुगीन कार्रवाई या सिद्धांत नहीं है ?


नक्सली प्रवक्ता के तर्कों को परखें तो देश की पार्टियों की घोषणा पत्र झूठे हैं । ठीक है, यदि देश के मौजूदा राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में धोखे-ही-धोखें तो उनके घोषणा पत्र में क्या है ? उनका अतीत का प्रदर्शन क्या है ? उनके पार ऐसी कौन-सी नैतिक दृष्टि है जिसका कायल होकर जनता उन्हें चुने । भय और हिंसा के हिमायती नक्सलियों को अपने जनहितैषी कार्यों की सूची जारी करनी चाहिए कि उन्होंने अमूक स्कूल की मरम्मत की । अमूक तालाब की सफ़ाई की । अमूक को अस्पताल पहुँचाया । सच तो यह है कि वे विकास के मायने को ही झूठलाते हैं । ऐसे दलों द्वारा किये गये विकास को ही ध्वंस करते हैं । वे जिस शोषण की बात करते हैं उसी शोषण की गंगा को वे भी आगे बढ़ाते हैं । एक अनुमान के अनुसार केवल बस्तर के नक्सली प्रतिवर्ष 200 करोड़ की उगाही अवैध तरीकों से भय और आंतक के बल पर करते हैं । वे यदि कहते हैं कि देश को पूँजीवादी और साम्राज्यवादी चला रहे हैं तो फिर वे क्या कर रहे हैं ? लूट तो आख़िर लूट ही है, चाहे कोई भी क्यों न लूटे । क्या वे भूखे को अन्नदान, वस्त्रहीन को वस्त्रदान और आवासहीन को आवासदान दे रहे हैं ? वे स्वयं जब समूचे बस्तर में अपना अनैतिक साम्राज्यवाद विकसित कर रहे हैं तो उनका किसी अन्य राजनैतिक दल को नकारना पूर्णतः दोगले चरित्र का ही परिचायक है । नक्सलियों की मान्यता कितना हास्यास्पद है कि यदि वोट देना अधिकार है तो नहीं दिये जाने का भी अधिकार मिलना चाहिए । यानी कि जनता किसी को न चुने । तो फिर कौन उसका प्रतिनिधित्व करेगा ? कौन उसकी आवाज़ बनेगा ? यानी नक्सलियों के अनुसार जनता नेतृत्वविहीन रहे । ठीक वन्य जीव की तरह विचरणशील । यानी पशुता की ओर समाज चले जाये । जनता बिना सांवैधानिक अंगों के अपना राज कैसे कर सकती है । ऐसा तो तब ही संभव था जब वह जंगल युग में रहता था । क्या ऐसी स्थिति को अराजक नहीं कहेंगे । यदि ऐसी अराजक स्थिति का निर्माण ही विकास का आधार है, यदि यही शोषणहीनता, उत्पीड़नहीनता व भेदभाव के विसर्जन का मूलमंत्र है तो उनके सिद्धांत और दर्शन दोनों अबूझे है, झूठे है । भविष्य की शायद ही कोई पीढ़ी जनता के रूप में इस पर विश्वास करे । सभ्यता के इस मुकाम पर अराजकता किसी भी कीमत पर अब जीवन का मर्म नहीं हो सकता । वह जीवन का रहस्य कभी था ही नहीं । यदि नक्सलवाद यही कहता है तो इसका साफ मतलब है कि नक्सलपंथी अराजक हैं । क्या जनता को जंगली-सभ्यता की ओऱ लेजाना ही उनका ध्येय है ?


नक्सली तर्क गढ़ते हैं, थोथी सहानुभूति पाने के लिए, कि वोट नहीं देने पर अर्धसैनिक बल और पुलिस मतदाता का दमन करते हैं । वे यह क्यों भूल जाते हैं कि वे भी दमन के सहारे ही मतदाता को मतदान करने से रोकते हैं । बस्तर का तो यही इतिहास रहा है । चुनावों में सारे देश की यही तस्वीर रही है । उनका यह कहना भी फर्जी है कि जनता को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ देने का वादा करने वाली सरकारें केवल वोट के लिए राजनीति करती हैं, जबकि वे इसके पीछे अपनी जेबें भरते हैं । आख़िर एक भ्रष्ट राजनीतिक की तरह वे भी यही भ्रष्ट तरीके अपना रहे हैं लगातार । क्या वे अपने लक्ष्यों के लिए पूर्णतः नैतिक बने हुए हैं । जो हिंसक होगा, आतंककारी होगा उसका लक्ष्य नैतिक हो ही नही सकता । नक्सलियों का हालिया बयान इतना द्वंद्व भरा है कि कोई ही उस पर शायद विश्वास करे । क्योंकि वे जनता की सरकार की माँग भी करते हैं । यानी उनकी मांग का एक हिस्से में सरकार नामक अवधारणा भी है औऱ वे उस सरकार के चयन के लिए बाधा भी खड़ा करते हैं । कितनी दोगली दृष्टि और सोच है नक्सलवादी वैकासिक सिद्धांतों का ।


