Saturday, May 19, 2007

जगदीप डांगी के नाम एक पाती





सबसे पहले मेरी ईश्वर से अगर वो कहीं है तो यही शुभकामना है कि जगदीप में निहित दीप जलता रहे । और इस जहान को रोशन करता रहे ।

मित्र
दुर्गेश गुप्त से कल ही बातचीत हो रही थी । हिदीं के बढ़ते हुए कदमों को लेकर अपना-अपना अनुभव हम दोनों बखाने जा रहे थे । इस बखान में चिंताओं की लकीरें भी हम दोनों परस्पर देख रहे थे । जगदीप ड़ांगी का नाम उनकी जुबान पर आया तो मेरी जिज्ञासा एकबारगी बढ़ गयी । मैं उनके योगदान पर कुछ कहूँ गर्वोन्नत होकर, इससे पहले ही उन्होंने बड़े ही निराश स्वर में कहा – मानस, इन दिनों वे बड़ी हताशा और उपेक्षा-भाव से गुजर रहे हैं और हमें भी उनका वाकया सुनकर ऐसा लगना चाहिए। और सचमुच यह भाव बरबस अंतसः में तैरने लगता है - यह दुनिया जाने क्यों प्रतिभा का वास्तविक हक नहीं दिलाना चाहती । जाने क्यों रचयिता केवल धूलें फांकता है । गर्दिश में जन्मता है, गर्दिश के मध्य पलता है और गर्दिशों की पोटरी लादे चला जाता है ।

मैंने बहुत सुना था कि कंप्यूटर प्रौद्योगिकी को विकसित करने वालों को भारत सरकार और राज्य सरकारें जी खोलकर प्रोत्साहित कर रही हैं और इसी के बल पर वे दुनिया भर में अपनी साख बढ़ाना चाहती हैं । शायद मैंने बहुत ही गलत सुना था । आज मुझे ऐसा ही लगने लगा था । मन बड़ा ही खिन्न हो लगा । लगा कि आखिर क्योंकर जगदीप ने ऐसा अनुसंधान किया और अपने ईजाद से हिंदी-दुनिया के साथ-साथ प्रौद्योगिकी वालों को आश्चर्यचकित करने पर विवश कर दिया । क्या जरूरत थी भला उसे । आम हिंदुस्तानी युवाओं की तरह करता रहता मटरगश्ती, मोटर साइकिल में सवार, आंखों में रंगीन गॉगल चढ़ाये, एक हाथ में मोबाइल थामें, दूसरे में सिगरेट पकडे, इस गली से उस गली में । कभी सीटी बजाता । कभी किसी चिकनी गोरी को देखकर गुनगुनाने लगता – सुन, सुना, आती क्या खंड़ाला । चलती है क्या नौ से ग्यारह ।

ड़ांगी भैया, आप इस दुनिया को नहीं समझ सके, बस्स, आपसे यही और यहीं चुक हो गई । यह दुनिया आम को ही पंसद करती है । जहाँ कोई खास बना तो उसे भुलाने की कोशिश शुरू हो होती है । वह देखते ही देखते ईर्ष्या का पात्र बन जाता है। दुनिया को, पास-पड़ौस को आम आदमी चाहिए । खासकर राजनीतिक समाज में प्रभामंडल वाले लोग आम आदमी को प्यार करते हैं(दिखावा में सही), वह चाहते हैं कि वह मात्र आम आदमी बना रहे । आम आदमी की तरह जिये और आम आदमी की तरह गुजर जाये और वे खास बने रहें पीढ़ी-दर-पीढ़ी । आम आदमी ऐसे राज्यों में सिर्फ एक मतदाता होता है जिसे पांच साल में एक बार जहरीली शराब, एकाध साड़ी, कुछ रूपये देकर खरीद लिया जाये । यह आम आदमी यदि प्रतिभा के बल पर खास हो जायेगा तो उस समाज को परिवर्तित करना नहीं चाहेगा । अवश्य चाहेगा । और यही उनके भय का कारण है । हाँ, यदि किसी दल के झंडाबरदार रहते और संयोग से मक्खी भी मार लेते तो आपके राज्य की सरकार आपको शेरमार की उपाधि से विभूषित करती । आपको वज़ीफा मिलता । आपके बच्चों की परवरिश की चिंता की जाती । दवाई-दारू मुफ़्त में मिलता। अभी जिस हालात में आप हैं, वह दिन देखना ही नहीं पड़ता आपको । आपने अच्छा नहीं किया । करते रहते खेतों में निंदाई-गुड़ाई । जोतते रहते खेत । उगाते रहते घास । गाते-रहते मेड़ पर बैठे-बैठे कोई लोकगीत । देहाती क्यों नहीं बने रहे आप ? आपको क्यों ऐसा लगा कि ये सरकारें देहाती दुनिया के लोगों के किये-धरे पर विश्वास करते हैं । आपको जानना चाहिए कि उन्हें आधुनिक मूल्यों वाले लोग दुश्मन नज़र आते हैं । प्रगतिशील लोग कंम्युनिस्ट नज़र आते हैं । नवाचारी लोगों से उन्हें भय सताता है । वे उसकी लोकप्रियता से घबराते हैं । कहीं उनका साम्राज्य न ढह जाये । कहीं उनकी पदवी न झिन जाये । इस समाज की भाषा कैसे क्यों नहीं समझ सके आप.....

