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Monday, July 06, 2009

प्रमोद वर्मा, विश्वरंजन और कुछ लोग

प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह पर विशेष

‘कुछ लोग’ प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । ‘कुछ लोग’ यह भी नहीं जानते कि हर कोई प्रमोद वर्मा को नहीं जान सकता । वैसे ‘कुछ लोग’ स्वयं के बारे में भी नहीं जान पाते । बात ऐसे ‘कुछ लोगों’ की नहीं हो रही है । बात उनकी होनी चाहिए जो लोग प्रमोद वर्मा को कुछ-कुछ जानते हैं, उनके कुछ अनजाने को भी स्वयं और समूची दुनिया के लिए जानना ज़रूरी समझते हैं। विश्वरंजन उन कुछ लोगों में अव्वल हैं जो प्रमोदजी को जानने-समझने और समझाने के लिए मूर्खतापूर्ण आरोपों, कुढ़ों, फब्तियों की संभावना का आंकलन किये ब़गैर कठिन धर्मनिर्वहन में लगे हैं । निहायत संवेदनशील जो ठहरे ।

कठिन इसलिए कि कुछ लोगों के मुताबिक उन्हें सिर्फ़ पुलिस महानिदेशक होना चाहिए । आत्मावान् मनुष्य नहीं । विचारवान् नहीं । उन्हें संस्कृति-वंस्कृति से कोई लेना-देना नहीं चाहिए। मैं उनसे पूछता हूँ – हुजूर, मुझे क्यों धंसा दिया आपने समारोह के संयोजन में? जब आप जैसे बड़े आदमी को राज्य के पालनहार और जिम्मेदार क़िस्म के ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कह देते हैं कि विश्वरंजन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष नहीं बन सकते तो वे हमारे जैसे कीडे-मकोड़े (सामान्य आदमी)को किस तरह निपटाने की सोच रहे होंगे ? जैसे प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान उनकी अपनी सरकारी बपौती है जहाँ वे जिसे चाहे उसे बैठायें । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान कोई राजनीतिक पद तो है नहीं कि उस पर शीर्षस्थ राजनेता के पिछलग्गू को ही बिठाया जाय । उन्हें कौन समझाये कि यह देश और राज्य के साहित्यकारों की साहित्यिक संस्था है जिसमें विश्वरंजन अपने सभी सदस्यों के आग्रह पर वह गैरराजनीतिक, गैरलाभकारी पद का गुरुत्तर भार स्वीकार किये हैं । शायद इसलिए कि वे प्रमोदजी को गुरुतुल्य मानते रहे हैं । शायद इसलिए कि उनमें फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और स्वतंत्रताकामी सपूत का ख़ून भी दौड़ता है । शायद इसलिए भी कि वे राज्य को विचारवान, गुणवान और सुसंस्कृत बनाने का सपना भी देखते हैं । शायद इसलिए कि वे और अफसरों की तरह सिर्फ अपनी हेकड़ी में मरना नहीं चाहते । यह बिलकुल दीगर बात है कि ऐसे ‘कुछ लोग’ अक्सर किसी कुंठा का शिकार होकर उलजूलूल बकते रहते हैं और राजनीति में यह सब चलता भी रहता है ।

वैसे ऐसे ‘कुछ लोगों’ को अपने ही राज्य के नियम-क़ायदों का ज्ञान नहीं होता कि उनका कोई भी अधिकारी कला, साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास से संबंधित वह सभी कार्य कर सकता है जो राज्य की संप्रभुता को चुनौती न देता हो । ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कहते पाये जा सकते हैं कि आप अपनी ज़मीर को छोड़कर आयोजन के बहाने रुपया बटोर रहे हैं और कुछ हिस्सा मुझे भी दे रहे हैं । भई क्या बात है, जैसे जीवन-भर पुलिस विभाग में रहते हुए विश्वरंजन को कुछ नहीं मिला....तो चले साहित्य के बहाने पैसा कमाने । जैसे विश्वरंजन किसी भूखमर्रे किसिम के मेट्रिक पास नेता है जो बड़ा से बड़ा राजनीतिक पद पाजाने के बाद भी चंदा दलाली से ज्यादा नहीं सोच सकता । तौबा-तौबा। कुछ तो लिहाज़ करो फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और संग्राम सेनानी के संस्कारवान नाती पर.....

विश्वरंजन कुछ नहीं कहते, सिर्फ मुस्काते देते हैं- जैसे उनकी मुस्कान में ये सारे भाव-उत्तर छुपे हुए हों कि मानस, ऐसे ‘कुछ लोग’ जो कम पढ़ लिखे होते हैं, जीवन-भर यही काम करते रहते हैं । और ऐसे लोग सिर्फ राजनीति में नहीं साहित्य में भी होते हैं । तुम और हम और बहुत सारे लोग भी ऐसे ‘कुछ लोगों’ जैसे नहीं होते । शायद इसलिए प्रमोदजी जैसे विभूतियों पर कुछ होने की पहल हो पाती है ।

प्रमोदजी ऐसे ‘कुछ लोग’ की चिंता नहीं किया करते थे । वे जानते थे कि समाज में ‘कुछ लोग’ ऐसे होते ही हैं जो वे कुछ करें तो ठीक । दूसरा कुछ करे तो गलत । ऐसे लोग जीवन भर विघ्नसंतोषी बने रहते हैं । दरअसल ऐसे लोग ऐसे मौकों पर अपनी विशेषज्ञता प्रतिपादित करने के लिए जुमले उछालते हैं । ताकि आप उन्हें मनायें तुलसीदास की पंक्ति को याद करते हुए – प्रथमहू बंदऊँ खल के चरना । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो बड़े बड़े लेख लिख सकते हैं परन्तु दिये गये विषय पर लिखने में उन्हें नानी याद आ जाती है । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जिन्हें लगता है कि वे प्रमोदजी जैसे छोटे साहित्यकार पर लिखकर अपने बडप्पन को छोटा करने का ख़तरा नहीं उठा सकते । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो आपके हर कामों में मीन-मेख निकालकर ऐसे आयोजनों में आपकी अस्थिपंजर एक कर देते हैं । कुछ नहीं मिला तो प्रूफ की ओर इशारा करके आपके निष्कलुष श्रम पर ऊँगलियाँ उठा देते हैं । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो भीतर से तो ऐसे पवित्र आयोजनों से जुड़े होते हैं किन्तु आपको पता ही नहीं लगता कि वे अपना मूल्य कब और कैसे आपसे वसूल लेते हैं ।

साहित्यवाले भी समाज से आते हैं । जैसा समाज वैसे ही उसके साहित्यकार । किस-किस पर रोयें ? किस किसकी कितनी परवाह करें । परवाह करेंगे तो राज्यहित में ऐसे काम नहीं कर सकते । चलिए... चलते-चलते भैया परदेशीराम वर्मा जी के उस आलेख की भी चर्चा कर लेते हैं जिसका देह संपूर्ण पवित्र है किन्तु उसमें धड़ लगा है वह निहायत अपवित्र है यानी उनके शब्दों में जी हाँ, वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । केवल उनकी पूजा करते हैं । भई बिना जाने कोई किसी की पूजा भला क्योंकर करेंगा ? लेख में मेरा जिक्र करके उन्होंने कुछ पर्दादारी कर दी है । उसका रहस्य खोल देते हैं । हाँ, मुझे उन्होंने कहा था कि वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते पर उन पर केंद्रित इस आयोजन में ज़रूर आयेंगे । तब मैंने यह भी कहा था कि आप आ रहे हैं यही प्रमोद जी को जानना है । मैंने यह भी कहा था कि कुछ लोग आपको और कुछ लोग मुझे भी नहीं जानते जिसके लिए हम जिंदगी भर लगे रहते हैं कि लोग हमें जाने । उस समय संस्थान के अध्यक्ष भी विश्वरंजनजी भी साथ थे । बात तो हुई छत्तीसगढ़ी में पर विश्वरंजन जी सब समझ रहे थे । उन्होंने सहर्ष आयोजन में पधारने की स्वीकृति भी दी थी कि वे ज़रूर प्रमोदजी पर बोलेंगे । इसके पहले भी सुधीर शर्मा ने बताया था कि इस आयोजन को लेकर परदेशीराम वर्मा का कहना है कि उन्हें सिर्फ संवाद में रखा गया है जबकि उन्हें अच्छे आसंदी में रखे जाने की उम्मीद थी । मैंने मित्रों की चर्चा में बिना किसी पाप के अशोक सिंघई जी को कह दिया जो संस्थान के उपाध्यक्ष हैं कि वे उन्हें मनालें । तो उन्होंने उसी तरह परदेशीजी को हड़का दिया जैसे एक मित्र को दूसरा मित्र हड़का देता है और दोनों एक दूसरे को ऐसे तो कई बार हड़का चुके होंगे । इसके कुछ ही दिन बात मुझे परदेशीजी का पत्र मिल गया कि उन दिनों जब प्रमोद जी पर केंद्रित आयोजन हो रहा होगा वे अन्यत्र व्यस्त रहेंगे अतः अपनी शुभकामनायें ही भेज सकते हैं । अब मैं तय ही नहीं कर पा रहा हूँ कि ऐसी शुभकामनाओं का क्या उपयोग किया जाये ? आपमें से किसी को इसका दिव्यज्ञान तो कृपया मुझे अवश्य सूचित करें ।

Friday, April 03, 2009

आयोग नक्सलियों के ख़िलाफ़ कब कार्यवाही करेगा ?