नक्सलवाद का सारा ढाँचा असत्य, हिंसा, आंतक, धन, भ्रष्टता पर टिका हुआ है जहाँ उनके कथोपकथनों की कोई विश्वसनीयता नहीं है । एक और उदाहरण हाल का ही देखें - कुछ दिन पहले बस्तर के नक्सलियों ने कहा कि वे सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं । किसने, किसने कहा ? किसी को भी समझ में नहीं आया । वस्तुत यह बात सिर्फ़ मीडिया के श्रीमुख से ही आयी थी । वस्तुतः न नक्सलियों के प्रवक्ता ने मुख्यमंत्री से कहा, न राज्यपाल से न ही गृहमंत्री या पुलिस महानिदेशक या गृह सचिव से । उनकी ओर से किसी भी उचित स्तर तक न कोई पत्र आया था न ही टेलिफ़ोन-मोबाइल । यह एक सच है । दूसरा सच यह है कि ठीक उसी दरमियान नक्सली लगातार आदिवासियों को अपनी गोलियों का शिकार बनाकर मौत के घाट उतार रहे थे । प्रश्न उठता है कि वे मीडिया का सहारा लेकर ऐसा क्यों कर रहे थे ? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या जिसने बयान दिया था वह अधिकृत था । क्या वह सारे नक्सलियों का नेतृत्वकर्ता था ? माओवादी रणनीति के तहत वे ऐसा तब-तब करते हैं जब किसी स्तर पर कमजोर पड़ रहे होते हैं । यह एक तरह का सरकार, पुलिस बल का ध्यान बाँटने की कला है । ताकि रणनीतिकार को सुरक्षित बने रहकर हिंसक क्रांति जारी रखने का मौक़ा मिल जाये । यह दूसरे मायने में जनता की झूठी सहानुभूति प्राप्त करने का भी उद्योग है कि जनता राजनेताओं पर शंका-कुशंसा करने कि – देखिये राजनेता भी उसकी सुनवायी नहीं कर रहे । उनका सारा सिद्धांत झूठ और फरेब पर टिका है क्योंकि वे एक ओर प्रजातंत्र का विरोध करते हैं दूसरी ओर उसकी सारी इकाईयों की ताकतों का सहारा भी लेते हैं । सलवा जुडूम के विरोध में कोर्ट का सहारा लेना भी उनकी इसी धूर्तता का नमूना है ।


क्या अब वह समय नहीं आया है कि ऐसे भ्रमों, भ्र्रांतियों, फर्जी आचरणों का प्रकाशन ही न हो और इसके लिए मीडिया को भी खासतौर पर सोचना होगा कि उनकी किन मुद्दों तक जनता की पहुँच हो, और किन तक नहीं । विज्ञप्तियो के सहारे जनता का कल्याण करने की ऐसी बुद्धिवादी कोशिशों को कब तक आख़िर जायज ठहराया जायेगा । ऐसी गतिविधियों को भी प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए । जो संगठन प्रजातंत्र में प्रतिबंधित हो उसकी आवाज को प्रचारित करना भी प्रतिबंधित होना चाहिए । इसे अभिव्यक्ति के नाम पर मान्यता देना प्रजातंत्र को ध्वस्त करने की संभावनाओं को भी तवज्जो देना होगा ।

3 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

पहली तो बात यह कि भारत में प्रजातंत्र नहीं, लोकतंत्र है. दोनों में ज़रा फ़र्क है. यह हमारे सामंती संस्कारों का असर है जो आज तक हम प्रजातंत्र और लोकतंत्र को समानार्थी मानते आ रहे हैं. हमको तो लगता है कि ये दलों वाली सरकारें भी लोकतंत्र के पतन की ओर ही ले जा रही हैं.

योगेन्द्र मौदगिल said...

बेहतरीन प्रस्तुति के लिये बधाई स्वीकारें

कार्टूनिस्ट अजय सक्सेना said...

मानस भैय्या / नमस्कार,
कैसे है आप?? मैंने हाल में अपना एक ब्लॉग बनाया है उसे और बेहतर बनाने के लिए और मुझे क्या करना चाहिए बताइयेगा ... ब्लॉग-गतिविधियों से जुडे रहने के लिए मेरे ब्लॉग को अपने फेहरिस्त में ले तो अत्यंत आभारी रहूँगा ..आप जैसे महान ब्लॉगर मुझसे जुड़े रहे इस निवेदन के साथ ... शुभकामनाओं सहित.
अजय सक्सेना, हरिभूमि
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