वेब-भूमि-6
यह समय कंप्यूटर और इंटरनेट से दूर भागने का नहीं है । इसमें अरुचि का मतलब सामाजिक सरोकारों से अरुचि भी है । यही कारण है कि ई-तकनीक के रूप में ई-शासन जनता के लिए कारगर नहीं बन पा रहा है और कुछ कालेमन वाले इसका भी इस्तेमाल अपने गंदे कॉलर को चमकाने के लिए सर्फ एक्सेल की तरह करने में तुले हुए हैं, आये दिन उन्हें फ़र्जी वैश्विक रिकार्ड बनाते देखा जा सकता है । और इसीलिए ई-शासन योजना का आदर्श लक्ष्य - “सभी सरकारी सुविधाएँ एवं सेवाओं को आम जनता के द्वार पर उपलब्ध कराना” के स्थान पर सभी सरकारी सुविधाओं को अपनी झोली में डाल लेना सिद्ध हो रहा है। यदि हम इधर भी ध्यान दें, उसकी व्यापक शक्ति को आजमायें, औरों को भी इससे जोड़ें तो निश्चय ही यह आम गरीब, पिछड़े और साधन संपन्नहीन नागरिकों के लिए भ्रष्ट्राचार से मुक्ति का कारगर साधन बन सकती है । ई-शासन के लंगड़ाने के पीछे फिलहाल जनता रुचि संवर्धन और तकनीकी ज्ञान का अभाव ही है परंतु ई-शासन की तकनीक तकदीर बदलने की कला बन सकती है ।
देश की सबसे उपेक्षित परिवार- “ग्रामीण जनता” को लाभान्वित कराने के उद्देश्य से कंप्यूटर आधारित ई-शासन परियोजना की शुरुआत की गई है ताकि सूचना-प्रौद्योगिकी को आम आदमी के लिए लाभप्रद बनाया जा सके । इसी दिशा में राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र(एनआईसी) काफी लंबे समय से सभी स्तरों पर तकनीक एवं नेटवर्किंग से संबंधित सरकारी ज़रूरतों को पूरा करने में सुविधाएँ प्रदान करने को प्रतिबद्ध है। नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेन्टर केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, केन्द्र शासित प्रदेशों, जिला एवं अन्य सरकारी निकायों को नेटवर्क आधार एवं ई-शासन सहायता प्रदान कर रहा है। यह सरकारी योजनाओं को लागू करने, सरकारी सेवाओं के स्तर में सुधार करने एवं राष्ट्रीय व स्थानीय सरकारों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए राष्ट्रव्यापी संचार नेटवर्क उपलब्ध कराने के साथ बहुत सारे संचार व सूचना प्रौद्योगिकी सेवाएँ भी उपलब्ध करा रहा है। भारत में एनआईसी की प्रमुख उत्पाद एवं सेवाएँ -
1. एगमार्कनेट-
यह देश में विपणन सूचना के आदान-प्रदान के लिए कृषि उत्पाद के थोक बाज़ार को आपस में जोड़ने का कार्य करता है। यह पोर्टल कृषक विपणन से संबंधित सरकारी एवं गैर सरकारी संस्था, किसान, व्यापारी, निर्यातक, नीति निर्माता, शैक्षणिक संस्थान आदि को सशक्त बनाने वाली अभिकरण के रूप में उभरा है। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://agmarknet.nic.in को लॉग करें।
2. भूईयान-