व्यवस्थित, पारदर्शी और शांतिपूर्ण चुनाव के लिए चुनाव आयोग बड़े से बड़े नेताओं की ऊँचाई नापने में कोई कोताही नहीं कर रहा है । जिलों में हिंसा, आंतक, अशांति फैलाने वालों को जेलों में ठूँसा जा चुका है या उन्हें दबाकर रखा जा रहा है । राज्यों के ऐसे डीजीपी, सचिवों, कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों सहित छोटे-बड़े शासकीय कर्मचारियों पर भी आदर्श आचरण संहिता के नाम पर गाज गिराने में भी वह कहाँ चूक रहा है, जो उसके ही अस्थायी अंग हैं और जिसके बग़ैर उसका चुनाव कराना भी संभव नहीं । क्योंकि वह ऐसे किसी स्थायी और बृहत अमले का स्वामी तो होता नहीं, जो राज्यों में चुनाव करा सके। इस दिशा से सोचें तो उसकी भूमिका चुनाव की सफलता के लिए काबिले तारीफ़ भी है, किन्तु दूसरी ओर एक सच यह भी है कि नक्सली बेलगाम होकर चुनाव आयोग के मूल आत्मा पर पलीते लगा रहे हैं । इस पर आयोग की कोई विशेष कार्रवाई अब तक परिलक्षित नहीं हो रही है । जबकि न केवल बस्तर अपितु देश के कई राज्यों में वे चुनाव प्रक्रिया को तहस-नहस करन पर तुले हुए हैं । नक्सलियों की ये गतिविधियों क्या दृष्टि से परे हैं ? क्या इससे चुनाव आयोग के मूल उद्देश्य बाधित नहीं हो रहें हैं ? क्या इससे नक्सली इलाकों में आदर्श आचरण संहिता का मायने रह जाता है ? क्या ऐसे में चुनाव की असंदिग्धता बरक़रार मानी जा सकती है ? इन प्रश्नों से चुनाव आयोग को आज नही तो कल मुठभेड़ करना ही होगा ।


स्थानीय जनपद बस्तर की बात करें तो वह नक्सलियों के चुनाव बहिष्कार के फरमानों से सहमा-सहमा है । वे गाँव-गलियों में धमकी भरे पोस्टर चिपका रहे हैं। सड़कों पर हिंसक शब्दावली से ओतप्रोत चेतावनी के बैनर टाँग रहे हैं । जनता को व्होट देने पर हिंसा की धमकी दे रहे हैं। चुनाव पूर्व से ही सड़क-यात्रा को बाधित कर रहे हैं । लोकतंत्र को फ़र्जी क़रार दे रहे हैं । वे बार-बार यही दुहरा रहे हैं कि लोकसभा चुनाव में भाग लेने वाला हर राजनैतिक दल और उनका मैनिफ़ेस्टो जन-विरोधी है । चुनाव का विरोध करने के मतलब में चुनाव आयोग का विरोध भी सम्मिलित है और इसके लिए वे चुनाव आयोग के समक्ष भारी समस्या खड़ी करने वाले हैं । यदि उनके प्रवक्ताओं की विज्ञप्तियों और संवाददाताओं को दिये गये साक्षात्कारों के मजमून पर ग़ौर करें तो वे लोकसभा चुनाव के दिन बस्तर में भारी हिंसा और आंतक फैलाने वाले हैं । इससे पोलिंग पार्टियाँ भी सशंकित है । यह दूसरी बात है कि पुलिस और अद्धसैनिक बल इनसे निपटने के लिए कटिबद्ध है । फिर भी, देश के कई राज्यों में अंगद की तरह पाँव जमा चुके और हर बार ऐन चुनाव के वक़्त भारतीय चुनाव आयोग के निर्देशों की धज्जी उड़ाने वाले ऐसे तत्वों पर आयोग किस तरह लगाम कसने वाला है, अनुत्तरित प्रश्न है । प्रश्न यह भी उठता है कि इन्हें चुनाव पूर्व वह कैसे हतोत्साहित करना चाहता है ताकि जनता निर्भय होकर मतदान कर सके ? राजनीतिक दल जान जोख़िम में डाले प्रचार कर सकें, अपना एजेंडा बता सकें । यदि ऐसे क्षेत्रों में राजनीतिक दल सहित प्रतिनिधियों को जाने का वातावरण ही न मिल सके, जनता वोट ही न डाल सके तो यह केवल आकस्मिक व्याधि नहीं । इसका भी निदान केंद्रीय निर्वाचन आयोग को ढूँढना होगा । इससे जूझने के लिए उसे अतिरिक्त तैयारियाँ और रणनीति भी ईजाद करनी होगी । इन संदिग्ध और जटिल स्थितियों को कैसे आदर्श आचरण संहिता से परे रखा जा सकता है ?


नक्सली इलाकों में आदर्श आचरण संहिता का प्रश्न केवल बस्तर या सरगुजा का प्रश्न नहीं है । यह छत्तीसगढ़, बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सहित देश के कई राज्यों का प्रश्न है । चुनाव के समय मतदान बहिष्कार, नक्सली आंतक और हिंसा व्यापक तौर पर कई प्रदेशों की समस्या के रूप में स्थायी रूप धारण कर चुका है। इसके निदान के लिए राज्यों में उनसे जूझने की स्थायी रणनीतिकारों यानी पुलिस बल के मुखियाओं का समादर भी चुनाव आयोग को करना चाहिए । उनके अनुभवों का भी व्यवाहारिक उपयोग होना चाहिए । क्योंकि चुनाव आयोग मात्र दो या तीन माह के लिए सशक्त होता है । और इन दौरान सारे राज्य का प्रशासन तंत्र भी अस्थायी तौर पर उसके अधीन होता है तब उसे सिर्फ़ निजी अस्मिता के दंभ त्याग कर राज्य स्तर के ऐसे अनुभवी पुलिस बल की मंशा पर निर्द्वंद्व होकर विचार करना चाहिए । जैसा कि हम देख चुके हैं कि छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन की आनुभविक रणनीति और नक्सली अंचलों के पुलिस अधीक्षकों के प्रस्तावों पर पिछला विधान सभा चुनाव पिछले कई चुनावों से कम बाधाओं के साथ निपटा था । किन्तु सामान्य-सी सलाहात्मक टिप्पणी पर पुलिस महानिदेशक को आयोग द्वारा खारिज करने की चेष्टा कहीं न कहीं राज्य स्तरीय कर्मियों के मनोबल को भी प्रभावित करती है । यह नक्सली आंतक के परिप्रेक्ष्य में चुनाव आयोग का स्वस्थ निर्णय नहीं कहा जा सकता है । क्योंकि चुनाव पूर्व भी ऐसे नक्सली तत्वों से निपटने में वास्तविक रूप से राज्यों का यही पुलिस बल ही अधिक सतर्क और कौशलपूर्ण कार्रवाई करता है ।


आज नहीं तो कल केंद्रीय निर्वाचन आयोग को देश भर में फैल चुके नक्सलियों द्वारा चुनाव बहिष्कार, हिंसात्मक आंतक के कारण राजनीतिक दलों और जनता के अधिकारों के हनन पर रोक लगाने के लिए आदर्श आचरण संहिता को संशोधित और कड़ा करना ही पड़ेगा और उसके प्रतिफल में नक्सली इलाकों में चुनाव प्रक्रिया की सफलता के लिए विशेष क़दम भी उठाने होंगे । जिसमें स्थानीय परिस्थितियों से निपटने वाले विशेषज्ञों की रायों को विशेष तवज्जों देना होगा । आयोग सामान्य तौर पर मौखिक और लिखित टिप्पणियों पर प्रतिबंध लगाने में अवश्य सफल हुआ है, जिसमें राजनेता, अफ़सर और कर्मचारी सम्मिलित हैं किन्तु नक्सली हिंसा और चुनाव विरोधी एवं हिंसक गतिविधियों पर लगाम कसने में वह अब भी असमर्थ है। और ऐसा कौन नागरिक है जो मौत की शर्त पर भी प्रजातंत्र के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए मतदान करना चाहेगा ? ऐसा कौन राजनीतिक दल होगा जो मौत की परवाह नहीं करके चुनाव कैन्वासिंग करेगा ? ऐसा कौन शासकीय कर्मी होगा जो ऐसे क्षेत्रों में चुनाव कराने में झिझकेगा नहीं ? ऐसा कौन चुनाव प्रेक्षक होगा जो ऐसे धूर नक्सली इलाकों का मुआयना कर सकेगा ? तब ऐसी दुःसह परिस्थितियों में ऐसे क्षेत्रों में चुनाव और आयोग की उपस्थिति का कोई मायने नहीं रह जाता है । यह कमज़ोरी तब तक ठीक नहीं हो सकती, जब तक आयोग राज्य प्रशासन के पदों पर कार्यरत और चुनावी परिस्थितियों में प्रतिनियुक्त आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञों को ठीक से संबोधित न करे । इस संबोधन में समन्वय, परस्पर विश्वास और स्थानीय परिस्थतियों अनुसार नक्सली विपदाओं से जूझने के अनुभवों का आत्मसातीकरण को भी जोड़कर देखा जाना चाहिए । क्योंकि अंततः यही स्थानीय पुलिस बल के पास नक्सलवाद से निपटने का गुर होता है और दीर्घ अनुभव भी । वे नक्सलियो की हर चाल को बखूबी समझते हैं । वे उनके सारे किलों, गढ़ों के बारे में जानते-समझते हैं ।

