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Monday, July 06, 2009

“वग़ैरह” के भीतर और बाहर

प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह पर विशेष
हमारे बौद्धिक प्रवर कनक तिवारी जी का छत्तीसगढ़ में प्रकाशित लेख (29 जून, 2009) पढ़कर मुझे भी कुछ कहने का अवसर मिल रहा है । आपने प्रमोद वर्मा पर सोलह आने सच लिखा है कि हम सबने और सरकार ने भी उन्हें लगभग बिसार दिया था । उन पर आगामी 10-11 जून को होने वाला विशालकाय आयोजन विश्वरंजन के बग़ैर नहीं हो सकता आदि-आदि । उसके लिए आपको और विश्वरंजन दोनों को ही साधुवाद। आपको इसलिए क्योंकि आप बहुधा बड़ी ताक़त के गिरेबां में भी झाँकने का हौसला रखते हैं । इस लेख में आपने उन चरित्रों को धोया है जो साहित्य के अंतःपुर को संचालित करने का दंभ भरते हैं । विश्वरंजन को इसलिए कि वे सचमुच बिना लाभ-हानि के बड़ा काम करने का सपना देखते हैं । वह भी छत्तीसगढ़ का मूल निवासी हुए बिना । यह उनकी छत्तीसगढ़ के साहित्यिक बिरादरी के प्रति असीम स्नेह भी है । क्योंकि वे स्थानीयता को नहीं जीते, वे सदैव एक राष्ट्रीय मन से सोचते हैं । और यदि ऐसा वे सोचते हैं तो उसके पीछे उनके नाना फ़िराक़ और गुरुतुल्य प्रमोद जी का जीवन और पाठ भी होता है ।

मुझे विनम्र भाव से आज आपके “वग़ैरह” शब्द के बहाने कुछ कहना है। यह ‘वग़ैरह’ क्या बहुत ही सिमटा और सिकुड़ा हुआ नहीं है । इसे क्या विस्तारित करने की ज़रूरत नहीं है । प्रमोदजी सचमुच तेज़-तर्रार लेखक थे, इस हद तक कि लेखक होने के नाते अपने स्वाभाविक आकांक्षाओं और लाभों की परवाह भी नहीं किया करते थे। चिकनी चुपड़ी बातों से उन्हें साफ़ परहेज़ था । एक हद तक मुँहफट । शायद इसलिए भी कि वे उस सूची में स्वयं को समादृत होने का सपना नहीं पालते थे जो दो-चार बार देश की कथित बड़ी पत्रिकाओं में छप जाने के बाद स्वयं को बड़े लेखकों में शुमार किये जाने का मुगालता पाले रहते हैं । वे किसी लेखक के टूटपुँजिए आलोचकों के लेखे से सूचीबद्ध होने के सख़्त ख़िलाफ़ थे । वे स्वयं अत्यधिक आत्मसजग और आत्मसम्मानी थे किन्तु इस तरह नहीं कि लोग उनकी चर्चा संबंधित विधा, प्रवृत्ति, दृष्टि, भूगोल आदि के बहाने किया करें और वे अमरत्व प्राप्त कर लें । ऐसा अमूमन औसत दर्ज़े का लेखक सोचता है । यह दीग़र बात है कि नामों को शुमार करने-करानेवालों की मंडली साहित्य की दुनिया में सदैव उपस्थित रही है जो ‘तू मेरा पूँछ सँवार- मैं तेरा सँवारूँगा’ के एजेंडे पर काम करती हैं । ऐसी मंडली के लोग अन्य को ‘वग़ैरह’ के खाँचे में डालकर मुदित हुआ करते हैं। कि उन्होंने फलां को निपटा दिया । इस लेख में आपका आशय यह कदापि नहीं कि आप अपने पसंद के लेखकों के अलावा शेष को “वगैरह” की निकृष्ट कोटि में रखना चाहते हों । न ही आपका ऐसा स्वभाव रहा है । सच तो यह भी है कि लेख का मुद्दा छत्तीसगढ़ के साहित्येतिहास लेखन भी नहीं है । आप अपनी व्यवसायिक व्यस्तता के बावजूद प्रमोदजी को लगातार याद कर रहे हैं यह प्रमोदजी की आत्मा के लिए भी बड़ी बात है । आप तो जानते हैं प्रमोद जी आत्मा और परमात्मा को भी मानते थे । वे वैसा मार्क्सवादी नहीं थे जो ईश्वर की मौत के बाद ही विचारों के गटर में पालथी मारके आसन जमाना चाहता है ।