भू-अभिलेख कंप्यूटरीकरण-वेब आधारित यह सॉफ्टवेयर सुविधा भू-अभिलेख से संबंधित सूचनाएँ ऑनलाइन उपलब्ध कराती है। सामान्य रूप से भूमि से संबंधित ये सूचनाएँ किसानों द्वारा, बैंकों से ऋण प्राप्त करने के लिए, प्राप्त किया जाता है। और इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से ये सूचनाएँ वे राज्यभर में फैले कियोस्क के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं। इस सॉफ्टवेयर की एक और विशेषता यह है कि प्रशासक (एडमिस्ट्रेटर) एक स्थान पर बैठे-बैठे भूमि की क्षेत्रवार स्थिति, किसानवार स्थिति एवं किसी खास भूमि की राजस्व संग्रह की स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://eglrc.nic.in को लॉग करें।
3. ई-पोस्ट -
ई-पोस्ट सॉफ्टवेयर का प्रयोग कर पोस्ट ऑफिस के माध्यम से देशभर में कहीं भी सूचनाएँ भेजी या प्राप्त की जा सकती है। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://indiapost.nic.in को लॉग करें।
4. परीक्षा परिणाम पोर्टल -
वेबसाइट पर परीक्षा परिणाम प्राप्त करने का यह प्रथम स्रोत है। यह वेबसाइट विभिन्न सरकारी अभिकरणों द्वारा संचालित शैक्षणिक, प्रवेश परीक्षा एवं भर्त्ती परीक्षा से संबंधित परिणाम ऑनलाइन उपलब्ध कराता है। इस वेबसाइट पर प्रकाशित प्रमुख परीक्षा परिणाम हैं- केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की 10 वीं व 12 वीं का परीक्षा परिणाम, राज्य स्कूल बोर्ड, विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग, मेडिकल, एमबीए, सीए आदि हैं। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://results.nic.in को लॉग करें।
5. ज्यूडिस
ज्यूडिस विभिन्न न्यायालयों में दायर मुकदमों एवं उसपर आये निर्णयों का एक विस्तृत ऑनलाइन पुस्तकालय की तरह कार्य करता है। इस पर आप भारत के सर्वोंच्च न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा सुनाये गये निर्णयों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://www.judis.nic.in को लॉग करें।
6. रूरल मार्केट -
इस सॉफ्टवेयर का उपयोग ग्रामीण लोगों एवं कलाकारों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के विपणन प्रयास एवं प्रदर्शन को सशक्त करने के लिए किया जाता है। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://ruralbazar.nic.in को लॉग करें।
एनआईसी द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे अन्य विभिन्न उत्पाद एवं सेवाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://offerings.nic.in/products or http://offerings.nic.in/egovsearchres.asp को लॉग करें।
7निर्णय सूचना तंत्र (ज्यूडिस) -
ज्यूडिस विभिन्न न्यायालयों में दायर मुकदमों एवं उसपर आये निर्णयों का एक विस्तृत ऑनलाइन पुस्तकालय की तरह कार्य करता है। इस पर आप भारत के सर्वोंच्च न्यायालय एवं विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा सुनाये गये निर्णयों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इस बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए- http://www.judis.nic.in को लॉग करें।
चलते-चलते -