Thursday, March 26, 2009

।। नक्सलियों के बयानों के पीछे की वास्तविकता ।।


हाल ही में नक्सलियों ने जनता-सरकार की माँग की है । किससे की है ? क्या सरकार से की है? यदि वह माँग सरकार से है तो प्रश्न उठता है कि सरकार तो नक्सल विरोधी है । भविष्य की हर सरकारें चाहे उस सरकार को कोई भी दल संचालित करे, नक्सलविरोधी भी होगी । क्योंकि नक्सलवाद का रास्ता प्रजातंत्र की पतन की ओर ले जाता है । और कैसे कोई भी दल स्वयं प्रजातंत्र को ध्वस्त करने की गतिविधियों का अनुमोदन कर सकती है ! क्योंकि ग़रीबी, शोषण, उत्पीड़न व भेदभाव मिटाने के नाम पर भी ख़ूनी हिंसा के समर्थन का साफ़ मतलब अमानवीय, असंवैधानिक और दूसरी तरह का दमन भी हो सकता है । यही अंतिम विकल्प तो नहीं । हिंसा, भय, आंतक के सहारे यदि सामाजिक क्रांति हो सकती है तो उसकी आवाज जनता से आनी चाहिए । जाहिर है यह आवाज़ जनता की ओर से नहीं, नक्सलियों की ओर से आ रही है जिन्होंने बस्तर में अब तक ऐसा कोई जनप्रिय कार्य नहीं किया जिससे बल पर उसका कोई सदस्य प्रजातांत्रिक तरीके से सरकार के किसी घटक के सदस्य बन पाता । यदि वे वास्तव में जनता की सरकार के स्वप्नाकांक्षी होते तो ऐसी कौन सी शक्ति है जो उन्हें जनता का व्होट पाने से रोक सकती है । इसका साफ मतलब है कि न वे जनता के लिए हैं, न वे जनता हैं, न वे जनता द्वारा संचालित व्यवस्था के पक्षधर हैं । ‘जनता की सरकार’ की आवाज़ आड़ मात्र है ठीक जैसा वे पहले जनता की पक्षधरता की धूर्त चालों के सहारे बस्तर के भोली-भाली जनता के बीच पैठ बनाकर अब अपने असली एंजेंडे पर उतर आये हैं । दरअसल जनता उनके एंजेडे में ही नहीं है । वे स्वयं भी जानते हैं कि कोई भी प्रजातांत्रिक सरकार नक्सलियों की खूनी क्रांति पर विश्वास नहीं करती । कर ही नहीं सकती।


ऐन चुनाव के समय उनका ‘जनता की सरकार’ की माँग करना जनता को दिग्भ्रमित करना है । मतदाता की सोच को प्रभावित करना है । दरअसल नक्सलियों के दो रूप हैं । एक स्वांग के भीतर वे जनता के पक्ष में बात करते हैं दूसरी स्वांग में वे ठीक जनता के ख़िलाफ़ कार्यवाही करते हैं । चुनाव का बहिष्कार जैसा उनका ऐलान ऐसे स्वांगों का नमूना है । वे जानते हैं कि प्रजातंत्र का प्रवेश-द्वार चुनाव है। और चुनाव में यदि वे हिस्सा लेंगे तो उन्हें प्रजातंत्र पर विश्वास जताना पड़ेगा, जैसा कि उनका लक्ष्य ही नहीं है, सो वे चुनाव बहिष्कार की बात करते हैं । और इस चुनाव बहिष्कार के बहाने हिंसक गतिविधियों का सहारा लेकर प्रजातांत्रिक व्यवस्था के विरूद्ध जनता के मन में अविश्वास भरते हैं । चुनाव के अधिकार से वंचित करते हैं । यानी कि वे सिर्फ यही दबाब बनाने की कोशिश करते हैं कि जनता के लिए मात्र नक्सलवाद ही एकमात्र उपाय है । क्या सामाजिक बदलाव के विरूद्ध यह नादिरशाही और मध्ययुगीन कार्रवाई या सिद्धांत नहीं है ?


नक्सली प्रवक्ता के तर्कों को परखें तो देश की पार्टियों की घोषणा पत्र झूठे हैं । ठीक है, यदि देश के मौजूदा राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में धोखे-ही-धोखें तो उनके घोषणा पत्र में क्या है ? उनका अतीत का प्रदर्शन क्या है ? उनके पार ऐसी कौन-सी नैतिक दृष्टि है जिसका कायल होकर जनता उन्हें चुने । भय और हिंसा के हिमायती नक्सलियों को अपने जनहितैषी कार्यों की सूची जारी करनी चाहिए कि उन्होंने अमूक स्कूल की मरम्मत की । अमूक तालाब की सफ़ाई की । अमूक को अस्पताल पहुँचाया । सच तो यह है कि वे विकास के मायने को ही झूठलाते हैं । ऐसे दलों द्वारा किये गये विकास को ही ध्वंस करते हैं । वे जिस शोषण की बात करते हैं उसी शोषण की गंगा को वे भी आगे बढ़ाते हैं । एक अनुमान के अनुसार केवल बस्तर के नक्सली प्रतिवर्ष 200 करोड़ की उगाही अवैध तरीकों से भय और आंतक के बल पर करते हैं । वे यदि कहते हैं कि देश को पूँजीवादी और साम्राज्यवादी चला रहे हैं तो फिर वे क्या कर रहे हैं ? लूट तो आख़िर लूट ही है, चाहे कोई भी क्यों न लूटे । क्या वे भूखे को अन्नदान, वस्त्रहीन को वस्त्रदान और आवासहीन को आवासदान दे रहे हैं ? वे स्वयं जब समूचे बस्तर में अपना अनैतिक साम्राज्यवाद विकसित कर रहे हैं तो उनका किसी अन्य राजनैतिक दल को नकारना पूर्णतः दोगले चरित्र का ही परिचायक है । नक्सलियों की मान्यता कितना हास्यास्पद है कि यदि वोट देना अधिकार है तो नहीं दिये जाने का भी अधिकार मिलना चाहिए । यानी कि जनता किसी को न चुने । तो फिर कौन उसका प्रतिनिधित्व करेगा ? कौन उसकी आवाज़ बनेगा ? यानी नक्सलियों के अनुसार जनता नेतृत्वविहीन रहे । ठीक वन्य जीव की तरह विचरणशील । यानी पशुता की ओर समाज चले जाये । जनता बिना सांवैधानिक अंगों के अपना राज कैसे कर सकती है । ऐसा तो तब ही संभव था जब वह जंगल युग में रहता था । क्या ऐसी स्थिति को अराजक नहीं कहेंगे । यदि ऐसी अराजक स्थिति का निर्माण ही विकास का आधार है, यदि यही शोषणहीनता, उत्पीड़नहीनता व भेदभाव के विसर्जन का मूलमंत्र है तो उनके सिद्धांत और दर्शन दोनों अबूझे है, झूठे है । भविष्य की शायद ही कोई पीढ़ी जनता के रूप में इस पर विश्वास करे । सभ्यता के इस मुकाम पर अराजकता किसी भी कीमत पर अब जीवन का मर्म नहीं हो सकता । वह जीवन का रहस्य कभी था ही नहीं । यदि नक्सलवाद यही कहता है तो इसका साफ मतलब है कि नक्सलपंथी अराजक हैं । क्या जनता को जंगली-सभ्यता की ओऱ लेजाना ही उनका ध्येय है ?


नक्सली तर्क गढ़ते हैं, थोथी सहानुभूति पाने के लिए, कि वोट नहीं देने पर अर्धसैनिक बल और पुलिस मतदाता का दमन करते हैं । वे यह क्यों भूल जाते हैं कि वे भी दमन के सहारे ही मतदाता को मतदान करने से रोकते हैं । बस्तर का तो यही इतिहास रहा है । चुनावों में सारे देश की यही तस्वीर रही है । उनका यह कहना भी फर्जी है कि जनता को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ देने का वादा करने वाली सरकारें केवल वोट के लिए राजनीति करती हैं, जबकि वे इसके पीछे अपनी जेबें भरते हैं । आख़िर एक भ्रष्ट राजनीतिक की तरह वे भी यही भ्रष्ट तरीके अपना रहे हैं लगातार । क्या वे अपने लक्ष्यों के लिए पूर्णतः नैतिक बने हुए हैं । जो हिंसक होगा, आतंककारी होगा उसका लक्ष्य नैतिक हो ही नही सकता । नक्सलियों का हालिया बयान इतना द्वंद्व भरा है कि कोई ही उस पर शायद विश्वास करे । क्योंकि वे जनता की सरकार की माँग भी करते हैं । यानी उनकी मांग का एक हिस्से में सरकार नामक अवधारणा भी है औऱ वे उस सरकार के चयन के लिए बाधा भी खड़ा करते हैं । कितनी दोगली दृष्टि और सोच है नक्सलवादी वैकासिक सिद्धांतों का ।


नक्सलवाद का सारा ढाँचा असत्य, हिंसा, आंतक, धन, भ्रष्टता पर टिका हुआ है जहाँ उनके कथोपकथनों की कोई विश्वसनीयता नहीं है । एक और उदाहरण हाल का ही देखें - कुछ दिन पहले बस्तर के नक्सलियों ने कहा कि वे सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं । किसने, किसने कहा ? किसी को भी समझ में नहीं आया । वस्तुत यह बात सिर्फ़ मीडिया के श्रीमुख से ही आयी थी । वस्तुतः न नक्सलियों के प्रवक्ता ने मुख्यमंत्री से कहा, न राज्यपाल से न ही गृहमंत्री या पुलिस महानिदेशक या गृह सचिव से । उनकी ओर से किसी भी उचित स्तर तक न कोई पत्र आया था न ही टेलिफ़ोन-मोबाइल । यह एक सच है । दूसरा सच यह है कि ठीक उसी दरमियान नक्सली लगातार आदिवासियों को अपनी गोलियों का शिकार बनाकर मौत के घाट उतार रहे थे । प्रश्न उठता है कि वे मीडिया का सहारा लेकर ऐसा क्यों कर रहे थे ? प्रश्न यह भी उठता है कि क्या जिसने बयान दिया था वह अधिकृत था । क्या वह सारे नक्सलियों का नेतृत्वकर्ता था ? माओवादी रणनीति के तहत वे ऐसा तब-तब करते हैं जब किसी स्तर पर कमजोर पड़ रहे होते हैं । यह एक तरह का सरकार, पुलिस बल का ध्यान बाँटने की कला है । ताकि रणनीतिकार को सुरक्षित बने रहकर हिंसक क्रांति जारी रखने का मौक़ा मिल जाये । यह दूसरे मायने में जनता की झूठी सहानुभूति प्राप्त करने का भी उद्योग है कि जनता राजनेताओं पर शंका-कुशंसा करने कि – देखिये राजनेता भी उसकी सुनवायी नहीं कर रहे । उनका सारा सिद्धांत झूठ और फरेब पर टिका है क्योंकि वे एक ओर प्रजातंत्र का विरोध करते हैं दूसरी ओर उसकी सारी इकाईयों की ताकतों का सहारा भी लेते हैं । सलवा जुडूम के विरोध में कोर्ट का सहारा लेना भी उनकी इसी धूर्तता का नमूना है ।


क्या अब वह समय नहीं आया है कि ऐसे भ्रमों, भ्र्रांतियों, फर्जी आचरणों का प्रकाशन ही न हो और इसके लिए मीडिया को भी खासतौर पर सोचना होगा कि उनकी किन मुद्दों तक जनता की पहुँच हो, और किन तक नहीं । विज्ञप्तियो के सहारे जनता का कल्याण करने की ऐसी बुद्धिवादी कोशिशों को कब तक आख़िर जायज ठहराया जायेगा । ऐसी गतिविधियों को भी प्रजातंत्र की सुरक्षा के लिए प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए । जो संगठन प्रजातंत्र में प्रतिबंधित हो उसकी आवाज को प्रचारित करना भी प्रतिबंधित होना चाहिए । इसे अभिव्यक्ति के नाम पर मान्यता देना प्रजातंत्र को ध्वस्त करने की संभावनाओं को भी तवज्जो देना होगा ।

Wednesday, November 26, 2008

सिपाही क्यों नहीं लिख सकता कविता ?