चूँकि आपका लेख बहुत बड़ा है इसलिए उसमें ‘वग़ैरह’ के पहले और कुछ नामों को प्रवेश देने की गुंजाईश बनती थी । यह जो ‘वग़ैरह’ शब्द है अपनी बारी से पहले आ गया है । शायद अनाधिकृत चेष्टा करते हुए । कुछ शब्द होते ही हैं ऐसे जो बलात् प्रवेश कर जाते हैं हमारे जेहन में । ऐसे शब्द कईयों को चुभते हैं । मनुष्य जीवन-भर इस दर्द से उबर नहीं पाता । शायद प्रमोदजी को भी इसी तरह ‘वगैरह’ की परिधि में डाल दिया था कुछ हितनिष्ठों ने । आज भी उन्हें कुछ ऐसी नज़रों से देखते हैं । दूर क्यों जायें अपने छत्तीसगढ़ में ही । आप जब प्रसंगवश छत्तीसगढ़ के लेखक बिरादरी की चर्चा कर ही दिये हैं तो मैं इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर उस ‘वगैरह’ शब्द को कुछ हद तक अनावृत करना चाहता हूँ जो मुझे नहीं पर उन लोगों को चुभ सकता है जो ‘वगैरह’ के भीतर नहीं बल्कि बड़े दमदारी से खड़े हैं । एकाध को उनकी ठोस शिनाख्तगी नहीं दिखाई देती तो उसके कोई फ़र्क नहीं पड़ता ।
तो कनक भैया, ‘वगैरह’ शब्द को साफ़ तौर पर खोलने की गुंजाइस 100 प्रतिशत हैं । हालाँकि यह ज़रूरी नहीं है किन्तु इस ‘वगैरह’ में वे भी हैं जिन्हें शायद हमें पढ़ना चाहिए । यह बिलकुल अलग बात है कि आप-हम सबको नहीं पढ़ सकते । और हम अकसर स्वरूचि व्यंजन की तरह लेखकों को बड़ा या छोटा साबित करते रहते हैं । मैं यहाँ आपको खंडित करना नहीं चाह रहा । ऐसा मेरा किसी भी कोण से लक्ष्य नहीं है किन्तु कनकजी कदाचित् हम लेखकों के इतिहास लेखन की यही प्रवृत्ति अन्य माहिर-जाहिर लेखकों के मन में चूभती भी है । कहें कैसे ? छत्तीसगढ़ की ही बात करें तो और भी ऐसे रचनाकार हैं जिन्हें साहित्य के पवित्र मनवाले पाठकों को जानना चाहिए – जैसे डॉ. शोभाकांत झा, बख्शीजी के बाद ललित निबंध को संभाले हुए हैं। छः उत्कृष्ट किताबें दे चुके हैं हिन्दी के ललित संसार को । जैसे डॉ. बलदेव, ये न होते तो शायद मुकुटधर पांडेय का वैसा मूल्यांकन नहीं हुआ होता, जैसा कि हो सका । जैसे जगदलपुर के लाला जगदलपुरी बिलासपुर के पालेश्वर शर्मा और नंदकिशोर तिवारी। क्या उनके लोक-लेखन को एकबारगी बिसारा जा सकता है । जैसे हरि ठाकुर, नारायण लाल परमार, आनंदी सहाय शुक्ल, नरेन्द्र श्रीवास्तव, शंकर सक्सेना, डॉ. चित्तरंजन कर, डॉ. अजय पाठक गीत के लघु हस्ताक्षर तो हैं नहीं जिन्हें हिन्दीवालों को पढ़ना ही नहीं चाहिए । इन्होंने हिन्दी गीतों की युगीन प्रवृत्तियों को लाँघने की चेष्टा की है । शंकर सक्सेना तो नवगीत दशक के विश्वसनीय सर्जकों में आदरणीय हैं । बस्तीवासी अष्टभुजा शुक्ल के जिन पदों को हम कविता का नया शिल्प मान रहे हैं वैसा तो जाने कबसे आनंदीजी लिख गये हैं। मुस्तफ़ा, काविश हैदरी, मुमताज़, रज़ा हैदरी, नीलू मेघ, अब्दूल सलाम कौसर की ग़ज़लों के बारे में आप क्या कहेंगे? एकांत श्रीवास्तव, अशोक सिंघई, वंदना केंगरानी, वसंत त्रिपाठी, कमलेश्वर, विजय सिंह, रजत कृष्ण, मांझी अनंत, हरकिशोर दास, संजीव बख्शी, रमेश अनुपम, देवांशु पाल, बी.एल.पाल की कविता-कर्म को ‘वगैरह’ में नहीं रखा जाना चाहिए । जो गुरुदेव काश्यप चौबे की कविता के बारे में नहीं जानता वह छत्तीसगढ़ की कविता के बारे में आखिर कितना जानता है या जानना चाहता है । विभू खरे, देवेश दत्त मिश्र, अख्तर अली के नाटकों को कैसे भूला दिया जा सकता है ?