केन्द्र सरकार द्वारा विगत दिनों ई-तैयारी के क्षेत्र में अग्रणी राज्य का मान्यता देने के बाद अब केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को ई-शासन के क्षेत्र में उत्कृष्ट पहल के लिए के लिए कंप्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया से सर्वश्रेष्ठ ई-शासन राज्य का पुरस्कार मिला है। पुरस्कार समिति ने राज्य में चलाये जा रहे ई-सम्पर्क परियोजना (भारत सरकार द्वारा गोल्डेन आइकॉन अवार्ड से सम्मानित) एवं जन सम्पर्क परियोजना (समाज के लिए सूचना-प्रौद्योगिकी) की भी सराहना की।
Thursday, October 11, 2007
Wednesday, October 10, 2007
अमेरिका में पाणिनी –ब्रिटेन में लेखनी
वेबभूमि -5
चौंकिए नहीं । अमेरिका अब धीरे-धीरे हिंदी की ताकत को स्वीकारने लगा है। वहाँ आये दिन हिंदी भाषा के माध्यम से भारत को समझने के नये-नये तरीके तलाशे जा रहे हैं । यदि ऐसा न होता तो वहाँ के एक कुलाधिपति शास्त्री जे सी फिलिप इस दिशा में नहीं आ झँपाते । वैसे वे भारतीय मूल के ही हैं । उन्होंने हाल ही में हिन्दी चिट्ठों एवं जालस्थलों में उप्लब्ध सामग्री की खोज हिन्दी में करने के लिये सारथी का वृहद खोज-यंत्र "नाचिकेत" (www.Sarathi.info) की शुरूआत की है ।
नाचिकेत में हिन्दी के 1000 से अधिक जाल-स्थल इसमें शामिल कर दिये गये हैं, एवं अगले कुछ दिनों में सारे ज्ञात हिन्दी जालस्थल इसमें जोड दिये जायेंगे । जाल-स्थल सारथी/नाचिकेत के सम्पादकों के द्वारा चुने/जोडे जाते हैं एवं इन चुने हुवे जाल-स्थलों की खोज गूगल द्वारा होती है । अत: खोजियों को सही जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाती है व प्राप्त फल में अनावश्यक जानकरी आपका समय भी नष्ट नहीं करती । हिन्दी खोज एवं अनुसंधान के लिये अब कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है ।
चौंकिए नहीं । अमेरिका अब धीरे-धीरे हिंदी की ताकत को स्वीकारने लगा है। वहाँ आये दिन हिंदी भाषा के माध्यम से भारत को समझने के नये-नये तरीके तलाशे जा रहे हैं । यदि ऐसा न होता तो वहाँ के एक कुलाधिपति शास्त्री जे सी फिलिप इस दिशा में नहीं आ झँपाते । वैसे वे भारतीय मूल के ही हैं । उन्होंने हाल ही में हिन्दी चिट्ठों एवं जालस्थलों में उप्लब्ध सामग्री की खोज हिन्दी में करने के लिये सारथी का वृहद खोज-यंत्र "नाचिकेत" (www.Sarathi.info) की शुरूआत की है ।
नाचिकेत में हिन्दी के 1000 से अधिक जाल-स्थल इसमें शामिल कर दिये गये हैं, एवं अगले कुछ दिनों में सारे ज्ञात हिन्दी जालस्थल इसमें जोड दिये जायेंगे । जाल-स्थल सारथी/नाचिकेत के सम्पादकों के द्वारा चुने/जोडे जाते हैं एवं इन चुने हुवे जाल-स्थलों की खोज गूगल द्वारा होती है । अत: खोजियों को सही जानकारी तुरंत उपलब्ध हो जाती है व प्राप्त फल में अनावश्यक जानकरी आपका समय भी नष्ट नहीं करती । हिन्दी खोज एवं अनुसंधान के लिये अब कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है ।