भाग-
कई बार लगता है कि उन लोगों की कोई नोटिस नहीं लेना चाहिए जो ये नहीं समझते कि वे कह क्या रहें है ? कर क्या रहे हैं ? क्यों कह रहे हैं ? क्यों कर रहे हैं । उनके ऐसे करने का क्या अंजाम हो सकता है । ऐसे लोगों को कई बार मन और मनीषा दोनों ही नकार देती है कि कौन उलझे मूर्खों से । शास्त्रों में भी कहा गया है कि उपेक्षा सबसे बड़ा अपमान है । पर यहाँ प्रसंग अपमान का नहीं है । न ही किसी के अपमान या निंदा मेरा उद्देश्य भी । वैसे ऐसे लोग सर्वथा इतने अंहकारी होते हैं कि उन्हें ऐसा करने, कहने से नहीं रोका जा सकता । दरअसल वे ऐसा इसलिए नहीं करते, कहते या लिखते क्योंकि वे ऐसा कहने का अधिकार रखते हैं या उनमें इतनी नैतिक शक्ति होती है कि ऐसा वास्तविक में कर सके । ऐसे लोग दरअसल अपने मन की क्षुद्रताओं के शिकार होते हैं । सच कहें तो ऐसे लोगों के पास आईना ही नहीं होता, जिसे हम ज़मीर कहते हैं । जिस पर किसी दार्शनिक ने भी कहा है कि औरों के साथ वही करें, जो आप अपने लिए सह्य मान सकते हैं । और यह सब एक पढ़ा-लिखा आदमी, जिसे सभ्य, विचारवान, आदि संज्ञाओं से भी विभूषित कर सकते हैं, जानता भी है; पर अपने जीवन में उतारता भी नहीं है । तो आख़िर ऐसे लोगों को मूर्ख, अहंकारी, शैतान की श्रेणी में क्यों ना रखा जाये । वैसे अनौचित्य कहने, करने, लिखने और कुछ हद तक जीने वालों से यह दुनिया पटी पड़ी है ।

उडिया भाषा में एक कहावत चलता है – जाणू जाणू न जाणू रे अजणा । मतलब इसका यही है कि जानबूझकर भी नहीं जानना । शायद इन्हीं लोगों के लिए हमारी संस्कृति में पशु शब्द प्रयुक्ति की पंरपरा है । पशु के पास चेतना नहीं होती । अन्यथा वह सब कुछ होती है जो मनुष्य के पास होती है । चेतना के कारण ही मनुष्य पशु से भिन्न है ।

पर यहाँ तो प्रसंग कुछ अलग है । उसे बिना नोटिस लिये भी ठीक किया जा सकता है । उपेक्षा करके । पर उसकी उपेक्षा उस तरह की नहीं होगी जैसै हम कभी-कभी अपने किसी अल्पबुद्धि वाले भाई, बहुत छोटे बेटे या मूढ़ मित्र की उपेक्षा इसलिए कर देते हैं कि उसे मौक़ा देखकर कभी भी ठीक किया जा सकता है ।

तो आइये आपको प्रसंग के मूल में ले चलूँ जिसमें राज्य के किसी युवा नागरिक को किसी व्यक्ति की स्वीकृति कवि के रूप में नहीं चाहिए । उस नागरिक को सिर्फ़ एक सिपाही चाहिए । यानी कि कोई सिपाही है और कविता लिखता है तो उससे उसकी कोई दिलचस्पी नहीं । इतना ही नहीं उसे इतना अंहकार है कि वह उसकी कविता कर्म पर बड़े ही अपमान जनक ढंग से कवितायी (?) शिल्प में लिखता भी है कि वह उसे कवि के रूप में अपना नहीं सकता । वह एक सिपाही के बतौर ही उसे अपना सकता है ।

आप भी शायद ऐसे अनर्गल, बेबुनियाद पर बसर करने वाले वाक्-वीर जिसे अपनी अल्पज्ञता पर भी लाज न आये पर तरस खायें । यदि आप उन महानुभाव जैसे ही हों तो मुझे आपसे कोई अपेक्षा नहीं ।

पर मैं जानता हूँ कि दुनिया का कोई भी व्यक्ति इतना अनपढ़ नहीं, इतना विवेकहीन नहीं जो यह कह दे कि सिपाही को कविता नहीं लिखना चाहिए । कविता के लिए व्यवसाय निर्धारण की यह कौन-सी मनुस्मृति है जो यह घोषित कर दे कि अमूक को कविता नहीं लिखना चाहिए और अमूक को लिखना चाहिए । दरअसल यह मध्यकालीन मानसिकता का परिचायक है जिससे हमारा अंतःकरण मुक्त ही नहीं हो सका है या नहीं होना चाहता है ।

ऐसा उद्-घोष करने वाला युवा चाहता है कि ऐसा सिपाही कितना बड़ा कवि क्यों ना हो, कितनी सार्थक रचना क्यों ना करता हो, मानवता की कितनी गंभीर लड़ाई लड़ता क्यों ना हो रचनात्मक स्तर पर, किन्तु ऐसे रूप में उसे समाज नहीं स्वीकार सकता । भई क्यों नहीं स्वीकार सकता ? क्या सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगाया है ? क्या आपके संविधान में उसकी मनाही है ? क्या उस सिपाही का मन नहीं है ? क्या कानून के पास हृदय ख़रीदने की औका़त है ? क्या उस सिपाही के चौबीसों घंटे सिर्फ़ और सिर्फ़ आप जैसे सिरफिरे और नासमझ युवाओं की हरकतों पर निगरानी रखने और उसे रोकने के लिए हैं ? और यदि ऐसा है तो फिर आप कब यह भी ना कह दें कि उस सिपाही को मुक्त हवा में साँस नहीं लेना चाहिए । स्वप्न नहीं देखना चाहिए । यथार्थ को चुपचाप आँखें बचाकर नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए या उसके विरूद्ध संघर्ष नहीं करना चाहिए । जैसे संघर्ष मन से नहीं केवल लाठी, बल्लम, भाला, त्रिशुल, बम, बारूद या तोप से ही किया जाना चाहिए.... । और यदि संघर्ष की यही परिभाषा सर्वमान्य है तो फिर आख़िर क्यों ऐसे अस्त्र-शस्त्र के रहते मानव संघर्ष पर विराम नहीं लगता, नहीं लग सका ?
आप सोच रहे होंगे कि आख़िर किसने कह दिया कि सिपाही नहीं लिख सकता कविता... फिलहाल तो इतने पर बात ख़तम करना चाहता हूँ बाक़ी अगली बार...
क्रमशः......

Tuesday, June 17, 2008

जो स्कूल में नहीं होते वे सिर्फ़ बाल मज़दूर होते हैं


हम कभी गंभीर नही रहे कि हर बच्चा पाठशाला में रहे । शिक्षा के लगभग सभी संकल्पों, मसविदों, प्रस्तावों, आयोगों ने हर कोण से सभी के लिए प्राथमिक शिक्षा को अपरिहार्य माना फिर भी 6 से 14 वर्ष आयु समूह के सभी बच्चों की अनिवार्य दाखिले को अब तक सुनिश्चित नहीं सके हैं । वस्तुतः हम बच्चों की शाला से अंतरंगता के निहितार्थों को कई दशक बाद भी अपनी मनीषा में प्रतिष्ठित नहीं कर सके हैं । अपनी नपुंसक काहिली के दबाब में हम नैतिक उत्तरदायित्वों को तंत्र के मत्थे जड़ देते हैं । इस ‘हम’ में सिर्फ़ अनपढ़ और गरीब जनता ही नहीं, बल्कि हितनिष्ठ प्रभु वर्ग, बासी विचारों के उबटन में मुग्ध बुद्धिजीवी, सुस्त शिक्षाशास्त्री, पश्चिम दुनिया की योजनाओं के दीवाने रणनीतिकार, केवल सनसनीखेज़ तलाशती मीडिया और धोखेबाज राजनीतिक समूह भी हैं । सिंहावलोकन करें तो ये सारे यही पाठ पढ़ाते दिखाई देते हैं कि हम सिर्फ़ अपनी गरीबी को नियति मानकर व्यवस्था से चिढ़ना सीखें या फिर थकहार कर संकटमोचन चालीसा का पाठ करें पर स्वयं कुछ न करें ।गोया त्रासद अशिक्षा के रावणों और कंसो से मुक्ति के लिए सिर्फ अवध या मथुरा के ईश्वरों और उनके क्षत्रपों की ओर टकटकी लगाकर निहारना ही अंतिम रास्ता हो । यह प्राथमिक शिक्षा के प्रजातांत्रिकीकरण में यथास्थितिवादिता और वर्चस्ववादिता का स्थायी संस्कार नहीं तो और क्या है ?