स्नेहलता मोहनीश, आनंद बहादुर सिंह, विनोद मिश्र, एस. अहमद भी टक्कर के कथाकार हैं यह कौन बतायेगा ? राम पटवा, हेमंत चावड़ा, सरोज मिश्र, डॉ. महेन्द्र ठाकुर, डॉ. राजेन्द्र सोनी की लघुकथाओं को शायद बड़े लोग नहीं पढ़ते । अजी, राम पटवा वही जिसकी लघुकथायें विष्णु प्रभाकर जैसे वंदनीय रचनाकार को जीवन के अंतिम क्षणों में आत्मकथा लिखते समय भी याद आती रहीं । महेन्द्र, राजेन्द्र और सरोज का मतलब कम लोग जानना चाहते हैं कि ये लघुकथा को हिन्दी में स्थापित करनेवाले कद्दावर रचनाकार हैं । विनोद शंकर शुक्ल, त्रिभुव पांडेय, गिरीश पंकज के व्यंग्य के बग़ैर परसाई, जोशी श्रीलाल शुक्ल की व्यंग्य-परंपरा आगे नहीं बढ़ती । यह भी हम नहीं जानते तो हमारा छत्तीसगढ़ के साहित्य के बारे में जानना अल्प जानना होगा ।
केवल कथा और कविता ही साहित्य की विधा और उसके रचनाकार ही रचनाकार नहीं कहलाते । सुधीर भाई केवल प्रकाशक का व्यवसायी दिल रखते तो यूँ ही देखते-देखते 300 किताबें नहीं छप जातीं । प्रभात त्रिपाठी बिलकुल ठीक ही कहते हैं – राष्ट्रीय स्तर-वस्तर कुछ नहीं होता । ख़ासकर तब जब आप ऐसी पत्रिकाओं में छपकर स्वयं को राष्ट्रीय हुआ देखने लगते हैं जो किसी किसी वाद, गुट, विचार और निजी कुंठाओं से परिचालित होती है । दिल्ली, मुंबई से छप जाना और वहीं के किसी कथित आलोचकों की याद में आ जाने से कोई बड़ा नहीं हो जाता, न मैं न तुम न और कोई । वह भी ऐसे दौर में जब साहित्य को चलानेवाले लोग बाज़ारवादी मन-बुद्धि से सोचते हों । छत्तीसगढ़ के कितने ऐसे लेखक हैं जिन्हें उनका पड़ोसी उन्हें एक लेखक के रूप में भी जानता है । अब तुम ही देखो – तुमने विश्वरंजन के पत्र को छत्तीसगढ़ के 500 लोगों तक पहुँचाया और उसमें से कितने लोगों ने प्रमोद जी पर आलेख दिये? कितनों ने उनके पत्र की फोटो काफी उपलब्ध कराया? कितने लोगों ने मूर्ख की तरह यह नहीं कहा कि ये प्रमोद वर्मा थे कौन ? तुम तो जान चुके हो कि जिसे तुमने बड़ा लेखक मानने का भ्रम पाले हुए थे उसी ने तुम्हें कह दिया कि वह प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में श्रोत्रा की हैसियत से आयेगा किन्तु प्रमोदजी पर साधिकार बोलने की दक्षता-संपन्न होने के बाद भी नहीं बोलेगा । क्यों नहीं बोलेगा भई ? उसकी मर्जी। मानस, तुम यह भी जानते हो कि जो ‘वगैरह’ होते हैं वे ही ऐसे बड़े आयोजनों को अमली जामा पहनाने में सबसे पहले आते हैं । तो केवल सूचीबद्ध बड़े साहित्यकारों को बड़े साहित्यकार कभी मत मानो। इसकी याद कराने की शायद ज़रूरत नही कि नाम बड़े और दर्शन छोटे । यह दीगर बात है कि वे “बड़े” साहित्यकार भी हो सकते हैं । सबको साथ लेकर चल सकते हैं। प्रमोद जी के साथ यही हुआ, उनके जाने के बार उन्हें बड़े साहित्यकारों ने इसलिए बिसार दिया क्योंकि उन्हें याद करने पर कोई रिटर्न नहीं आनेवाला । यानी हानि का व्यापार । तुम तो उनके शुक्रगुज़ार बनो जिन्होंने पहले ही पत्र पर प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह में शरीक होने की उत्साहवर्धक सहमति दे दी और जो प्रमोद जी के लिए सारा-धंधा पानी छोड़कर चले आ रहे हैं ।

प्रमोद वर्मा, विश्वरंजन और कुछ लोग

प्रमोद वर्मा स्मृति समारोह पर विशेष

‘कुछ लोग’ प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । ‘कुछ लोग’ यह भी नहीं जानते कि हर कोई प्रमोद वर्मा को नहीं जान सकता । वैसे ‘कुछ लोग’ स्वयं के बारे में भी नहीं जान पाते । बात ऐसे ‘कुछ लोगों’ की नहीं हो रही है । बात उनकी होनी चाहिए जो लोग प्रमोद वर्मा को कुछ-कुछ जानते हैं, उनके कुछ अनजाने को भी स्वयं और समूची दुनिया के लिए जानना ज़रूरी समझते हैं। विश्वरंजन उन कुछ लोगों में अव्वल हैं जो प्रमोदजी को जानने-समझने और समझाने के लिए मूर्खतापूर्ण आरोपों, कुढ़ों, फब्तियों की संभावना का आंकलन किये ब़गैर कठिन धर्मनिर्वहन में लगे हैं । निहायत संवेदनशील जो ठहरे ।