डांगी भैया, आप तो दुनिया की किसी भी परंपरा के बारे में नहीं जानते ना, काश, आप घुटने टेक कर मिमियाना जानते । घर-घर थैली पकड़कर जाते, जोर-जोर से चिल्लाते – दे दे बाबा, हिंदी के नाम पर,,,,,,,, हिंदी माता आपके बाल-बच्चों को खुश रखे । और ज़रा सी चालाकी आती तो किसी धन्ने सेठ की गद्दी के सामने दंडवत मुद्रा में लेट जाते और अनुमति पर अपने चीज़ों की नुमाइश करते । पर वाह, रे सरस्वती आपने इतनी भी बुद्दि नहीं दी सृजनकारों को...........।

मैं सुनकर भौचक रह गया हूँ कि आप इन दिनों गंभीर बीमारी के शिकार होकर अस्पताल की शरण जाने के लिए विवश हैं । शायद आपको मृत्यु का डर भी सता रहा हो । आपके सामने अंधेरा छाने लगा हो । आपके आँखों में आपके बच्चे अनाथ नजर आने लगे हों । बूढे माँ-बाप का उदास चेहरा आपके आँखों में बार-बार आँसू उडेल रहा हो । छूटता हुआ संसार आपको याद आ रहा हो । आपके मित्र आपको बुला रहे हों । बुला रहे हों वे झरने जहाँ आप घंटों बैठकर उसकी धारा को अपलक निहारा करते थे । वे नदियाँ जहाँ आप कभी सीपी ढूँढते फिरते थे और कभी कागज की नाव बनाकर बहाते रहते थे । आपको उस चिडिया का गीत भी सुनाई देता हो जो बड़े भोर से माँ को जगाने आ जाती थी कि जागो अम्मा, अपने लाड़ले जगदीप को जगाओ, उसे अभी बहुत काम करना है । वह सोता रहेगा तो दुनिया को नई चीज़ कौन देगा !

भैया जगदीप, आप मन ही मन अपनी शिक्षक को कोस रहे हों कि उसने आखिर क्यों ऐसी शिक्षा दी आपको । क्यों समाज के लिए कुछ करने की ईबारत आपने पढ़ी । अच्छा होता कि आप सिर्फ हस्ताक्षर करना ही सीख जाते । मूरख बने रहते ।

मुझे यह लिखते हुए बहुत ही क्षोभ हो रहा है कि मैं क्यों आपके लिए कुछ नहीं कर सकता । क्या करूँ, मैं भी तो तुम्हारी तरह फटेहाल हूँ । तुम तो जानते ही हो कि लेखक के पास कुछ भी नहीं होता । कुछ शब्द, कुछ पन्ने, कुछ विचार और एक कलम के अलावा । तुम बुद्धि से गढ़ते रहे और मैं मन से । पर दोनों का उद्देश्य एक ही है – भाषा की पूजा । भाषा की अर्चना । भाषा की अभ्यर्थना । दोंनो की दुनिया एक ही है । दुनिया के लोग एक जैसे हैं । तुम्हारा और मेरा समाज एक ही है, बड़ी बेमुरौव्वत दुनिया है यह !यहाँ किसे मतलब है भाषा से, भाषासेवियों से ?भाषा भी किस काम की चीज़ होती है ।

तुमने अच्छा नहीं किया अपनी नुमाइश करके, राजदरबार में । तुम कैसे भूल गये यह- वहाँ वही होता है जिसे उनके चाटूकार सलाहकार कहें । कौन-सी फाइल चलेगी, कौन-सी रेंगेगी और कौन-सी दौडेगी इन सबकी गति राजा थोड़े ना तय करता है । यह सब तो उनके कारिंदे करते हैं, जिनके दिल नहीं हुआ करता ।
हाँ, उनका उदर जरूर इतना बड़ा होता है कि जहाँ समूची दुनिया समा जाये । वहाँ कोट-टाई लगाये कुछ भारतीय अंगेज़ भी होते हैं । क्या इन ब्युरोक्रेस्ट के बारे में तुम्हें किसी ने नहीं बताया था, तुम भूलकर चले गये । क्यों राह देख रहे हो तुम उनके उत्तर का ? वे क्या तुम्हारे रिश्तेदार हैं । तुम तो उनकी भाषा पर ही आक्रमण करने वाली चीज़ बना कर बेचना चाहते हो । भाई कैसे वे इसे बिकने देंगे । वे क्यों चाहेंगे कि उनकी भाषा का साम्राज्य ही ढह जाये तुम्हारी खोज से । मुझे तुम्हारे पत्र को निहारने का मौका भी मिला, जो तुमने भाई दुर्गेश को लिखा है –