वैसे सरकारी पहल पर संपूर्ण दाख़िला हेतु बकायदा हरसाल जून-जुलाई माह में शाला-प्रवेशोत्सवी सज-धज होती है । ऐसे उत्सवों की दाल में नये सीखों का तड़का मारा जाता है । उसमें अनुप्रयोगों का नया मिर्च-मशाला भी डाला जाता है । अचेतन और सुस्त मानसिकता वाले राजनीतिक गलियारों में सभी के लिए शिक्षा की राजनीतिक प्रतिबद्धता का स्मरण कराया जाता है । अन्य दैनंदिन औपचारिकताओं के बीच स्पेस निकालकर शिक्षा-तंत्र इसे एक अभियान का रूप देता है । तंत्र मानती है कि पालकों और स्वयं बच्चों से संपर्क और प्रेरणा के बल पर उन्हें शाला से जोड़ा जा सकता है या फिर वे शाला त्यागे बिना किसी कक्षा की संपूर्ण शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं । वैसे शालाप्रवेशोत्सव से एक औपचारिक वातावरण तो निर्मित होता है किन्तु यह सरकारी रूप में होता है असरकारी रूप में नही । फिर भी कुछ बच्चों को पाठशाला-परिसर में दाख़िल कराने से हम हर साल चुक ही जाते हैं । आख़िरकार ये कुछ, जो कुछेक नहीं बल्कि लाखों में होते हैं घुमा-फिराकर बालश्रमजनित कार्यों में धकेल दिये जाते हैं । क्योंकि ऐसे अल्पकालिक अभियान उत्सवी-दृष्टि या फिर तदर्थवाद के शिकार हो जाते हैं । यहाँ जोर आँकड़ों पर होता है वास्तविक उद्देश्यों पर नहीं । यह हमारे दर्जसंख्या वृद्धि अभियानों की वास्तविकता है।
हम अपने नौनिहालों की अशिक्षा के महाप्रश्नों लिए सुने-सुनाये और गैर परीक्षित तर्कों का सहारा लेकर अपना पिंड छूडा लेते हैं । यह हमारी नागरिकता के हीन बोध और विचारहीनता का ही तक़ाजा है कि गरीबी, शैक्षणिक साधनों के अभावों को ही अपनी अशिक्षा के कारणों में तलाशते हैं । यह सरासर झूठ है कि गरीबी प्राथमिक शिक्षा को हतोत्साहित करती है । कोई गरीब माँ-बाप नहीं चाहता कि उसके बच्चे उसकी पीड़ाओं और दंशो का उत्तराधिकारी बनें । वह इसीलिए शिक्षा को अपनी स्थिति को पलटने का अस्त्र मानता है । माहौल मिलने पर गरीब से गरीब माता-पिता अपने बच्चों का भविष्य सुधारने के लिए अनेक त्याग करने को तत्पर रहता है । फिर ऐसा कौन बच्चा होगा जो अपने साथियों को स्कूल में जाते देखकर भी बकरी चराने जाने, मालिक के घर में नौकरी करने की ज़िद करेगा । अपने लिए श्रेयस्कर मानेगा । शायद कोई नहीं । वह मजबूर नहीं होता । पालक, मालिक और समाज तीनों मिलकर उसे मजबूर बना देते हैं । वह बाल मजदूर बन जाता है । ऐसे लोग उसके बालश्रम को गरीबी निवारण में योगदान मानते हैं । ऐसे वक्त क्या वे एक बच्चे के भविष्य की समस्था संभावनाओं का रास्ता नहीं रोकते होते हैं ?


प्राथमिक शिक्षा की अनिवार्यता के पीछे न तो परिवार और ग़रीबी की कड़वी सच्चाई है न ही परिवार के अर्थोपाजन में बच्चों की बांछित सहभागिता का प्रश्न कि ऐसे बच्चे चाहकर भी शाला से नहीं जुड़ सकते । शिक्षा के प्रति अभिभावकीय उदासीनता, शिक्षा तंत्र की कुव्यवस्था, रोजी-रोजगार में शिक्षा की असंगतता और असमर्थता आदि सारे तर्क भी अबोध और रटे-रटाये हैं जो हमारी नकारात्क मानसिकता की ग्रहणशीलता के परिचायक हैं जिससे शत-प्रतिशत प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य को हम हस्तगत नही कर पाये हैं ।


जो बच्चे स्कूल से बाहर होते हैं वे कुल मिलाकर बालश्रमिक ही होते हैं । चाहे वे वेतन हीन या परिवारिक कार्यों में हाथ बटायें या फिर किसी कठिन या सरल कार्य से रोजी अर्जित करें । ये भविष्य के गरीब ही होते हैं । हर तरह का बाल श्रम बच्चे के संपूर्ण विकास तथा बढ़ोतरी को नुकसान पहुँचाता है । किसी भी तरह के बालश्रम का समर्थन प्राथमिक शिक्षा के व्यापीकरण का विरोध ही है । बालश्रम का संपूर्ण उन्मूलन ही प्राथमिक शिक्षा के सार्वजनीकरण का मूल रास्ता है । बालश्रमिकों के नाम पर पृथक और समानांतर परियोजना भी इसका विकल्प नहीं है । ऐसा माने बिना सभी बच्चों को पाठशाला के रास्ते पर नहीं लाया जा सकता । यदि यह सच नहीं होता तो रंगारेड्डी और आंधप्रदेश के हजारों गाँवों में इस दर्शन के सहारे शत-प्रतिशत बच्चों को शाला में लाया नही जा सकता और न ही वे निरंतर आगे की कक्षाओं में जाते । छत्तीसगढ़ भी यदि वास्तव में अपने सारे बच्चों को स्कूल में देखना चाहता है तो क्या उसे एम.वी. फाउंडेशन की उस रणनीति पर फिर से विचार नहीं करना चाहिए जिसे वह अराजक मानने का भूल कर चुका है पर जिसे मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु दिल से अपनाकर अधिक से अधिक बच्चों को पाठशाला तक पहुँचा चुके हैं ?

Tuesday, June 10, 2008

सबरंग में कौन

11 जून व्यस्ततम दिनों में से एक निकला ।
आदित्य जी का ई-पत्र आया है और फोन भी । ई-पत्र ज़रा विलंब से पढ़ सका । यानी आज । क्योंकि कल दिन भर दिल्ली से प्रकाशित सोपान नामक मासिक पत्रिका से जुड़े मित्र उमाशंकर मिश्रा के साथ लगा रहा । सोपान ग्रामीण विकास की मीमांसा करने वाली स्वयंसेवी संगठन की पत्रिका है । पठनीयता भी है उसमें । बायलैग्वल है – हिंदी और अँगरेज़ी में छपती है । उमा बता रहे थे अब उड़िया भाषा में भी वह पढ़ी जा सकेगी । जेट्रोफा की खेती को लेकर जिस तरह का शोषण और लूट हुआ है भारतीय किसानों की वह सरकारी नीति के दोगलेपन की चुगली तो करती ही है । इस माह के अंक में उसकी परत दर परत पड़ताल की गई है । मित्र को धन्यवाद जो उसने पत्रिका की एक प्रति मुझे भी भेंट की और कुछ लिखने का आग्रह किया । मानसून आ धमका है शायद इधऱ । फुहार की भाषा से तो यही लग रहा था । मित्र आया तो मुझे स्कूटी में बैठकर शहर घूमने और भींगने का आनंद भी मिल गया । शुक्र है कि सर्दी नहीं लगी । मित्र सलवा जुडूम यानी नक्सलवाद के खिलाफ बस्तर मे चल रहे आंदोलन (आदिवासियों के द्वारा) का जायजा लेना चाहते हैं । बस्तर जाने की भी उनकी इच्छा है । वैसे तो बस्तर मे पत्रकारों को नक्सली नहीं सताते । पर क्या पता कब क्या हो जाये । उनकी इच्छा थी कि मैं भी साथ चलूँ । पर... कल रायगढ़ जाना है ।


अथ आदित्य उबाच.....
लिखते हैं कि बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी..... । भई क्यों नही जायेगी ? और क्यों नहीं जाना चाहिए ? बात इसीलिए तो की जाती है कि वह कहीं तो जाये । मैं उनके पत्र में खो जाता हूँ.....
आज से १० वर्ष पहले एक भारतवासी उच्च शिक्षा हेतु अमेरिका आया था, यहाँ आकर उसे लगा उसकी हर तमन्नाएँ पूरी हो जायेगी और जुट गया सपनों को पूरा करने में । फिर भी भीड़ मे कहीं ना अपने को अकेला महसूस कर रहा था । आख़िर मिल गयी एक सुनने एवं समझनेवाली एक रूसी बाला । चढ़ गया प्रेम रंग और चल पड़ी जीवन की नौका । बड़े गर्व से यात्रा कर आया भारत । साथ मे रूसी पत्नी जो थी । पाँच वर्षों मे एक पुत्र की प्राप्ति हुई साथ-साथ रूसी बाला को ग्रीन कार्ड भी मिल गया । ग्रीन कार्ड प्राप्त होते गोरी के नखरे शुरू हो गए, भारतीय भोजन, मित्र, संगीत सब उसे अब सरदर्द साबित होने लगे । बेचारा भारतवासी असमंजस मे आ गया, उसके सारे भारतीय मित्रों पर रोक लग गयी, अपने ही घर में चावल-दाल-सब्जी तक पकाने की मनाही ।पूजा-पाठ के सामान सब गराज मे रख दिए गए ।
भारतीय होने के नाते उसने लाख कोशिश की पर कोहरा और घना होता चला गया । आख़िर वही हुआ जिसका डर था तलाक-डिवोर्स ।


आज स्थिति यह है कि अपने ही पुत्र को कोर्ट के आदेशानुसार मात्र शनि एवं रविवार रख पाता है । पुत्र जोशुआ सोम से शुक्र अपनी मम्मी के साथ रूसी जीवन जीता है और फिर शनि-रवि टूटी-फूटी हिन्दी में अपने भारतवासी पिता के साथ ।
सचमुच अमेरिका मे विविधताओं की कमी नही ....................