कठिन इसलिए कि कुछ लोगों के मुताबिक उन्हें सिर्फ़ पुलिस महानिदेशक होना चाहिए । आत्मावान् मनुष्य नहीं । विचारवान् नहीं । उन्हें संस्कृति-वंस्कृति से कोई लेना-देना नहीं चाहिए। मैं उनसे पूछता हूँ – हुजूर, मुझे क्यों धंसा दिया आपने समारोह के संयोजन में? जब आप जैसे बड़े आदमी को राज्य के पालनहार और जिम्मेदार क़िस्म के ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कह देते हैं कि विश्वरंजन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष नहीं बन सकते तो वे हमारे जैसे कीडे-मकोड़े (सामान्य आदमी)को किस तरह निपटाने की सोच रहे होंगे ? जैसे प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान उनकी अपनी सरकारी बपौती है जहाँ वे जिसे चाहे उसे बैठायें । प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान कोई राजनीतिक पद तो है नहीं कि उस पर शीर्षस्थ राजनेता के पिछलग्गू को ही बिठाया जाय । उन्हें कौन समझाये कि यह देश और राज्य के साहित्यकारों की साहित्यिक संस्था है जिसमें विश्वरंजन अपने सभी सदस्यों के आग्रह पर वह गैरराजनीतिक, गैरलाभकारी पद का गुरुत्तर भार स्वीकार किये हैं । शायद इसलिए कि वे प्रमोदजी को गुरुतुल्य मानते रहे हैं । शायद इसलिए कि उनमें फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और स्वतंत्रताकामी सपूत का ख़ून भी दौड़ता है । शायद इसलिए भी कि वे राज्य को विचारवान, गुणवान और सुसंस्कृत बनाने का सपना भी देखते हैं । शायद इसलिए कि वे और अफसरों की तरह सिर्फ अपनी हेकड़ी में मरना नहीं चाहते । यह बिलकुल दीगर बात है कि ऐसे ‘कुछ लोग’ अक्सर किसी कुंठा का शिकार होकर उलजूलूल बकते रहते हैं और राजनीति में यह सब चलता भी रहता है ।

वैसे ऐसे ‘कुछ लोगों’ को अपने ही राज्य के नियम-क़ायदों का ज्ञान नहीं होता कि उनका कोई भी अधिकारी कला, साहित्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास से संबंधित वह सभी कार्य कर सकता है जो राज्य की संप्रभुता को चुनौती न देता हो । ‘कुछ लोग’ यहाँ तक कहते पाये जा सकते हैं कि आप अपनी ज़मीर को छोड़कर आयोजन के बहाने रुपया बटोर रहे हैं और कुछ हिस्सा मुझे भी दे रहे हैं । भई क्या बात है, जैसे जीवन-भर पुलिस विभाग में रहते हुए विश्वरंजन को कुछ नहीं मिला....तो चले साहित्य के बहाने पैसा कमाने । जैसे विश्वरंजन किसी भूखमर्रे किसिम के मेट्रिक पास नेता है जो बड़ा से बड़ा राजनीतिक पद पाजाने के बाद भी चंदा दलाली से ज्यादा नहीं सोच सकता । तौबा-तौबा। कुछ तो लिहाज़ करो फ़िराक़ गोरखपुरी जैसे विश्वप्रसिद्ध शायर और संग्राम सेनानी के संस्कारवान नाती पर.....

विश्वरंजन कुछ नहीं कहते, सिर्फ मुस्काते देते हैं- जैसे उनकी मुस्कान में ये सारे भाव-उत्तर छुपे हुए हों कि मानस, ऐसे ‘कुछ लोग’ जो कम पढ़ लिखे होते हैं, जीवन-भर यही काम करते रहते हैं । और ऐसे लोग सिर्फ राजनीति में नहीं साहित्य में भी होते हैं । तुम और हम और बहुत सारे लोग भी ऐसे ‘कुछ लोगों’ जैसे नहीं होते । शायद इसलिए प्रमोदजी जैसे विभूतियों पर कुछ होने की पहल हो पाती है ।

प्रमोदजी ऐसे ‘कुछ लोग’ की चिंता नहीं किया करते थे । वे जानते थे कि समाज में ‘कुछ लोग’ ऐसे होते ही हैं जो वे कुछ करें तो ठीक । दूसरा कुछ करे तो गलत । ऐसे लोग जीवन भर विघ्नसंतोषी बने रहते हैं । दरअसल ऐसे लोग ऐसे मौकों पर अपनी विशेषज्ञता प्रतिपादित करने के लिए जुमले उछालते हैं । ताकि आप उन्हें मनायें तुलसीदास की पंक्ति को याद करते हुए – प्रथमहू बंदऊँ खल के चरना । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो बड़े बड़े लेख लिख सकते हैं परन्तु दिये गये विषय पर लिखने में उन्हें नानी याद आ जाती है । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जिन्हें लगता है कि वे प्रमोदजी जैसे छोटे साहित्यकार पर लिखकर अपने बडप्पन को छोटा करने का ख़तरा नहीं उठा सकते । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो आपके हर कामों में मीन-मेख निकालकर ऐसे आयोजनों में आपकी अस्थिपंजर एक कर देते हैं । कुछ नहीं मिला तो प्रूफ की ओर इशारा करके आपके निष्कलुष श्रम पर ऊँगलियाँ उठा देते हैं । ‘कुछ लोग’ ऐसे भी होते हैं जो भीतर से तो ऐसे पवित्र आयोजनों से जुड़े होते हैं किन्तु आपको पता ही नहीं लगता कि वे अपना मूल्य कब और कैसे आपसे वसूल लेते हैं ।