“नमस्कार, ई-मेल के लिये और बधाई भेजने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद । ३ सेप्टेम्बर २००६ को मुख्यमन्त्री जी ने मुझे मुख्यमन्त्री निवास पर बुलाया था. श्री चौहान साहब मुझसे मिले और मुझे अपने कार्य के लिये बधाई दी। उस समय वहाँ पर मुख्यमन्त्री के सचिव श्री इकबाल सिंह वैश, श्री अनुराग जैन, श्री नीरज वशिष्ट आदि सहित और भी अधिकारी थे, मुख्यमन्त्री जी ने इन सभी को मेरा कार्य देख्नने को कहा और कहा की जो भी कुछ हो सके जगदीप के लिये करो। तभी मैंने सभी के समक्ष अपने सोफ़्ट्वेयर का प्रदर्शन किया सभी ने मेरे कार्य की तारीफ़ की और तभी श्री अनुराग जैन ने मुझे मुख्यमन्त्री फ़ेलोशिप देने की विधिवत घोषणा की और कागजी कार्यवाही भी की. फ़िर मुझे विज्ञान भवन लाया गया. जहाँ पर मैपकोस्ट (MAPCOST)के निदेशक डा. महेश शर्माजी से मुझे मिलाया गया। श्री शर्माजी ने मेरे सोफ़्ट्वेयर के परीक्षण के लिये एक चार सदसिय टीम गठित की इस टीम मैं चार कम्पूटर वैज्ञानिक थे. सभी ने मेरे सोफ़्टवेयर का परीक्षण किया और इस की रिपोर्ट ४ दिन के अन्दर मुख्यमन्त्री जी के सचिव श्री इकबाल सिंह वैश के नाम जारी की. यह रिपोर्ट मेरे और अपने प्रदेश के हित मैं थी जिसमे इन सोफ़्ट्वेयर्स की उपयोगिता को प्रदेश के स्कूलों, किसानों, और विभिन्न विभागों के उपयोग मैं आने से संबंधित थी. उस रिपोर्ट को मैंने भी देखा है. फिर हमारे जिला में सांसद का चुनाव आ गया और मुझसे कहा अभी आपके यहां आचार संहिता लगी है. इस लिये आपका काम बाद में होगा. काफी इंतजार के बाद फिर हमने जानना चाहा की हमारी फेलोशिप का क्या हुआ तो मुझे बताया गया की फेलोशिप देने की नीति पूर्व मुख्यमन्त्री श्री दिगविजय सिंह जी बन्द कर गये और इस गलत कथन से हम ह्तप्रभ रह गये। और आगे आजतक कुछ नहीं मिला।

तकदीर न हमारे साथ बहुत ही बेहूदा मजाक किया मेरा बचपन तो अस्पताल में ही गुजर गया और आज मैं बहुत ही खराब स्थिति में हूँ मेरी तवियत ठीक नहीं है मेरा इलाज भोपाल मेमोरियल में चल रहा है मेरी दोनो किडनी खराब बताई हैं मुझे क्रोनिक रीनल फ़ैलर बताया है अब पता नहीं मैं रहूँगा या नहीं । आप लोगों ने मुझे बहुत लाड प्यार मान सम्मान दिया इसके लिये सरकारी तंत्र से ज्यादा आपका आभारी हूँ । धन्यवाद



जगदीप


मैं उस पत्र को बार-बार बांच रहा हूँ जिसके हर शब्द नियति, नियत और नीतियों का पोल खोलती हैं । इसमें दुर्गेश जी की चिंता साफ-साफ झलकती है । जाने क्यों, पर मुझे लगता है इसमें मेरी चिंताएं भी समादृत हैं ।

प्रिय जगदीप जी,
बधाई । शीघ्र ही आपके समाचार को अपने जाल-स्थल पर जारी करूंगा । आपका म.प्र.शासन की स्कालर शिप का क्या रहा ?



-दुर्गेश गुप्त "राज"



Dear Sir,
नमस्कार, मेरे द्वारा निर्मित हिन्दी सोफ़्टवेयर अनुवादक और शब्दकोश के विन्डोज (९५/९८/एक्स-पी) आधारित परीक्षण संस्करण को डिजिट पत्रिका ने अपने अप्रैल-२००७ संस्करण की सी.डी. के साथ जारी कर दिये हैं। इस सूचना को अपने जाल-स्थल पर जारी करने की कृपा करें। धन्यवाद।



जगदीप दाँगी





अब कहने को मध्यप्रदेश या भारत सरकार भी कह सकती है कि उसने ना नहीं कहा है डांगी को । वह परीक्षण करवा रही है । भई वाह । क्या कहना इस प्रजातंत्र का । क्या कहना हमारे राजनीतिज्ञों का । बलिहारी जाना चाहते हैं हम हिदीं सेवी लोग उन नौकरशाहों पर जिनकी फाइलें चलती रहती है । भले ही आदमी उधर देह त्याग दे । उसे सम्मानित करने का औचित्य ही समाप्त हो जाये । मैं बीबीसी में छपे उस समाचार की ओर भी जनसंपर्क विभाग का ध्यान दिलाना चाहता हूँ आज से लगभग 2 साल पहले इशारा किया गया था कि डांगी ने बकायदा सरकारों से संपर्क किया है किन्तु कोई शुभ संकेत उधर से नहीं है । अब इसे राजकाज के लोग ही न पढ़े तो भला क्या किया जा सकता है ।
हे नेताओ ज़रा पढा करो ऐसे समाचारों को । हे अलालों, कुर्सीतोडू मोटें तोंद वाले बांचा करो कि क्या जनता चाह रही है । क्या छवि बन रही है आपकी इस देश में । बल्कि समूचे विश्व में । क्या डांगी के बहाने आप अपने को सुधार पायेंगे । अपनी गलती को सुधार पायेंगे । अभी भी देर नही हुआ है । या फिर वही जुमला उछालते रहेंगे कि लाखों आते रहते हैं ऐसे में तो हो गया राजकाज........। मैं हिदीं के नाम पर लाखों-करोड़ो डकार जाने वाले उन मठाधीशों को भी याद कराना चाहता हूँ कि आपको क्या हो गया है अब तक जो जगदीप डांगी जैसी प्रतिभा के पक्ष में दो लब्ज भी कहीं रख सकते ? कैसे भी रखो, दारू-मुर्गी उडाने से फुर्सत जो नहीं मिलती ।
हे शिविरबाज भाषासेवियों आपको क्या हुआ ? आप तो अपने भाषणों में खूब चीखते-चिल्लाते रहे हो । कि ये कर देंगे । वो कर देंगे ........
जगदीप शायद, देखना ये दुनिया वाले तुम्हारी बहुत बड़ाई करेंगे । 13-15 जुलाई को अमेरिका में 8 वे विश्व हिंदी सम्मेलन में तुम्हारी तारीफ़ में बड़े-बड़े कशीदे गढ़े जायेगें । पर तुम्हें इस वक्त याद करने वाला कोई नहीं होगा । और तो और तुम्हारे राज्य की सरकार भी कुछ हिंदी सेवियों (?) को अमेरिका भेजने पर लाखों लुटायेगी पर तुम्हारे सॉफ्टवेयर को रिकमंड नहीं करेगी । तुम इस पर भी आँसू कतई मत बहाना । आँसूओं को पी जाओ मेरे भाई । यही हमारी नियति है - इस महादेश में । यह तुम्हारे साथ ही नहीं हो रहा है । यह तो हिंदी के हर सेवक के साथ होता आ रहा है ।