चलिए जानते हैं ये शास्त्री जे सी फिलिप के बारे में कि ये करते क्या हैं ? एक समर्पित लेखक, अनुसंधानकर्ता, एवं हिन्दी-सेवी हैं. उन्होंने भौतिकी, देशीय औषधिशास्त्र, और ईसा के दर्शन शास्त्र में अलग अलग विश्व्वविद्यालयो से डाक्टरेट किया है । आजकल वे पुरातत्व के वैज्ञानिक पहलुओं पर अपने अगले डाक्टरेट के लिये गहन अनुसंधान कर रहे हैं । शास्त्रीजी बताते हैं - उनका बचपन मध्य प्रदेश के ग्वालियर मे बीता है, जहां उन्होंने कई स्वतंत्रता सेनानियों से शिक्षा एवं प्रेरणा पाई थी । इस कारण उन्होंने अपने जीवन में राजभाषा हिन्दी की साधना और सेवा करने का प्रण बचपन में ही कर लिया था। उनका मानना है कि यदि हम भारतीय संगठित हो जायें तो सन २०२५ से पहले हिन्दुस्तान एक विश्व-शक्ति बन जायगा। फिर से एक सोने की चिडिया भी बन जायगा। इस चिट्ठे में वे इस विषय से संबंधित लेख प्रस्तुत करेंगे।
वैज्ञानिक विषयों के अतिरिक्त उन्होंने जाने-माने अध्यापकों की देखरेख में दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों का भी अध्ययन किया है। वे इन सभी विषयों पर आप के प्रश्नों का स्वागत करेंगे, और उनका जवाब इस चिट्ठे मे देंगे। प्रश्न पूछने के लिये या तो उनको ईमेल भेजें (जिसका पता मुख्य पेज पर दहिनी ओर दिया गया है), या इस चिट्ठे मे हिन्दी या अंग्रेजी में टिप्पणी के साथ अपना प्रश्न भी जोड दें।
फिलिप साहब ने हिंदी की मानकता के लिए कमर कस ली है – पाणिनि बनाकर । पाणिनि हिन्दी में मानक एवं सरल/सहज शब्दों की कोई कमी नहीं है। पाणिनि का लक्ष्य है हर कार्य के लिये सरल/सहज मानक शब्द सुझाना जिससे कि हिन्दी बोलते/लिखते समय अंग्रेजी शब्दों पर हमारा आश्रय कम हो। यदि आप में से कोई हिंदी प्रेमी चाहता है कि तो अपने सुझाव पाणिनी को भेज सकता है उनका पता है -Panini@iicet.com
हस्तलिखित पाठ्य को पढ़ेगा कम्प्यूटर
कंप्यूटर क्या-क्या नहीं कर सकता । कोई भी वास्तविक मूल्याँकन नहीं कर सकता । भविष्यवाणी नहीं कर सकता । आप ही जान लीजिए ना । अब वह हस्तलिखित और मुद्रित सामग्री को भी बाँच सकता है । ऍच पी ने एक टूलकिट - यानी लाइब्रेरी निकाली है जो कि भारतीय भाषाओं के हस्तलिखित और छपे हुए पाठ्य को पढ़ने में कम्पयूटर को मदद करेगा। यह मुक्तस्रोत है - जीपीऍल और ऍमआईटी अनुमतिपत्र के तहत उपलब्ध है। क्योंकि यह मुक्तस्रोत है, और साथ ही एक बड़ी कम्पनी का इसमें हाथ भी है, अतः सम्भवतः देवनागरी और अन्य लिपियों का ओसीआर - ऑप्टिकल कॅरॅक्टर रीडर - बनाने में काफ़ी मदद करेगा। इसका मतलब यह हुआ कि आप छपी हुई पुस्तकों को - जैसे कि रामायण, गोदान आदि - बिना टङ्कित किए, केवल स्कॅनर की मदद से अपने कम्प्यूटर पर यूनिकोडित रूप में पा सकेंगे - इस टूलकिट का इस्तेमाल करके बने तन्त्रांशों की मदद से, और वे मुफ़्त भी होंगे।
चलते-चलते –