साहित्यवाले भी समाज से आते हैं । जैसा समाज वैसे ही उसके साहित्यकार । किस-किस पर रोयें ? किस किसकी कितनी परवाह करें । परवाह करेंगे तो राज्यहित में ऐसे काम नहीं कर सकते । चलिए... चलते-चलते भैया परदेशीराम वर्मा जी के उस आलेख की भी चर्चा कर लेते हैं जिसका देह संपूर्ण पवित्र है किन्तु उसमें धड़ लगा है वह निहायत अपवित्र है यानी उनके शब्दों में जी हाँ, वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते । केवल उनकी पूजा करते हैं । भई बिना जाने कोई किसी की पूजा भला क्योंकर करेंगा ? लेख में मेरा जिक्र करके उन्होंने कुछ पर्दादारी कर दी है । उसका रहस्य खोल देते हैं । हाँ, मुझे उन्होंने कहा था कि वे प्रमोद वर्मा को नहीं जानते पर उन पर केंद्रित इस आयोजन में ज़रूर आयेंगे । तब मैंने यह भी कहा था कि आप आ रहे हैं यही प्रमोद जी को जानना है । मैंने यह भी कहा था कि कुछ लोग आपको और कुछ लोग मुझे भी नहीं जानते जिसके लिए हम जिंदगी भर लगे रहते हैं कि लोग हमें जाने । उस समय संस्थान के अध्यक्ष भी विश्वरंजनजी भी साथ थे । बात तो हुई छत्तीसगढ़ी में पर विश्वरंजन जी सब समझ रहे थे । उन्होंने सहर्ष आयोजन में पधारने की स्वीकृति भी दी थी कि वे ज़रूर प्रमोदजी पर बोलेंगे । इसके पहले भी सुधीर शर्मा ने बताया था कि इस आयोजन को लेकर परदेशीराम वर्मा का कहना है कि उन्हें सिर्फ संवाद में रखा गया है जबकि उन्हें अच्छे आसंदी में रखे जाने की उम्मीद थी । मैंने मित्रों की चर्चा में बिना किसी पाप के अशोक सिंघई जी को कह दिया जो संस्थान के उपाध्यक्ष हैं कि वे उन्हें मनालें । तो उन्होंने उसी तरह परदेशीजी को हड़का दिया जैसे एक मित्र को दूसरा मित्र हड़का देता है और दोनों एक दूसरे को ऐसे तो कई बार हड़का चुके होंगे । इसके कुछ ही दिन बात मुझे परदेशीजी का पत्र मिल गया कि उन दिनों जब प्रमोद जी पर केंद्रित आयोजन हो रहा होगा वे अन्यत्र व्यस्त रहेंगे अतः अपनी शुभकामनायें ही भेज सकते हैं । अब मैं तय ही नहीं कर पा रहा हूँ कि ऐसी शुभकामनाओं का क्या उपयोग किया जाये ? आपमें से किसी को इसका दिव्यज्ञान तो कृपया मुझे अवश्य सूचित करें ।

Sunday, July 08, 2007

न्यूयार्क में ताली बजाने की क़ीमतः डेढ़ लाख रुपये


हिंदी का 8 विश्वकुंभ अमेरिका के न्यूयार्क में 13 से 15 जुलाई तक होने जा रहा है । हिंदीसेवी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने अपने डेरों से प्रस्थान भी करने लगे हैं । बताया जा रहा है कि विश्व के 128 देशों से हिंदी सेवी शरीक होने वाले हैं पर पिछले दिनों जिस तरह की गतिविधियाँ नज़र आयी हैं उससे सम्मेलन की सफलताएं संदेहास्पद और संदिग्ध जान पड़ती हैं ।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस आयोजन को तौलें तो यह शहर एवं महानगर निवासी तथाकथित रचनाकारों का जमावड़ा मात्र सिद्ध होने वाला है । शायद ही दूरदराज के उन हिदीं सेवियों को इसमें जोड़ा गया है या उसे जोड़े जाने का वास्तविक उद्यम किया गया है जो अपनी मौन साधना से हिंदी को समृद्ध कर रहे हैं । विडम्बना कहिए कि किसी भी राज्य सरकारों ने हिंदी-प्रियता का परिचय देते हुए अपने स्तर पर इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया जिससे सम्मेलन की बात गाँव-कस्बों के मौन साधकों तक पहुँच पाती । बात सिर्फ इतनी भी नहीं है, आयोजकों ने हिंदी के वरिष्ठ रचनाकारों, तकनीकी विशेषज्ञों, भाषाशास्त्रियों, फिल्मकारों, गायको, प्रकाशकों को जोड़ना उचित नहीं समझा जिनकी बदौलत हिंदी भारत से अन्यत्र पुष्पित-पल्लवित हो रही है ।