जगदीप जी, मैं आपसे कभी नहीं मिला । नहीं देखा कभी सामने । फिर भी लगता है कि आप हमारे भीतर मौजूद हैं,मैं आपकी पीड़ा को पढ़ पा रहा हूँ । मेरी बैचेनी लगातार बढ़ती जा रही है । मन बड़ा व्याकुल है । कभी-कभी करता है नोंच डालूं नियति को । कभी मन करता है कि उन नीतियों के पन्ने ही जला डालूँ जो हमारे कल्याण के संबंध में होती ही नहीं है । और उस नीयत को दफन कर दूँ जो प्रजातांत्रिक देश में हमारे कर्णधारों को ले डु
बाने में कारण बना हुआ है जिससे हम प्रजाओं ने कभी भी अपने नाम खुशियाली का लिफाफा ही नहीं देख सके ।

मैं जानता हूँ कि हिंदी वाले भी ठीक वैसे हैं जैसे उनकी सरकारें, जैसे उनका समाज भी । पर उनमें अभी संवेदना शेष है । कोई न कोई हिंदी वाला हममें से आगे आयेगा और आपकी-हमारी आवाज़ सही लोगों तक
तक पहुँचायेगा । कोई ब्लॉगर भी हो सकता है और कोई पत्रकार भी । देखते हैं.... क्या करते हैं ये दुनिया वाले ......
यह ईमानदार प्रतिभा को ख़ारिज करने का दौर है । खासकर, वैसी प्रतिभा जिनपर किसी ख़ुदा की इनायत नहीं रही । जिन्होंने अपने बलबुते पर अपनी जगह बनायी । अपनी प्रतिभा को निखारा । फिर वो चाहे साहित्य कला के क्षेत्र में हो या फिर नई तकनॉलाजी के क्षेत्र में हो । हमारे समाज का तथाकथित प्रभूवर्ग उस व़क्त तिलमिला जाता है जब वो देखता है कि आम सा दिखने वाला व्यक्ति यकायक खास कैसे हो गया । गोया प्रतिभा का ठेका प्रभूवर्ग ने ही ले रखा है । इन विसंगतियों के बावजूद समाज में प्रतिभा को समादृत करने वाले बहुत से लोग हैं जो हम जैसे चोट खाये लोगों पर मरहम की तरह लग जाते हैं । यह लड़ाई लम्बी है । शायद अंतहीन भी हो । लेकिन हमें मौर्चे पर डटे रहना है । हथियार के नाम पर हमारे पास हौसला है । सहनशक्ति है । मनुष्यता है । अहिंसा है । शब्द हैं जो अपनी धार बनाते रहते हैं । अरूण कमल की कविता है –

अपना क्या है इस दुनिया में
जो कुछ मिला उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार



तो हम लोग विचारों की धार लेकर के निर्मम प्रवृतियों को काटने की कोशिश कर रहे हैं । पता नहीं सफलता कब मिलेगी । फिलहाल युद्ध तो जारी है । मैं अपनी बात प्रख्यात कवि और व्यंगकार श्री गिरीश पंकज की ग़ज़लों के साथ शुरू करना चाहता हूँ क्योंकि यह हमारे वैचारिक संघर्ष का प्रस्थान बिन्दू है –

हो मुसीबत लाख पर यह ध्यान रखना तुम
मन को भीतर से बहुत बलवान रखना तुम

ज़िंदगी में कब कहाँ ये थम जाये
अधर पर बस हर घड़ी मुस्कान रखना तुम ।

मैं तो उन्हीं के शब्दों में यही कहना चाहता हूँ कि -

आपकी शुभकामनायें साथ है
क्या हुआ गर कुछ बलायें साथ हैं ।

हारने का अर्थ यह भी जानिये
जीत की संभावनाएं साथ हैं ।

इस अंधेरे को फ़तह कर लेंगे हम
रोशनी की कुछ कथाएं साथ हैं ।

तो यह जो विसंगतियों का, निर्ममता का, अमानवीय अंधेरा दीख रहा है उसके विरूद्ध हम विचारों की, सद्भावों की मशाल लेकर चल रहे हैं । देखना यह है कि मंज़िल हमें मिलती है या नहीं ....... । इस बेहद कठिन समय में हम एक दूसरे के दर्द को बाँट रहे हैं । मतलब यह है कि पीड़ा के पर्वत को हँसते हुए काट रहे हैं । शायद यही जीवन हैं । और अब तो लगता है हम सृजनशील लोगों के हिस्से में यह दर्द, यह पीड़ा विरासत में मिली है । इसे ढ़ोना है । लेकिन बिना किसी दुर्भावना के । क्योंकि फिर एक शायर की पंक्तियाँ –

उनका जो काम है वो अहलेसियासत जाने
मेरा पैगाम मोहब्ब्त है जहाँ तक पहुँचे ।


(जगदीप डांगी के बारे में और भी बहुत कुछ जानने के लिए लॉगआन करें wwww.srijangatha.com )


34 comments:

ललित कुमार said...