आख़िर भारतवासी की माँ भी अमेरिका अपने पौत्र को देखने पहुंची , कहते है भाषा एवं माँ -निश्छल होती है । अपने पौत्र का अभिनन्दन तिलक-टीके से किया पर रूसी बाला को यह भी एक जादू-टोना का तिल्स्सम सा लगा भारतीय संस्कृति की हर परम्परा दिन ब दिन अस्वीकार कर कर दी गयी और रूसी बाला का स्वार्थ से भरा चेहरा साफ दिखने लगा । अमेरिका मे ऐसी घटनाएँ ही भारतवंशियों के मन मे कई संशय भरे प्रश्न खड़ा कर देते हैं ।


आज इतना ही फिर कभी.....अमेरिका की विविध तावों पर कुछ न कुछ लिख भेजा करूंगा ।
अब इस यथार्थ को लेकर कुछ प्रश्न भी न उठें तो बात भी कैसे दूर तक गई । इस वक्त मन में बहुत उमड़न-घुमड़न है ।


सबरंग पर पूर्णिमा दीदी...
आदित्य जी का आग्रह है कि मैं रेडियो सबरंग पर पूर्णिमा वर्मन की गुच्छा गुलमोहर का पारूल की आवाज़ मी एक बार सुने । वे पूर्णिमाजी का टेलिफून नम्बर भी चाहते हैं । बतियाने के बड़े विश्वासी जो हैं आदित्य । अब मैं उन्हें कैसे समझाऊँ कि दीदी संपूर्णतः अंतर्मुखी हैं । विदेश में भी रहकर भारतीयता को दिल से जीती हैं । हमारे जैसे फटीचर भाई को भला कैसे फोन नम्बर दे सकती हैं । वैसे दीदी जब शादी होकर चली जाती है ससुराल तो वह भाईयों की नही रह जाती । दोस्तों की नहीं रह जाती । कई बार वह अपने माँ-बाप की भी नही रह जाती । वह अपने नये परिवार के आदर्शों और मूल्यों पर स्वयं को अधिनियंत्रित करती है । चाहे दुख से या फिर चाहे निजी संस्कारों या इच्छा से । कई बार फोन नम्बर देना भी सिरदर्द साबित हो जाता है । फिर दीदी का बड़ा काम है हिंदी अंतरजाल पर । रात दिन लगी रहती हैं । वैसे मैं आदित्यजी को यह बताना चाहूँगा कि दीदी पहले मुझसे बहुत सारी रचनात्मक बातें कर लेती थी । पर पता नहीं क्यों अब चुप्पी साध ली हैं । मुझे लगता है यह तब से हुआ जब से मैं सृजनगाथा के संपादन में व्यस्त रहने लगा । खैर...

Friday, June 06, 2008

अमेरिका में सामाजिकता निश्चित नहीं ?

फिलहाल अमेरिकन समाज में सामाजिक संबंधों की हालात पर अंतिम निष्कर्ष निकालना कठिन हो गया है । ख़ासकर स्त्री-पुरुष संबंधों पर मुझे दो-दो राय और दो तरह की राय मिली हैं । यह दीगर बात है कि दोनों एक दूसरे को तीर्यक रेखा पर नही काटती पर कहीं न कहीं दोनों की राय से मुझे लगता है अब विवेक का सहारा लेना पड़ेगा । अमेरिका में प्रवासी जीवन बिताना बहुत कठिन लगता है । सामाजिक भविष्य वहाँ कितना सुरक्षित है, कहा नहीं जा सकता । उत्तरआधुनिकता वहाँ से कब की गुज़र चुकी है । अब लोग उससे आगे के जीवन-दर्शन पर केंद्रित हैं या उसकी तलाश में हैं । मैं ठहरा भारतीय जिसे अभी-अभी चार-छः साल हुए उत्तरआधुनिकता के बारे में पढ़ने-सुनने को मिल रहा है । वह भी मात्र साहित्य में । मैं समझ नहीं पाता कि उत्तरआधुनिकता के बाद कौन सा समय आयेगा ? क्या उत्तर-उत्तर आधुनिक समय आयेगा !

मेरे आसपास तो ठीक तरह से आधुनिक समय भी नहीं आ सका है तब कब वहाँ उत्तर आधुनिक समय आयेगा । आज भी लोग और समाज सामाजिक मूल्यों पर जीते हैं । केवल आधुनिक कहलाने की गरज़ से ही कुछ पारिवारिक संबंधों और दैहिक संबंधों के बारे में उन्मुक्त जीवन को तरजीह देते हैं । वैसे उन्हें भी इसका सच्चा अनुयायी नहीं माना जा सकता है । क्योंकि वे अपने एकांत क्षण में एक माता-पिता के रूप में अपराध-बोध से गुज़रते हैं । प्रेम-विवाह मूलतः शहर का रोग है । अइसमे सहशिक्षा का भी योगदान है । समलैंगिकता अभी बहुत दूर है भारत से । जबकि अमेरिका में यह कानूनी रूप धारण करता जा रहा है । दैहिक सुख के पीछे विपर्यय आकर्षण है । इसमें पुरुष और स्त्री की अनिवार्यता है । किसी भी दर्शन के नाम पर उसे हम भारतीय शायद ही समर्थन दें । विवाह को हम एक संस्कार मानते हैं । प्रेम विवाह को भी हम भले ही असामाजिक दृष्टि से लेते हैं पर वैदिक काल और उसके बाद भी ऋषि पंरपरा में उसके चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते हैं ।

आदित्यजी ने लिखा है-
जय प्रकाश,
चलिए मन के अवकाश मे अच्छी बातें कर लेते हैं, आख़िर ब्लॉग का सदुपयोग तो हो रहा
लावण्या जी मुझसे ज़्यादा अनुभवी हैं अत: उनकी हर बात का स्वागत है वैसे अमेरिका कि या किसी देश कि बातें तो हरि अनंत ,हरि कथा अनंता .... जैसी है ?

मैं जब नया-नया अमेरिका मे अपनी पुत्री का स्कूल मे नामांकन कराने गया था तो ऑफ़िस में
पूछा गया कि - आप किस तरह के पिता है ? प्रश्न मेरे लिए अटपटा था । फिर उन्होंने पूछा कि -
१.आप नैचुरल पिता है या
२.सौतेले या
३.गोद लिए हुए ?
एक भारतीय के लिए आप स्वयं सोचें क्या मन :स्थिति होती होगी

यहाँ अमेरिकन मित्रों को एक बार भारतीय शादी की विडियो दिखाई थी, लड़की को फूलों से सजे बिस्तर पर शरमाई-सी बैठी देख सभी ने पूछा कि -क्या लड़की इस शादी से खुश नही ? क्यों चुप सी बैठी है ?
इसे क्यों फूलों के पिंजरे मे बंद कर रखा है ? कौन समझाए इन्हें शर्म-लज्जा कि बात ।

चलिए बातें बहुत है, क्रमश: .......... मंगल कामनाओं के साथ
आदित्य प्रकाश
डैलास

और उधर लावण्याजी का अभिमत है -
अमरीका हो या भारत, एक ही बात हम किसी भी विषय के बारे में नहीं कह सकते ! हर विषय के अपवाद हमेशा ही रहते हैं --अमरीका मेँ कई तरह की विडम्बनाएँ, विषमताएँ, कठिनाइयाँ, यहाँ के रोज के जीवन का हिस्सा हैं – सुख-सुविधा, आधुनिकता के साथ-साथ एकाकीपन, विलुप्त होते पारिवारिक रिश्ते, एक खालीपन, हिंसा, अत्याधिक खुलेपन से उत्पन्न होते टकराव्, व्याभिचार, समलैंगिक संबंध, शराब्, नशीले पदार्थों का सेवन, समाज के लिये, भविष्य के लिये क्या लायें गेये सोचनेवाली बात है"....

यहाँ सामाजिक विषमताएँ ऐसी हो चलीं हैं जिनसे ये एक डर लग रहा है की तथाकथित सामाजिक व साँस्कृतिक मूल्यों का क्या होगा ?
लावण्या जी से विस्तार से पूछना ही पड़ेगा कि वे निजी तौर पर क्या परिवर्तन देख चुकी हैं ? आगे किस तरह का समाज वहाँ विकसित हो रहा है ? क्या इस अनिश्चितता की आँधी में सब कुछ उड़ जायेगा ? भारतीयता भी ? जो अभी वहाँ गर्व से कह पाते है कि वे अमेरिका में भी रहकर मन और आत्मा से भारतीय बने हुए हैं.....

कामचोर इसे ना पढ़ें..

कर्मण्यता वाले मुद्दे मे कुछ अन्य प्रसंगों पर लावण्या दीदी सहमत नहीं है । वैसे उनकी असहमति से भी सहमत हुआ जा सकता है और माना भी जा सकता है कि अमरीका एक ऐसा देश है जहाँ के लोगों कार्यक्षमता, सफलता, इच्छाओँ को पूरा करने, ज़िंदगी को अपने तरीके से जीने की कोई सीमा ही नहीँ । वे अमेरिकन शादी के अन्य पहलूओं पर भी जैसे समलैंगिक विवाह पर भी ध्यान बंटाना चाहती हैं । मैं उस पर भी चर्चा करना चाह रहा था । खासकर भारतीय मूल के परिवारों में युवक-युवतियों की मानसिकता पर..