इस वैश्विक आयोजन में तलवे चाटने वाले हिंदी के भांड कवियों और मंच में मसखरी करने वालों को खास तवज्जो दिया है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि न्यूयार्क में सम्मेलन के दौरान दैनिक कार्यवृति की रिपोर्टिंग चुटकुलेबाज कवि करने वाले हैं। हमने तो यही सुना है । होगा क्या हम नहीं कह सकते । क्या पत्रकारिता जगत के रिपोर्टरविहीन हो गया यह महादेश ? कितनी शर्म की बात है कि एक तथाकथित अखिल भारतीय मंचीय कवि के युवती पीए को सिर्फ इसलिए खर्च करके आयोजक ले जा रहे हैं कि वह डीटीपी कार्य जानती है और वह वहाँ अपने बॉस का हाथ बटायेगी । (ऐसा कार्य आपमें से और कोई जानते हों कृपया दुखी न होवें ।)आयोजकों के शायद इसी और ऐसी गैर गंभीर क्रियाकलापों और हरकतों के कारण नामवर सिंह, अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह और मंगलेश डबराल जैसे दिग्गज लेखकों ने विरोध स्वरूप सम्मेलन में हिस्सा लेने से साफ मना कर दिया है। हरीश नवल, प्रेम जनमेजय, कमल कुमार जैसे बड़े रचनाकारों ने भी इसी तर्ज में स्वयं को अलग कर लिये हैं, जो लगातार कई सम्मेलनों में शरीक होते रहे हैं और जिन्होंने विदेशों में हिंदी का परचम फहराया है । इनमें हिन्दी के प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह का नाम भी है, जिन्होंने सम्मेलन को व्यर्थ बताते हुए इसमें भाग लेने से मना कर दिया है। केदारनाथ सिंह ने तो कहा है कि यह सम्मेलन व्यर्थ है और इसका कोई प्रयोजन नहीं है।

यह प्रमाणित तथ्य है कि विदेश मंत्रालय और अमेरिकन एंबेसी के मध्य कोई तालमेल नहीं रहा है । सच तो यह है कि भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से ऐसे कोई प्रयास ही किये ही नहीं गये जिससे पंजीकृत प्रतिभागियों को वांछित वीजा बनाने में सरलता और सुविधा होती । इससे सबसे बड़ी हानि यह हुई कि प्रख्यात लोग सम्मेलन में शरीक होने से वंचित हो गये हैं और पंचम-षष्ठम श्रेणी के उन शौकिया लेखकों को 10-10 साल तक का वीजा मिल गया है जिन्हें हिदीं से कोई खास लेना देना नहीं और जो सम्मेलन के बहाने न्यूयार्क मात्र घूमने-फिरने जा रहे हैं। ऐसे लोग अमेरिका के गुन गा रहे हैं – क्यों भी न गायें। इसी बहाने ‘अमेरिका रिटर्न’ कहलाने का मौका जो मिलेगा उन्हें । आयोजकों में अदूरदर्शिता और आयोजकीय व्यवस्था के अभाव के कारण आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए मुम्बई से जाने वाले प्रतिनिधिमंडल के 12 सदस्यों वीजा प्राप्त करने से वंचित रह गये हैं । उन्हें इस आधार पर वीजा देने से इनकार कर दिया है कि उन्होंने अमेरिका के बाहर सामाजिक,आर्थिक और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पर्याप्त कार्य नहीं किया है। क्या यह मुंबई के साहित्यकारों और हिंदी सेवियों के लिए अपमानजनक नहीं है। इतना ही नहीं विश्वप्रसिद्ध टेक्नोक्रेट और युवा वैज्ञानिक जगदीप डांगी को भी अमेरिकन वीजा से वंचित कर दिया गया है जिसके द्वारा विकसित साफ्टवेयर खरीदने कभी अमेरिकन कंपनी माइक्रोसॉफ्ट भी स्वयं उनके दरवाजे तक जा पहुँची थी ।