जगदीप दांगी जैसे साहसी व्यक्ति को मेरा सलाम। जगदीप जी आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं -आपने अपनी सारी कठिनाईयों पर विजय पाते हुए एक मुकाम हाँसिल किया है। ऐसे उपलब्धियाँ तो बहुत से ऐसे लोग भी नहीं पा पाते जिनके पास समस्त साधन होते हैं। आपने किस तरह अपनी शारिरिक और सामाजिक कठिनाईयों पर विजय पाई होगी और यह कितना दुष्कर कार्य रहा होगा -यकीन मानिये मैं भली भाँति समझ सकता हूँ। आप जैसे लोग जो कभी हार नहीं मानते -ये साहस और प्रेरणा के प्रतीक होते हैं।

यदि अंतरजाल पर उपस्थित हिन्दी समुदाय किसी तरह जगदीश जी की मदद कर सके तो अवश्य करनी चाहिये। मुझे पूरी आशा है कि इस कर्मठ व्यक्ति की सरकार द्वारा की जा रही अनदेखी का अंतरजाल पर उपस्थित हिन्दी भाषा प्रेमी अवश्य कुछ हद तक निवारण करेंगे।

ललित कुमार

Triambak said...

Jagdeep jee ko Vande mataram. Aap jaise logo ke karan hi shayad ye dharti thik thik apni jagah par ghoom rahi hai..
Kabhi kabhi to lagta hai ki hum azaad hi nahi hain..ya phir yese lok-tantra se to angrez hi acche the.
Triambak Sharma
Editor
Cartoon Watch
www.cartoonwatchindia.com

Triambak said...

Jagdeep jee ko Vande mataram. Aap jaise logo ke karan hi shayad ye dharti thik thik apni jagah par ghoom rahi hai..
Kabhi kabhi to lagta hai ki hum azaad hi nahi hain..ya phir yese lok-tantra se to angrez hi acche the.
Triambak Sharma
Editor
Cartoon Watch
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Triambak said...

Jagdeep jee ko Vande mataram. Aap jaise logo ke karan hi shayad ye dharti thik thik apni jagah par ghoom rahi hai..
Kabhi kabhi to lagta hai ki hum azaad hi nahi hain..ya phir yese lok-tantra se to angrez hi acche the.
Triambak Sharma
Editor
Cartoon Watch
www.cartoonwatchindia.com

sunita (shanoo) said...

जनमानस जी, आज पहली पार पढ़ा आपका लेख पढ कर बहुत कौतुहल हुआ आज आप जैसे लोग भी है इस दुनिया में जिन्हे दूसरों की इतनी फ़िक्र है
मै पूरी तरह से जगदीप जी के समर्थन में हूँ उह्ने न्याय मिलना ही चाहिये,..ये हमेशा ही होता आया है इमारत की नींव मे जाने कितने ही मजबूत हाथ दफ़न हो जाते है,.. जगदीप जी की फ़ाईल भी भोलाराम के जीव की भाँती सरकारी कागजों मे दब गई है हमे उनका साथ देना ही होगा,..आपकी पुकार सुन कर जब हमारी आँखो में इतने आन्सू आये है तो जगदीप जी का हाल देख कर तो ना जाने क्या होगा,..उन्हे बहुत हिम्मत और हौसले की जरूरत है...
हम सब की और से जगदीप जी को नमस्कार,..
सुनीता चोटिया(शानू)

Aflatoon said...

यह रपट प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद।

rakesh jain said...

gareebo ke pass batne ke liye bhavnaye to hoti he .amiro pass tovo bhi nahi hoti jo hota he ---pasa use baat nahi sakte . dangi ji ka software google jesi companiya bhi to khareed sakti he . hindi ka bhoot badaa bajar he . isme kisi ko sewa karne ki jarorat nahi kama ne ki jaroorat he . samsya he ki koi unke software ka bajar me marketing or use profit se jod detaa to dangi ji ko ye din na dekhne padte . sarkaar kya karegi unhe apne parichito ke kaam karvaane se fursat mile to kuch kare .filhaal to hum yahi kar sakte he ki is baat ko jyada se jyada logo ko pahuchaaye . kash jagdeesh dangi bhi hindi ka software baaane ke bajaya multinational companiyo ke liye software ana rahe hote angregee me to unhe ye din na dekhne padte ?

Upasthit said...

http://upasthit.blogspot.com/2007/05/httpjayprakashmanasblogspotcom200705blo.html

अनूप भार्गव said...

जयप्रकाश जी:

आप का जगदीप डांगी जी के विषय में लेख पढा ।

मैं जगदीप जी से सम्पर्क में हूँ , करीब २ महिनें जब मैनें उन के विषय में पढा था तो उन्हे फ़ोन कर के लम्बी बातचीत की थी । जगदीप जी नें अपनी सोफ़्ट्वेयर की CD भी मुझे भेजी थी जो मैनें स्थापित करनें की कोशिश की लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से सफ़ल नही हो पाया । एक बार फ़िर कोशिश करूँगा । मैनें क्यों कि अभी सोफ़्टवेयर ठीक से देखी नहीं है इसलिये उस पर टिप्पणी नहीं कर सकता ।

अभी बस इतना ही कह सकता हूँ कि इस समस्या का समाधान 'भावुकता' की बजाय मस्तिष्क से सोचा जाना चाहिये । जगदीप जी बीमार हैं और मौत से जूझ रहे हैं , यह एक अलग बात है और हमें उन के हिन्दी के प्रति प्रयास, इमानदारी को देखते हुए और एक अच्छे दोस्त और नागरिक के नाते अपनी पूरी मदद करनी चाहिये । मुझे आप उन में गिन सकते हैं ।