इस बीच यानी पिछले दो तीन दिनों में चाहकर भी उनसे इस मुद्दे पर विमर्श नहीं कर सका । पर करूँगा ज़रूर । फ़िलहाल तो सुधीर नारायण शास्त्री जी को बधाई देने का मन कर रहा है । सुनेंगे तो आप भी उन्हें तहेदिल से बधाई दिये बिना नहीं रहेंगे । हाँ, बहानेबोजों, कामचोरों, सुस्त लोगों को इससे ज़रूर अरुचि हो सकती है । हो भी क्यों नहीं –

अजगर करे ना चाकरी, पंछी करे ना काम
दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।

..... पर शास्त्रीजी ने इसे पलटकर रख दिया है । वे कभी भी दाता राम के भरोसे नहीं रहे जबकि वे स्थायी रोजगार पर थे । रोज काम किया । पूरे समय काम किया । हरदम काम किया । बिना थके, बिना रुके । ऐसे ही लोगों के लिए गीता में ‘कर्मयोगी’ प्रयुक्त हुआ है । कृष्ण भी यही चाहते थे कि हर मनुष्य कर्मयोगी बने । जिसे जो भूमिका मिली है उसी को संपूर्णतः जीना ही कर्मयोग है । इस कर्मयोग को शास्त्रीजी ने अपनी कठिन साधना और अटूट विश्वास से साबित कर दिखाया है ।


अलाल सरकारी कर्मियों, नौकरशाहों, अंधे राजनेताओं पर खिसियाते-खिसियाते थक जाने वाले समय में मेरे लिए यह ठीक उसी तरह है जैसे भरी दोपहरी वाली यात्रा में कोई झरना दिख गया हो । शांत, स्निग्ध जल से आपुरित ।

ऐसे किसी कर्मयोगी के बारे में मैंने आज तक नहीं सुना जो जीवन भर नौकरी करता रहे और एक भी दिन अवकाश पर भी न देखा जाय । इस नेक ख़बर के अनुसार बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग [बेस्ट] की समिति के पूर्व सचिव सुधीर नारायण शास्त्री ऐसे ही एक सरकारी कर्मचारी रहे हैं, जिनका नाम छुट्टियाँ न लेने के लिए गिनीज बुक आफ व‌र्ल्ड रिका‌र्ड्स के लिए प्रस्तावित किया जा रहा है।


हो सकता है कि इस समाचार से बहुत सारे भारतीय सहमत न हों और वे यह कहते हुए देखे जायँ कि हूँह – यह तो रिकार्ड के नाम पर किया गया काम है । परंतु इसे मात्र रिकार्ड बनाने की गरज़ से देखा जाना कर्मयोग की तौहीनी होगी । यह कर्मनिष्ठा है जिसकी आज भारत को महती ज़रूरत है । इसके बग़ैर उन्नति के शिखरों को स्पर्श करना कठिन होगा । हर स्तर पर ।

शास्त्री 1977 से बेस्ट की सेवा में आये । एक नवंबर, 1990 को बेस्ट समिति के सचिव का पदभार ग्रहण करने के बाद से अपने अवकाश ग्रहण की तारीख के बीच उन्होंने रविवार के अलावा सिर्फ़ एक अवकाश लिया। वह भी तब जब वे बीमारी के कारण वह चलने-फिरने की स्थिति में भी नहीं थे।

अपने संपूर्ण कार्यकाल के दौरान वह प्रतिदिन 12 से 14 घंटे काम करने के लिए जाने जाते हैं। बधाई और प्रणाम उनकी पत्नी शैलजाजी को भी जिन्होंने काम के प्रति अपनी पति की प्रतिबद्धता को देखते हुए उन्हें छुट्टी लेने के लिए कभी अपने किसी दबाव के घेरे में नहीं लिया ।


शायद ही कोई कामकाजी पति इतना भाग्यशाली होगा जिसकी पत्नि शैलजाजी की तरह नाज़ नखरा न करती हो । गलती से ऐसे जोड़े यदि अपने गाँव शहर से दूर किसी सेवा या नौकरी में हों तो पूछिए मत । ऐसे परिवारों में आये दिन किसी न किसी नये जगह की सैर के लिए विवाद होता रहता है । छुट्टी के दिन बाज़ार की सैर । पार्क की सैर । मीनाबाज़ार की घुमाई । पति की कर्मठता जाये भाड़ में । कार्यालय का काम जाये भाड़ में । आम आदमी जाये भाड़ में ।
जो भी हो यह कामचोर लोगों के लिए पढ़ने योग्य नहीं है ।
शास्त्री जी आपको मैं नमन करता हूँ । शत्-शत् नमन ।

Tuesday, June 03, 2008

अमेरिका में घास छिलते हैं आदित्यजी

अंतरजाल यानी नयी दुनिया रचने का तकनीक
अंतरजाल को लेकर भले ही पुरानी पीढ़ी लाख कुढ़ती रहे । भले ही जड़वादी मानसिकता के शिकार यानी पुरातनपंथी उसे लाखों कोसते रहें कि उससे मानवीय संबंधों की शुचिता बाधित होगी, आदि-आदि; पर अंतरजाल है बड़े ही काम की चीज़ । वह संबंधों की नयी दुनिया रचने का भी कामयाब तकनीक है । वह ऐसी जादुई बस्ती है जहाँ बेघरबार ठिकाना ढूँढ़ सकते हैं । भले ही वह फैंटेसी जैसा क्यों ना हो, वहाँ अज्ञात और अपरिचित से भी मिलने-बतियाने का वर्चुअल स्पेस है । उसे सिर्फ़ कुंठित और दैहिक बोधों के फ़िलॉल्सपी झाड़कर एकबारगी ख़ारिज़ करना बेमानी होगा । और माना कि वहाँ ऐसा होता भी है तो उसमें स्वयं अंतरजाल का कम, ऐसे लोगों की रूचि और आदत का दोष अधिक माना जाना चाहिए । शुक्लता और कृष्णता कहाँ नहीं है । प्रकृति में भी । चयन का विवेक तो मनुष्य को ही जगाना पड़ेगा । सो इसी कथित विवेक के चलते वर्षों पहले एक दिन हम दोनों टकरा गये और आज आत्मीयता को स्पर्श करते संबंध पर दोनों का विश्वास है । मेरे ई-मित्र को आप आदित्य प्रकाश सिंह के नाम से जान सकते हैं ।


आदित्य पिछले डेढ़ दशक से युएसए के डैलास में रहते हैं । उत्तरप्रदेश स्थायी ठीयां । वे रेडियो सलाम नमस्ते में हिंदी साहित्य से जुड़े कार्यक्रमों के संयोजक हैं । यदि मेरा अनुमान सच है तो यह काम वे शौंकिया तौर पर करते हैं । वैसे पेशे से वे वैज्ञानिक हैं । नेपाल में बड़े बिगड़ैलों को महाविद्यालय में हिंदी पढ़ा चुके हैं । कितना कहूँ उनके बारे में...बड़े ही रोचक और दोस्ती जोड़ू आदमी हैं भाई ।

अंतरजाल के माध्यम से दुनिया भर के कवियों से स्वयं पहल करके बतियाते रहते हैं । कुशल-क्षेम के प्रश्चात जब वे फ़ोन पर ही बानगी की पेशकश करते हैं तो ऐसा कोई कवि नहीं होता जो वहीं मोबाइल या फोन पर न शुरू हो जाय । अमुमन इसी की फ़िराक में ही तो रहता है कवि । पर यदि आप उन्हें प्रवासी जानकर ठग या उलझा नहीं सकते । दूसरों की उत्कृष्ट रचना भी नहीं पढ़ सकते । बड़ों-बड़ों की कविता याद है उन्हें । लगे हाथ वे भी अपनी कविता भी सुना देते हैं । वैसे उनकी अपनी कविता क्या है, जानना चाहेंगे आप ? चलव मैंहीच हा बताये देत हंव (चलिएमैं ही बताये देता हूँ) - रामधारी सिंह दिनकर, गोपाल सिंह नेपाली, महादेवी वर्मा, हरिवंशराय बच्चन, पंत, निराला, जाने कितने नामवरों की कवितायें उन्हें मुखाग्र हैं । दरअसल यही वे कवि हैं जो प्रत्येक भारतीय के उसके अपने कवि हैं । और उनकी कविताएँ एक गंभीर पाठक की भी कविताएँ...


तो.....मैं ठहरा अल्प-मुद्राधारी । चाहकर भी उनसे दूरभाष पर बात नहीं कर पाता । वे ही फ़ोनवा खटखटाते हैं । वैसे मैं फिलहाल यहाँ न तो अंतरजाल पर कुछ बकबास करने वाला हूँ न ही मित्र के बारे में लिखने बैठा हूँ । दरअसल मैं मित्र के बहाने कुछ ख़ास बात रखना चाह रहा हूँ - कि हम भारतीय कितने अलाल हैं ? कि हम भारतीयों में स्वयंसेवा के प्रति कितनी लापरवाही है ? कि हम दैनिक-वृतियों में निजी स्तर पर कितने सक्रिय रहते हैं ?

अमेरिका में घास छिलते हैं आदित्यजी
मूल बात की ओर आपको ले चलूँ तो......परसों भोर से उनका मोबाइल बज उठा – का हो, गुडाकेश, का करत बानी ? वे बता रहे थे – अभी-अभी लॉन का घास छिलकर वे सुस्ता रहे हैं, सोचा आपकी ख़बर ले लूँ, याद से गायब जो नहीं होते हैं ।
मैंने कहा – आप का कह रहे हैं ?
हाँ भाई, मैं घास ही छिल रहा था । - मैं ज़रा आश्चर्य के घेरे में स्वयं को पा रहा था -
मुहावरा फरमा रहे हैं क्या ?
अरे नहीं भई...

वे बोलने लगे – मानस जी, यहाँ हर कोई अपने बँगलों में लॉन की सफाई करता है । यह नित्य-प्रति का कार्य है । और इसमें बुराई भी नहीं....मन भी बहल जाता है... प्रकृति का स्पर्श भी हो जाता है और ज़रा व्यायाम भी । इसमें अमीर से अमीर आदमी भी संकोच नहीं करता....और यही वह सभ्यता है जो अमेरिका को अमेरिका बनाता है । लोग अपने छोटे-छोटे काम स्वयं किया करते हैं । हमें भी अपना देश बहुत पसंद है पर यही वो बात है जिससे अमेरिका हमे अपनी ओर खींचे रखता है और भारत की जीवन-शैली देखकर मन भर जाता है....

अब मेरी बारी थी – ....और हमारे यहाँ घास मज़दूर काटते हैं । चाहे वो लॉन का हो या फिर खेत का । कितना अजीब है कि यहाँ घास काटना छोटा काम माना जाता है । दरअसल घास भारतीय मन में भरा पड़ा है । जो छँटने का नाम ही नहीं लेती । जब घास छँट जाये तो हम भी अमेरिकनों की तरह समृद्ध हो सकते हैं । पर जाने कब छँटेगी यह घास.....