विश्व हिदी सम्मेलन को अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो आयोजकों अर्थात् भारत सरकार ने जिस तरह से प्रतिभागिता का मापदंड़ निर्धारित किया है वह हिंदी के वास्तविक आराधकों और सेवकों के लिए दुष्कर है । एक से डेढ़ लाख खर्च किये बिना वहाँ जाने की कल्पना नहीं की सकती । यह अलग बात है कि आप पहुँच भी गये तो आपको केवल ताली ही बजानी है। क्योंकि विमर्श सत्र में आपको कुछ कहने की कोई अनुमति तो मिली नहीं है - आयोजकों की ओर से । इस बीच भारत सरकार ने राज्य सरकारों को लेखकों को सहयोग करने हेतु लिखकर छुट्टी कर ली है । अब राज्य सरकार की मर्जी कि वे अपने राज्य के हिंदी सेवियों को वहाँ हिंदी की आवाज़ बुलंद करने भेजें या नहीं । आप उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। कुछ राज्य सरकारें बकायदा अपने राज्य से प्रतिनिधि मंडल भेज रही हैं जिसमें सिर्फ उनके विचारधाराओं के पांप्लेट्स लिखने वाले ही सम्मिलित हैं । कुछ राज्य सरकारों में वहाँ के अधिकारियों की मूर्खता, तानाशाही और स्वयं अमेरिका यात्रा करने के अति लालच के कारण वहाँ साहित्यकार विश्व हिंदी सम्मेलन में जाने से वंचित रह गये हैं, उन्हें फूटी-कौड़ी तक नसीब नहीं हो सका है । इस वैश्विक आयोजन से कुछ राज्यों को तो कुछ भी नहीं लेना देना - हिदीं चाहे जहाँ जाये (भाड़ तो नहीं कह सकता ना) । अब आयोजकीय धर्म के निर्वहनकर्ताओं को कौन समझाये कि सच्चे और ईमानदार हिंदी सेवी और साहित्यकारों का अफसरानों या नेता-मंत्रियों से चोली-दामन का साथ तो होता नहीं जो ऐन-केन प्रकारेण विज्ञापन आदि से राशि जुटा ही लें । बात छोटी-सी है पर यही इस आयोजन के उद्देश्यों की विश्वसनीयता का संकट है । पर आयोजकों को इस बात के लिए दाद देनी होगी कि उन्होंने विश्व हिदीं सम्मेलन का दरवाजा सबके लिए खोल दिया । चाहे टेटकू राम जाये या फिर टेकचंद या फिर टी. रामाराम । इसे ही तो प्रजातांत्रिक मूल्य के लिए खुलापन कहते हैं ।

इन दिनों विश्व हिंदी सम्मेलन की जो सूचनात्मक वेबसाइट विश्व भर में दिखायी जा रही है उसमें सारी जानकारी है पर वहाँ इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि वहाँ किन महान हिंदी सेवकों(?) का सारा खर्च आयोजक (विशेषतः भारत सरकार या विदेश मंत्रालय)वहन कर रहे हैं जिन 60 रचनाकारों का न्यूयार्क के वैश्विक मंच में उनकी उल्लेखनीय सेवा के लिए प्रतीकात्मक सम्मान होने जा रहा है वे कौन लोग हैं ? उनका चयन किसने किया ? किस आधार पर चयन किया गया ? और तो और वहाँ कौन-कौन किस विषय पर आलेख पढ़ेगा? इसकी भी जानकारी अब तक नहीं दी जा सकी है । वैसे इन चीजों को वेबसाइट में भी अवश्य दिया जाना चाहिए ताकि आयोजन में खुलापन आ सके । नये लोग जान सकें कि आखिर वे पैरामीटर क्या होते जिनके बल पर रचनाकार को विश्वस्तर पर सम्मानित किया जाता है । तब जब हम भारतीय बड़े जोर-जोर से सूचना का अधिकार का डंका पीट रहे हैं इन सब बातों का उल्लेख अवश्य विश्व को बताया जाना था । ठीक उसी तरह जैसे अन्य सभी बातों को वेबसाइट में दिया गया है । जो भी हो, इस मौके पर बालेंदू दाधीच की तारीफ की जा सकती है कि उनके कारण कम से कम ब्लॉगरों जैसे दो कोड़ी के लेखकों को कम से कम भारत सरकार के वेबसाइट में तवज्जो तो दिया गया। उनमें से कोई न्यूयार्क सम्मेलन में नहीं बुलाये गये तो क्या !

जैसे कि सूचना मिल रही है ऐसे मौकों पर ग़ज़ल गायन और सितार वादन तो हो पर कबीर, तुलसी, रहीम, मीरा के पदों को गा-गाकर हिंदी का साम्राज्य विस्तार करने वाले कलाकारों की सुधि ही न रखी जाय। यह कहाँ का न्याय है ? जबकि आज भी सारे विश्व में यही हिंदी के नाम पर सर्वमान्य और प्रसिद्ध हैं । हिंदी को वैश्विक सिर्फ शाब्दिक ही नहीं बना रहे हैं या नहीं बना सकते, इसमें लोकगायकों, लोकनर्तकों, तकनीक सृजनकर्ताओं, शोधकर्ताओं आदि को भी याद किया जाना चाहिए जो अनेक माध्यमों से हिंदी को संसार भर में पहुँचा रहे हैं । हाँ, यह बात अलग है कि इसका जिक्र इस वेबसाइट में नहीं किया गया है और सभी बातों को जिक्र किया जाना वहाँ सम्भव भी नहीं है ।