जहां तक उन की सोफ़्ट्वेयर के प्रचार और उस में सरकारी सहयोग का सवाल है हमें उस पूरी मदद का लाभ उठाना चाहिये जो नियमों के अनुसार उपलब्ध होनी चाहिये लेकिन हो नहीं पा रही है । 'इंटरनेट' बहुत सशक्त माध्यम है इस के प्रति जागरूकता फ़ैलाने के लिये और हमें इस का पूरा फ़ायदा उठाना है । मेरे जो अपनें निजी सम्पर्क हैं , मैं उन सब को पत्र लिखनें को तैयार हूँ ।

लेकिन इस के अलावा हमें यह सोचना कि पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहनें के बजाय हम 'सोफ़्ट्वेयर' को निष्पक्ष हो कर परखें और उसे अपनें तरीके से बाज़ार में स्थापित करनें की कोशिश करें । काम सरल नहीं होगा लेकिन असम्भव भी नहीं है । शायद इतनें बरस अमेरिका में रहनें का प्रभाव कहें , लेकिन मेरा विश्वास है कि अन्त में 'बाजारी शक्तियां" ही सफ़लता/असफ़लता का प्रतिमान बनेंगी । जानता हूँ यह एक जटिल मुद्दा है और सब इस से सहमत नहीं होंगे , लेकिन इस विषय पर चर्चा शायद आप के ब्लौग पर बेहतर रहेगी । यदि आप इस पत्र को अपनें ब्लौग पर डालना चाहें तो मुझे आपत्ति नहीं है ।

१३-१४-१५ जुलाई को न्यूयार्क में 'विश्व हिन्दी सम्मेलन' हो रहा है , मैं उस की कार्यकारिणी समिति में हूँ । कोई ऐसा वायदा नहीं कर सकता जिसे पूरा न कर सकूं लेकिन 'सोफ़्ट्वेयर' को प्रदर्शिनी में ज़रूर रखा जा सकता है जिस से कि सब उसे देख सकें । चर्चा में भी शामिल किया जा सकता हैं (Live Demonstration के साथ) जगदीप जी को इस पत्र की कापी भेज रहा हूँ , यदि वह मुझे पूरी सामग्री १५ जुन तक भेज दें तो अच्छा रहेगा । पता नहीं कितना असर होगा लेकिन मैं स्वयं आनन्द शर्मा जी ( विदेश राज्य मंत्री) से हिन्दी सम्मेलन के समय बात कर सकता हूँ । मुझे पिछली मुलाकात में वह काफ़ी सुलझे हुए और आम राजनेताओं से अलग लगे थे ।

अभी बस इतना ही ...

अनूप भार्गव
संचालक -ईकविता
Plainsboro,
New Jersey, US

घुघूती बासूती said...

मित्र अल्पबुद्धि हूँ, पूरी बात समझ में नहीं आई । जो समझ में आया वह कुछ इस प्रकार है
१ जयदीप जी ने कमप्यूटर सम्बन्धित,विशेषकर हिन्दी सम्बन्धित महत्वपूर्ण काम किया है ।
२ उन्हें इस काम को आगे बढ़ाने में सहायता नहीं मिल रही ।
३ अभी वे बीमार चल रहे हैं और रीनल फेल्यर से पीड़ित हैं । यह बीमारी मेरी जानकारी में जानलेवा हो सकती है ।
अतः मुझे लगता है सबसे पहले हमें उनकी बीमारी से लड़ने में सहायता करनी चाहिये । इसके लिए कोई फंड आदि बनाया जा सकता है किन्तु देर करना उचित न होगा । यदि आप उनके परिवार या मित्रों का पता दें या यदि हस्पताल में सीधे उनके नाम से सहायता भेजने की सुविधा हो तो बताएँ । मैं सीधे मनी आर्डर भेज सकती हूँ । मेरे जैसे अन्य मित्र भी होंगे जो सहायता करना चाहेंगे ।
ऐसे भी मित्र होंगे जो ऐसे काम करने की जानकारी रखते होंगे व जो इसे सुनोयित तरीके से कर सकेँ । किन्तु शुरूआत करने में देर नहीं की जा सकती ।
कृपा कर एक छोटा चिट्ठा हिन्दी ब अंग्रेजी दोनों में लिखें जिससे क्या करना चाहिये समझ में आए ।
बाद में जयदीप जी का काम आगे बढ़ाने में कैसे सहयोग किया जा सकता है इस पर विचार करेंगे ।
(उपस्थित - रवीन्द्र नाथ भारतीय के ब्लॉग http://upasthit.blogspot.com/2007/05/httpjayprakashmanasblogspotcom200705blo.html)के परिप्रेक्ष्य में
घुघूती बासूती

चन्द्रकांत जोशी said...

जय प्रकाशजी

मैने जगदीश जी डांगी के संबंध मे बीबीसी हिंदी से यह जानकारी निकाली है क्या यह पर्याप्त है...क्या मैं इसको और आपके पत्र को मिलाकर अपनी साईट http://www.hindimedia.in/ पर ले सकता हूँ ताकि मीडिया वालों तक अपनी बात पहुँच सके......

चन्द्रकांत जोशी

अनूप शुक्ला said...

ऊपर अनूप भार्गवजी हमारी बात कह चुके हैं। मेरा सुझाव है कि जगदीश डांगी जी के लिये जो हमसे बन सकता हो वह करें।
इसमें उनके लिये आर्थिक सहायता देतु चंदा, दवायें और अन्य सुविधाऒं के लिये लोगों से सहयोग करने की अपील की जा सकती है। जगदीश डांगी जी का संपर्क नं, पता आदि सूचनायें देकर उनके बारे में नियमित जानकारी दे सकें तो अच्छा। मीडिया से जुड़े साथी उनके बारे में अखबारों में और अपन चैनलों में समाचार प्रकाशित करके सहयोग के लिये अपील कर सकते हैं।

दुर्गेश गुप्त "राज" said...