भारत में भले ही कोई हिंदी सेवी या प्रौद्योगिकी को हिंदी की श्रीवृद्धि के लिए उपयोग में लाने में विश्वास करने वाले बुद्धिजीवी कोई साहित्यिक साइट विगत एक दो वर्ष में भले ही शुरू न कर सके हों पर ब्रिटेन में प्रवासी साहित्यकार शैल अग्रवाल ने एक हिंदी पत्रिका ऑनलाइन निकाल कर अपने देश राग की तीव्रता का परिचय दिया है । हाल ही में उन्होंने एक साहित्यिक पत्रिका प्रांरभ की है – http://www.lekhni.net । इस पत्रिका का लोगो है - सोच और संस्कारों की साँझी धरोहर । आखिर क्यों न हो । लेखिका जो हैं । यहाँ आप कहानी, कविता, व्यंग्य, ग़ज़ल कई विधा की सामग्री पढ़ भी सकते हैं और छपने को भेज भी सकते हैं । वैसे यह द्विभाषी पत्रिका है । हिंदी के अलावा यहाँ कुछ सामग्री अँग्रेजी में भी रखी जा रही है । कई पृष्ठों में टायपिंग की त्रुटियाँ हैं जो हिंदी पत्रिकाओं की कमजोरी को ही रेखांकित करती है । हड़बड़ी में प्रकाशन लगता है हिंदीवालों का स्थायी चरित्र बन चुका है । कई पत्रिका के संपादकों को, खासकर अंतरजालीय पत्रिकाओं में, विधा तक की परख नहीं है, वहाँ लेखनी में विभिन्न विधाओं के साथ अब तक तो न्याय हुआ है । वैसे तो अंतरजाल की कई पत्रिकाओं में संपादकीय इस तरह से गायब है जैसे गधे के सिर से सिंग, पर लेखनी के संपादक को बधाई दी जानी चाहिए कि वह लगातार लेखनी को अपने संपादकीय के साथ प्रस्तुत कर रही हैं । संपादकीय के बगैर संपादन या पत्रिका रचनाओं का कलेक्शन मात्र बन जाती है और आज के तकनीकी सुविधाओं के दौर में रचनाओं का कलेक्शन साधारण काम हो चुका है । लेखनी के हर अंक में संपादकीय का जाना संपादक की दृष्टि, गंभीरता और विचारवान् होने का प्रमाण भी है । अक्टूबर-07 के अंक में गाँधी जी की महत्ता पर लिखा गया संपादकीय पठनीय है ।
Tuesday, October 09, 2007
इंटरनेट पर मूल्य आधारित पत्रकारिता यानी लोकमंच डॉट कॉम
वेब-भूमि-4
इंटरनेट को कभी भारतीय संस्कृति में विपक्षी भूमिका के रूप में देखा जा रहा था । कुछ विचारक और समाजशास्त्री इसे भारतीयता की मूल आत्मा के विरूद्ध वैश्वीकरण के हथकंडों के रूप में बताते नहीं थकते थे । पर लगता है ऐसे लोगों को इंटरनेट अब जीवन का जरूरी चीज जैसा नज़र आने लगा है । शायद यही कारण है कि देश के प्रमुख संस्कृति विशेषज्ञ और कवि अशोक बाजपेयी ने इंटरनेट के लिए अंतरजाल शब्द भी गढ़ा जो अब सर्वमान्य भी हो चुका है । अंतरजाल अब राष्ट्रीयता के पुरोधाओं के लिए भी अवांछवीय नहीं रहा । सच तो यह है कि उन्हें राष्ट्रीयता को बचाने के कारगर उपायों में अंतरजाल की भूमिका भी दिखाई देने लगी है । वे बकायदा उसे एक अस्त्र के रूप में लेने हैं या फिर अंतरजाल को हम भारतीयों के लिए एक सकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । जो भी हो, वे मीडिया के प्रक्षेत्र में इसे आजमाते हुए वैकल्पिक मीडिया करार दे रहे हैं । भारत में ऐसे ही वैकल्पिक मीडिया की शुरूआत की है – लोक मंच (www.lokmanch.com)नामक वेबसाइट ने । वैसे यह ऐसे विचारधारा के उन हिमायती लोगों के लिए अचरज का विषय भी हो सकता है कि आखिर कॉम(.com) जिसका मतलब कामर्शियल होता है, ही क्यों चुना गया जबकि ओआरजी (.org) लेने का विकल्प तो बचा ही था और जिसका मतलब संगठन होता है । खैर....