यूँ तो इस वेबसाइट की सारी बातें पारदर्शी हैं पर जो नहीं हैं उसे लेकर विश्व भर में फैले हिंदी सेवियों के मन में कोई प्रश्न उठे तो उसका कोई जबाब यहाँ नहीं है । माना कि हिंदी को विश्व भाषा का दर्जा दिलाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर हिंदी सेवी भी उत्तरदायी हैं और उनका विमर्श-सम्मेलन में स्वतःस्फूर्त होकर पहुँचना भी लाजिमी हो सकता है किन्तु क्या ऐसे लोगों तक ऐसी सूचना पहुँचाने का कोई व्यवहारिक प्रयास किया गया ? शायद नहीं। खासकर उन दूरदराज के हिंदी सेवियों, साहित्यकारों को इस आयोजन की कोई सूचना नहीं है जो संसाधन से लैश शहर से दूर किसी गाँव-कस्बों में बसते हैं और हिंदी के विकास में तिकड़मी साहित्यकारों से कहीं अधिक योगदान भी दे रहे हैं । कुल मिलाकर यह महानगरों के हिंदी विशेषज्ञों(?) और लखपति हिंदी सेवियों को न्यूयार्क में अधकचरा विमर्श करने या फिर बिना अवसर जाने करतल ध्वनि करने का त्यौहार जैसा लगता है ।

भारत सरकार को यदि छोड़ भी दें तो अमेरिका के आयोजकों, हिंदी सेवी संगठनों, हिंदी प्रेमी धनबली-प्रवासी भारतीयों में से किसी को भी हिंदी संस्कृति का मुख्य लक्षण यानी अतिथि देवो भवः का मूलमंत्र याद नहीं आ सका । यदि ऐसा होता तो वे कम से कम घर फूँक कर न्यूयार्क पहुँचने वाले दीवाने साहित्यकारों के सिर छुपाने के लिए कोई निःशुल्क छत जरूर ढूँढ लेते । तीन दिनों के दाना-पानी का पैसा भी पंजीयन के नाम पर पहले नहीं मांग लिया जाता । यानी कि प्रतिभागियों से भोजन पानी का पैसा भी वे बटोर चुके हैं । ऐसे में आम हिंदीभाषी कैसे विश्वास कर लें कि विदेशों में हिंदी के प्रति दीवानगी है, वहाँ हिंदी शिक्षण के प्रति आग्रह है, वे भी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा के रूप में हिंदी को देखने में उत्सुक हैं ? हम मानते हैं कि वे भी हमसे पूछ सकते हैं कि क्या उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलन का सारा खर्च करने का ठेका ले रखा है तो फिर प्रश्न उठता है कि आखिर क्यों हिदीं के वास्तविक सेवक जो मूलतः मध्यम वित्तीय वाले होते हैं वहाँ गिरवी रखकर जायें । तर्क तो यह भी दिया जा सकता है कि आखिर किसने कहा कि ये वहाँ जायें ? तो भी साफ-साफ यह अर्थ निकलता है कि वहाँ विमर्श या चिंतन नहीं होना है । केवल मेला लगना है और मेले में वही घूमने जाता है जिसके पास पेट-पाट के बाद कुछ बच जाता है ।

ऐसे मौकों पर हिंदी सेवी मन सशंकित हो तो क्या यह अतिरिक्त है या एकतरफा ही है कि क्या ऐसे आयोजनों या आयोजकों के बल पर विश्व मानव परिवार की भावना सुदृढ़ हो सकेगी ? राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की उपलब्धि पर सार्थक चर्चा संभव है ? विश्व हिंदी विद्यापीठ की स्थापना कब तक हो सकेगी ? विश्व भाषा हिदीं के उत्थान हेतु सचिवालय की स्थापना कैसे होगी ? विभिन्न देशों में हिंदी पीठों की स्थापना कौन करेगा ? विश्वव्यापी भारतवंशियों से हिंदी को संपर्क भाषा बनाने का अनुरोध कौन करेगा और उसे कौन मानेगा ? विभिन्न स्तरों पर हिंदी पठन-पाठन की व्यवस्था किसके बल पर होगी ? हिंदी के वैश्विक प्रचार-प्रसार, अनुप्रयोग तथा प्रयोजनों पर अनुसंधान करने कौन आगे आयेगा ? आदि-आदि। जो भी हो, यह सम्मेलन कोई विश्व उत्सव न बन जाये इस पर निगरानी जरुरी है। व्यक्तिगत तौर पर और आयोजकीय नैतिकता से भी ।

क्या इस 8 वे विश्व हिंदी सम्मेलन से उसके मूल उद्देश्यों यानी कि - अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी की भूमिका को उजागर करना,विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी के शिक्षण की स्थिति का आकलन करना और सुधार लाने के तौर-तरीकों का सुझाव देना, हिंदी भाषा और साहित्य में विदेशी विद्वानों के योगदान को मान्यता प्रदान करना, प्रवासी भारतीयों के बीच अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हिंदी का विकास करना, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, आर्थिक विकास और संचार के क्षेत्रों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी का विकास आदि की लेकर हो रहे वैश्विक आयोजन की सफलता संदिग्ध नहीं हो गई है ?


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