प्रिय भाई जयप्रकाश जी, आपने जगदीप जी के बारे में लिख कर अच्छा किया. अनूप जी का पत्र पढकर मुझे उम्मीद हॆ कि उन्हें निश्चित ही न्याय मिल सकेगा. वॆसे जगदीप जी ने पत्र में लिखा हॆ कि डिजिट पत्रिका के अपॆल,०७ के अंक के साथ उनके साफ्टवेयर की सीडी जारी की गई हॆ, उसे देखा जा सकता हॆ. विस्तार से समाचार www.anurodh.com पर भी पढे जा सकते हॆं.

SHASHI SINGH said...

अनूप भार्गवजी का सुझाव अच्छा है... इसी दिशा में कोशिश की जानी चाहिये। शायद जगदीप भाई का कुछ भला हो पाये।

अनुनाद सिंह said...

भाई जयप्रकाश जी,

सबसे पहले आपको साधुवाद कि आपने जगदीप के अस्वास्थ्य का समाचार लिखा और हिन्दी चिट्ठाजगत और अपनी संवेदना व्यक्त की। इन सबके पीछे मै उस संस्कृति को दोषी मानता हूँ जो अपने असली नायक को पहचान ही नही पाती और घटियापन को ही हीरो मानकर पूजती रहती है। हिन्दी माध्यम भी गन्दगी परोसने से समय नहीं निकाल पा रहे हैं; तभी तो हिन्दी के इस कर्मयोगी की सुधि अभी तक किसी ने नहीं ली।

खैर दुनिया में जन्म-मरण, स्वास्थ्य-अस्वास्थ्य आदि का क्रम चलता रहता है। इससे दुखी न होकर हमे दो तरह से जयदीप की सहायता करनी चाहिये-
१) इस दुखद समाचार के बारे में समाचार-पत्रों और टी. वी. पर आये, इसके लिये हमे ई-मेल, पत्र या टेलीफोन से इसके बारे में उन्हे अवगत कराना चाहिये।

२) हिन्दी चिट्ठाजगत भी उनके इलाज के लिये पैसा जुटाये।

जयदीप जैसे कर्मयोगी हम सबके तथा सरकारी मदद के अधिकारी हैं। उनको उचित चिकित्सा सुविधा मिले और शीघ्र स्वास्थ्य-लाभ करें , यही प्रार्थना है।

Jitendra Chaudhary said...

मै अनूप भार्गव जी की बात का समर्थन करता हूँ।
१) जगदीप डांगी जी अथवा उनके परिवार का कोई सम्पर्क सूत्र इन्टरनैट पर उपलब्ध कराया जाए।
२) जगदीप जी, कई चिट्ठाकारों के सम्पर्क में थे, कृप्या वे कोई सार्थक पहल करें।
३) एक फंड बनाया जाए, जिसमे लोग यथाशक्ति/यथासम्भव सहायता करें। जो लोग डांगी जी के सम्पर्क मे है, वे यह सुनिश्चित करें कि आर्थिक सहायता समय पर डांगी जी के पास पहुँच रही है।
४) डांगी जी के कार्यों पर एक विशेष ब्लॉग/साइट का निर्माण किया जा सकता है, जहाँ पर उनकी अनुमति से उनके ब्राउजर के डाउनलोड का लिंक दिया जा सकता है। यह साइट विभिन्न भाषाओं मे उपलब्ध हो तो बेहतर।
५) इसी साइट पर डांगी जी के स्वास्थ्य के बारे मे अपडेट भी उपलब्ध कराए जाएं।

Balendu Sharma Dadhich said...

जयप्रकाश मानसजी ने जगदीप भाई के बारे में बड़ी भावुक और मार्मिक टिप्पणियां की हैं जो उनसे किसी न किसी रूप में जुड़े हुए या उनके साथ एकात्मता का अनुभव करने वाले हर शुभेच्छु के अंतरमन का प्रतिनिधित्व करती हैं। जगदीप ने बिना किसी बाहरी सहयोग के, अनेकों सीमाओं के भीतर रहते हुए हिंदी में इतने महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर विकसित कर दिखाए हैं। यह उनकी तकनीकी क्षमताओं, अद्वितीय प्रतिभा और हिंदी के प्रति अनन्य समर्पण का ऐसा प्रमाण है जिसकी उपेक्षा करना पाप होगा। जगदीप से मेरी फोन पर दो-तीन बार बात हुई है और कम से कम पिछले तीन वर्षों से मैं ईमेल पर उनके संपर्क में हूं। उनके आत्मविश्वास से भरे हुए स्वाभिमानी व्यक्तित्व का मैं कायल हूं। विभिन्न सरकारी एजेंसियां सैंकड़ों करोड़ रुपए खर्च करके भी उस किस्म का जूनूनी समर्पण पैदा नहीं कर सकतीं जो जगदीप के पास पहले से मौजूद हैं।