यद्यपि पत्रकारिता पर आधारित इस वेबजाल से राष्ट्रीय विचारधारा के कुशल वक्ता के.एन. गोविन्दाचार्य प्रत्यक्षः नहीं जुड़े हैं तथापि उनका प्रभाव इस वेबजाल पर प्रतिबिंबित होता है । क्योंकर भी न हो । नई दिल्ली से प्रकाशित ‘भारतीय पक्ष’ नामक पत्रिका भी तो यही कर रही है जो मूल रूप में वैश्वीकरण के वैकल्पिक चिन्तन को मान्यता प्रदान करती है। ज्ञातव्य हो कि भारतीय पक्ष प्रसिद्ध विचारक के.एन. गोविन्दाचार्य के कुशल मार्गदर्शन में संचालित पत्रिका है । इसके सम्पादक विमल कुमार सिंह और उप-सम्पादक हर्षित जैन हैं। भारत की सज्जन शक्ति को संगठित करते हुये विभिन्न श्रेत्रों में असंगठित रूप में चलने वाली स्वदेशी पद्धतियों और कलाओं को संगठित करने के उद्देश्य से श्री गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में चलने वाला राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन और भारत विकास संगम इस पत्रिका के माध्यम से वैचारिक पुष्टता प्राप्त कर रहा है। भारतीय पक्ष’ के अलावा लोकमंच नेटवर्क से डेनियल पाइप्स , संस्कृति सरगम तथा हिन्दू विश्व आदि भी संबंद्ध हैं । ज्ञातव्य हो कि डेनियल पाइप्स मध्य-पूर्व एवं राजनीति के विशेषज्ञ अमेरिका के निवासी हैं और विश्व के अग्रणी विद्वानों में अपना स्थान रखते हैं। इस्लामी राजनीति और मध्य-पूर्व पर पिछले दो दशकों से लगातार लिखते आ रहे डेनियल पाइप्स सम्प्रति मिडिल ईस्ट फोरम संस्था के निदेशक भी हैं। उनके लेखों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। संस्कृति सरगम नई दिल्ली से प्रकाशित व मूल रूप में देश के भाषाई समाचार पत्रों को गुणवत्तापरक सामग्री प्रदान करने का माध्यम है। इस पाक्षिक पत्रिका के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी हैं। यह पाक्षिक पत्रिका देश के 1,000 से अधिक भाषाई समाचार पत्रों को प्रति पक्ष सामग्री प्रदान करती है। विश्व हिन्दू परिषद की प्रमुख पत्रिका हिन्दू विश्व पाक्षिक पत्रिका है। इसके सम्पादक ओंकार भावे हैं। इस पत्रिका का प्रसार मुख्य रूप से विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं और धर्मप्रिय लोगों के मध्य है।
जो राष्ट्रीयता यानी भारतीयता के आग्रही हैं और फ्रीलांसिग करना चाहते हैं । पत्रकारिता जिनके लिए जनता के सुख-दुःख का मिशन है वे लोकमंच से किसी भी क्षण जुड़कर अपनी अभिव्यक्ति को वैश्विक कर सकते हैं । कदाचित् यह हिंदी की मूल संस्कृति को भी समूची दुनिया के लिए अभिव्यक्त करने जैसा होगा । लोकमंच से जुड़ने में तकनीकी दृष्टि से भी कोई खास कठिनाई नहीं दिखाई देती । जो युनिकोड़ फोंट में लिखना –पढ़ना जानते हैं वे किसी भी क्षण यहाँ अपने निजी मेल के सहारे मुफ्त पंजीकृत हो कर लिख सकते हैं । लिखने के लिए यहाँ कई स्तंभ तय किये गये हैं इनमें स्वदेश, परदेश, बहस, ब्लॉगर्स पार्क, आस्था, गिल्ली-डंडा, राशन-पानी, ज्ञान विज्ञान, विविधा, चिट्ठी-चोखा आदि प्रमुख हैं । स्वदेश और परदेश स्तम्भ के अंतर्गत देश एवं विदेश के किसी कोने में रहकर भी वहाँ से संबधित प्रमुख समाचार भेज कर प्रकाशित कराया जा सकता है । लोकमंच में प्रारंभ से ही इस्लामाबाद, लदन, न्यूयार्क, काठमांडू, पयुरटो रिको आदि विदेशी शहरों के समाचार वहाँ के फ्रीलांसरों द्वारा भेजे जा रहे हैं और वे बाकायदा प्रकाशित भी हो रहे हैं । प्रिंट मीडिया में किसी समाचार, विचार या संपादकीय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए अलग से पत्र लिखना होता है जबकि वेबमीडिया में यह तत्क्षण संभव है । जाहिर हैं लोकमंच में भी उसी क्षण समाचार या विचार या आलेखों को पढ़कर प्रतिक्रिया लिखी जा सकती है जो स्थायी रूप से प्रकाशित रहता है ।