मानस जी, आप भी जानते हैं... भारत में जब कभी बाढ़, भूकंप, महामारी, सूखा आदि आपदायें आती हैं तो आपको छोटे-छोटे बच्च आगे बढ़कर सेवा करते दिखाई नहीं देंगे । अमेरिका में स्कूली बच्चे सहित हर उम्र के लोग आपातकालीन स्थिति में स्वयं बिना किसी अपील, बिना किसी प्रेरणा, बिना किसी राजनीति, बिना किसी स्वार्थ के सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं । भारतीयों ने साधारण जीवन में ऐसा करना सीखा ही नहीं है । उन्हें हम सिखाते ही नहीं । हम जाति, मजहब, धरम, वर्ग, योग्यता, रंग-रूप आदि के आधार पर ही मित्रधर्म निभाने की बात करते हैं । जिस परमार्थ की हम भारतीय बार-बार दुहाई देते हैं वह हमारा दंभ है । दरअसल हम स्वार्थ से उबर ही नही पाये हैं । हम भारतीय मनुष्य को मनुष्यता के नाम पर नहीं उसकी निजी विशिष्टताओं के आधार पर देखते हैं । और यही वह बुराई है जिससे भारतीयों में आपसी सद्भाव भी कम है । कभी मुंबई दहक उठता है और कभी गुजरात ।


मैं मन ही मन सोच रहा था कि अब तो हमारे स्कूलों में भी व्यावहारिक शिक्षा का पाठ मृतप्रायः है । मुझे याद आ रहा था कि कैसे हमें गुरूजी कक्षा से बाहर क्यारियों में फूल उगाना सिखाते थे, छोटी-मोटी खेती कराते थे, गाँव भर में घूम-घूम कर चावल इक्कठा करवाते थे और उसे किसी गरीब बच्चे को भी दिलाते थे । आज तो सामुदायिक भावना के नाम पर स्कूल में सिर्फ खेलकूद ही है जिसे हम सामुदायिक भावना की शिक्षा कह सकते हैं । धीरे-धीरे हमने सब कुछ खत्म कर दिया और आज तो स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि प्राथमिक शिक्षा के लिए भी समाज को मध्यान्ह भोजन का लालच देना पड़ रहा है । क्या हो गया समाज को ? क्या हो गया लोगों को ? यह कैसा समय आ गया है हमारे देश में......


अब तो निजी स्तर पर ही ऐसी कोशिशें की जा सकती हैं । निरर्थक लाज तजकर । अपनी ऐंठ छोड़कर । हम जितने आत्मनिर्भर होगें । विकास का रास्ता उतना ही साफ़ होता चला जायेगा । ऐसे समय जो सबसे ज़्यादा याद आते हैं – उनमें गाँधीजी अव्वल हैं । वे यही तो कहा करते थे । वे दक्षिण अफ्रीका में जब तक रहे अपने लैट्रीन रूम की सफ़ाई स्वयं करते रहे । बा ने आपत्ति जताया – यह आप क्या रहे हैं ? तब गांधीजी ने उन्हें समझाया था कि बा जो अपनी गंदगी धो नहीं सकता वह औरों की गंदगी कैसे धो सकता है ।


अमेरिका में हिंदी पढ़ाये 5000 डॉलर पायें
ऐसा हो ही नहीं सकता कि आदित्य बातचीत करें और उस दरमियान मधुशाला की पंक्तियाँ न कहें । भले ही मधुशाला के रचनाकार बच्चनजी पर तत्समय और आज भी आलोचकों की ओर आरोप लगाया जाता है कि उन्होंने युवा-पीढ़ी को शराबखोरी की ओर धकेला गया, सच तो यह भी है कि मधुशाला की हर पंक्ति किसी न किसी जीवन-दृष्टि का रहस्य खोलती हैं और आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं –

बैर कराती मंदिर मस्ज़िद मेल कराती मधुशाला ।

बात हम अमेरिका में हिंदी की नौकरी की करने वाले थे । आदित्य ने मुझे समझाइस दी कि मैं अमेरिकन दूतावास को निवेदन करूँ कि वे जो मुझे ग्रीन कार्ड देना चाहते हैं उसे नियमित रूप से बाद में विचार करने की श्रेणी में रख दें । क्योंकि अभी अमेरिका में स्थायी रूप से नहीं रह पाने का मतलब फिर कभी नहीं रहने की संभावना का क्षीण होना नहीं है । इसका मतलब कि जब मैं चाहूँ वहाँ आ सकूँ । उनका सुझाव है - मैं चाहूँ तो इसी वीज़ा का फ़ायदा उठाकर अभी अमेरिका में रह सकता हूँ और मुझे हिंदी पढ़ाने के लिए 5000 अमेरिकन डॉलर प्रतिमाह युनिवर्सिटिज दे सकती हैं । वे चाहते हैं कि टैक्सॉस, ऑस्टिन या हार्वर्ड आदि में से किसी को अपना बायोडेटा भेज दूँ । वे मदद भी कर देंगे ।


पाँच साल में तीन शादियाँ
आदित्य बता रहे थे कि यहाँ सभी नौकरी अस्थायी होती हैं पर यहाँ काम या जॉब का अभाव नहीं रहता । वे चाहते हैं कि मुझे विचार करना ही चाहिए...

आदित्य फिर बताते हैं – मानसजी, अमेरिका ऐसा देश है जहाँ जॉब और संबंधों में स्थायी गारंटी कभी नहीं होती । यह अमेरिकनों की आदत भी है । यानी कि सब कुछ अनिश्चित । कम से कम भारतीय मानसिकता में तो ऐसी स्थितियो को अनिश्चित माना जाता है ।

अब वे मुझे पारिवारिक संबंधों की ओर ले चल रहे थे जो पश्चिमी सभ्यता में आम है – वे जहाँ सेवा देते हैं, एक 52 वर्षीया महिला भी है । वह अब तक 3-3 शादियाँ कर चुकी है । इसमें से तीसरी शादी हाल ही में संपन्न हुआ है । माँ जिंदा है । पिछले दिनों वह भी बिगड़ी हुईं थीं । यहाँ क्लब में आते-जाते भी प्यार हो जाता है । यहाँ प्यार का मतलब देहसुख है । भारत जैसा स्थायी भाव कहाँ इसमें ।

मैंने पूछा भाई जी, वहाँ प्रवासी भारतीयों पर इसका क्या प्रभाव हो रहा है ?

- भारतीय लोग ऐसे संबंधों पर कम विश्वास करते हैं । हाँ कुछ पंजाबी ऐसी शादियों में विश्वास करने लगे हैं.... खरबूजे को देखकर कब तक खरबूजा रंग नहीं बदलेगा... आप ही बताइये ना... हम भारतीय खरबूजा जल्दी रंग नहीं बदलेगा... विश्वास किया जाना चाहिए ।

दिनकर और ज्ञान प्रकाश की कविता
वे आगे कहने लगे – मैं सदैव सुंदर बातों के लिए ही चिंता करता हूँ और उसी उद्यम में लगा रहता हूँ ।
‘बड़ा ज्ञान वही जिसमें व्यर्थ की चिंता न हो । बड़ा आदमी वही जो जीवन भर काम करे । बड़ी कविता वही जो मनुष्य आदि भूमि को सुंदर बना दे ।’ - दिनकर की पंक्तियाँ मेरे कानों में विदेशी भूमि से साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थी । आदित्य जी एक दूसरी कविता को लेकर जारी थे...

बंशी की सुरीली आवाज़ दूर से आ रही
कर्ण कुट में मधुर सी लगती
प्रेम भाव जगा रही
सर उठा कर गगन से ताल मिला रही

यह उनके बड़े भाई ज्ञान प्रकाश जी की कविता है जो लंदन मानचेस्टर में 30 वर्षों से चिकित्सक हैं और मन से कवि । खाली रहते हैं तो कवितायी कर लेते हैं । यह उनके बचपन की आदत है । आदित्य बता रहे थे – पहले बड़े भाई ने लिखा था – शांत भाव जगा रही । किशन महराज ने कहाकि शांत भाव को प्रेम भाव कर दो । कविता पूरी मुकम्मल हो जायेगी ।


अरूण प्रकाश जी को बधाई
सच ही है जिस व्यक्ति कें कंधे पर भार हो वही खुशनसीब है । वैसे अब आदित्यजी के सोने का समय हो रहा है पर कुछ खुशख़बरी देना शेष है सो बता रहे हैं -

अमेरिका के हिन्दी प्रेमियों, हिन्दी संस्थानों, प्राथमिक हिन्दी के शिक्षकों एवं हिन्दी के छात्रों को वर्षों से जिस पाठ्य पुस्तक और अभ्यास पुस्तिका की अभिलाषा और आवश्यकता थी, वह पूरी हुई है । 490 पेजों की पूरी तरह रंगीन और दफ्ती की बाइंडिंग की यह पुस्तक और इसके साथ सीडी पर अभ्यास एवं चित्र शब्दावली अब आपके हाथों में है। वर्षों की मेहनत और व्यक्तिगत धन से यह सम्भव हुआ है। आपसे अनुरोध है कि इसको अपनाएं। यह आपको जून में उपलब्ध होगी। दूसरी भाषा के रूप में हिन्दी सीखने के लिए यह पुस्तक अन्य भाषाओं की पुस्तकों के स्तर की है। इस पुस्तक की सामग्री तैयार करने में हिन्दी के वरिष्ठ विद्वान और शिक्षक डाक्टर हर्मन वान ओल्फेंन की महत्त्वपूर्ण सहायता प्राप्त है। क़ीमत 40 डॉलर, अभ्यास पुस्तिका 5 डॉलर और चित्र शब्दावली सीडी की क़ीमत 10 डॉलर है। पूरे सेट की कीमत 50 डॉलर है।

पुस्तक के चित्र कितने सुंदर हैं सचमुच--- अरुण प्रकाशजी आपको कोटिशः बधाई ।