मैं जीतू भाई के इस सुझाव से सहमत हूं कि हमें जगदीप के लिए सिर्फ बातें नहीं बल्कि कुछ ठोस करना चाहिए। मैंने इसी दृष्टिकोण से उनसे बात भी की थी और उनके उपचार की स्थिति तथा आगामी आवश्यकताओं के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की थी। हम जैसे उनके मित्रों की पहली चिंता उनके स्वास्थ्य को लेकर है और मौजूदा परिस्थितियों में वही सर्वोच्च वरीयता भी होनी चाहिए। दुर्गेशजी से ताजा जानकारी मिलने के बाद मैं यही सोच रहा था कि हमें उनके स्वास्थ्य के लिए एक कोष स्थापित करना चाहिए जिसमें सबसे पहले मैं स्वयं योगदान करना चाहूंगा। लेकिन जगदीप ने आर्थिक सहायता के प्रति अनिच्छा दिखाते हुए कहा है कि उनका परिवार उनके उपचार में सक्षम है। अभी उनकी दवाएं चल रही हैं और वे सर्जरी करवाने के विरुद्ध हैं क्योंकि वे बचपन से ही स्वास्थ्य के मामले में बहुत कष्ट भोगते रहे हैं। (हालांकि उनके इस दृष्टिकोण से मैं सहमत नहीं हूं)।

डॉक्टरों ने फिलहाल उन्हें सर्जरी के लिए नहीं कहा है और फिलहाल वे दवाओं के प्रभाव को observe कर रहे हैं। छोटी सी राहत की बात यह है कि इस बीच जगदीप को ग्वालियर स्थित आईआईआईटी (ट्रिपल आईटी) नामक सरकारी तकनीकी संस्थान में एक साल के अनुबंध पर वैज्ञानिक पद पर नियुक्त किया गया है। किंतु प्रश्न उठता है कि क्या वहां मिलने वाले पारिश्रमिक से जगदीप को श्रेष्ठतम चिकित्सा उपलब्ध हो पाएगी? जगदीप के स्वाभिमानी पक्ष के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए भी मैं उनसे यह अनुरोध करना चाहूंगा कि वे अपने इतने सारे शुभेच्छुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए अपने स्वास्थ्य के लिए एक कोष बनाने की अनुमति दें ताकि उनके लिए व्यावहारिक रूप से कुछ किया जा सके। जहां तक उनके सॉफ्टवेयरों को उनका उचित सम्मान, मान्यता और प्रतिष्ठा दिलवाने एवं जन-जन तक पहुंचाने का प्रश्न है, मुझे लगता है कि सरकार पर निर्भर रहने से काम नहीं चलने वाला। इस संदर्भ में भाई अनूप भार्गव की यह बात बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहनें के बजाय हम 'सोफ़्ट्वेयर' को निष्पक्ष हो कर परखें और उसे अपनें तरीके से बाज़ार में स्थापित करने की कोशिश करें । देखना चाहिए कि क्या जगदीप के सॉफ्यवेटरों को स्वतंत्र रूप से बड़े पैमाने पर बिक्री के लिए लांच किया जा सकता है? लेकिन ऐसा करते हुए उनके बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा और आर्थिक पक्षों का खास ख्याल रखे जाने की जरूरत है। इस संदर्भ में भाई अनूप शुक्ला, रवि रतलामी, जीतू भाई, देबाशीष आदि के तकनीकी-व्यावसायिक अनुभव और संपर्कों का इस्तेमाल किया जा सकता है। मैं स्वयं भी हर प्रकार का योगदान और सहयोग देने के लिए पूर्णतः उद्यत हूं।

Raviratlami said...

जगदीप डांगी के लिए मैंने एक पोस्ट अपने चिट्ठे पर लिखी थी -  क्या मिल सकेंगी आपकी दुआएं

जगदीप जी से आर्थिक सहायता हेतु कुछ पत्राचार भी हुआ था. परंतु उन्हें आर्थिक सहायता के बजाए दुआओं की ज्यादा जरूरत है. इस पत्राचार के कुछ अंश -
नमस्कार, ई-मेल के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद. मुझे रुपये-पैसों की जरूरत नहीं है हाँ आपके प्यार और स्नेह की जरूरत है. आपने मुझ पर सच्चे दिल से ध्यान दिया इसके लिये मैं आपका सदैव आभारी रहूँगा. मेरे माता-पिता और भाई बहुत प्यार करते हैं मुझ पर लाखों रूपये पहले ही खर्च कर चूके हैं और आगे भी कभी कमी महशूस नहीं होने देंगे. मेरे दादा-दादी ने हमारे लिये बहुत कुछ छोड़ा है. मैंने जीवन से कभी हार नहीं मानी मैं आपसे बहुत प्रभावित हूँ. आज मैं दबाईयाँ ले रहा हूँ और Sir मैने आई.आई.आई.टी.एम. ग्वालियर जोईन कर लिया है. और एक साइंटिस्ट के पद पर कार्यरत हूँ जब तक रहूँगा आपके आशीर्वाद से जीवन से संघर्ष करता रहूँगा.आपकी भावनाओं की हमेशा कद्र रहेगी न जाने तकदीर क्या चाहती है. धन्यवाद.
जगदीप


आइए, हम सभी जगदीप डांगी के शीघ्र स्वास्थ्य सुधार हेतु कामना करें.

Balendu Sharma Dadhich said...

भारत सरकार द्वारा जारी की जाने वाली सीडी में जगदीप के सॉफ्टवेयरों को शामिल किए जाने के मुद्दे पर अभी-अभी मेरी सीडैक पुणे में संबंधित अधिकारियों से बात हुई है। उन्होंने स्टेटस बताने के लिए कुछ समय मांगा है।

जयप्रकाश मानस said...

संपर्कः
जगदीप डांगी
वार्ड नं. 2,
को-ऑपरेटिव बैंक के पीछे,
स्टेशन क्षेत्र, गंज बसौदा,
जिला विदिशा (मध्यप्रदेश) भारत.
पिन- 464221
दूरभाष: घर. (07594) 222457 मोबाइल. 09826343498
ई-मेल: dangijs@yahoo.com,gjagdeep@sancharnet.in