ओपन सोर्स से उपलब्ध जुमला नामक सॉफ्टवेयर में निर्मित यह जाल स्थल केवल पत्रकारों के लिए ही नहीं अपितु साहित्यिक पत्रकारिता से संबंद्ध तथा साहित्यकारों के लिए भी उपयोगी नज़र आता है । यहाँ किताबघर नामक स्तम्भ के अंतर्गत 8 विविध उप स्तम्भों में रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति को वैश्विक बना सकते हैं । ये 8 विषय है – कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण, समीक्षा, हास्य-व्यंग्य, साहित्य विविधा, साहित्य समाचार हैं ।
इस जाल स्थल की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के डैनियल पाइप्स जैसे प्रमुख स्तम्भकार भी एक नियमित लेखक के रूप में संबंद्ध हैं । अपूर्व कुलश्रेष्ठ भी इस जाल स्थल के नियमित लेखक हैं ।
ऐसे समय में जब मीडिया अब मिशन नहीं अपितु कमीशन केंद्रित होता जा रहा है, लोकमंच जैसे वेब मीडिया मंचों की स्थापना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है । इसे मात्र हिंन्दूत्व के प्रचार-प्रसार का माध्यम नहीं माना जा सकता है । आज जबकि मीडिया जनता के घर की चिंता नहीं अपने बाजार की चिंता में व्याकुल है । जाहिर है बाजार मूलक वैश्वीकरण की शक्तियाँ अधिकतम मुनाफे के लिये विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित समाचार पत्रों को खरीदकर या उनमें अपनी पूँजी बढ़ाकर देश में हर क्षेत्र में व्याप्त होने की व्यापक योजना पर कार्यरत हैं । यदि यह योजना सफल हुई तो संस्कृति, भाषा, मूल्य व परम्पराओं को सहेज पाना किसी के लिये संभव न हो सकेगा । वैश्वीकरण के इस प्रवाह को रोकने का एकमात्र मार्ग है । मूल्य आधारित पत्रकारिता को जीवित रखना । ऐसे में आवश्यक है कि वैकल्पिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता का मार्ग प्रशस्त करते हुये वैश्वीकरण की बाजार मूलक शक्तियों से प्रेरित तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता को अप्रासंगिक बनाया जाये ।
जैसा कि लोकमंच के उद्देश्यों में भी कहा गया है कि वर्तमान समय में जबकि वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजार मूलक शक्ति ने मूल्यों को नये सिरे से परिभाषित कर उसे मुनाफे से जोड़ दिया है और संस्कृति, भाषा, परम्परा को क्षीण कर उसे विकृत और क्षत-विक्षत करने का प्रयास आरम्भ कर दिया है, ऐसे में पत्रकारिता में भारतीय तासीर, संस्कृति, भाषा, परम्परा और मूल्यों को सहेज कर रखने वाले पत्रकारों को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने का समय आ गया है ।
यह अब एक सच की तरह व्याख्यातित और प्रमाणित हो चुका है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक चिन्तन नहीं है यह एक जीवन दर्शन है जो मुनाफे को ही जीवन मूल्य मानता है. ऐसे में इस बात का संकट उत्पन्न हो गया है कि समाज को दिशा देने वाली पत्रकारिता को अब बाजार में एक वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर दिया जायेगा और उसका दायित्व जनशिक्षण और संस्कार निर्माण के स्थान पर स्वयं को बेचना हो जायेगा । ऐसे कठिन दौर में लोकमंच जैसे वेब मीडिया के साथ जुड़ना मूल्य आधारित पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना होगा । पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह देश का तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण करने में असमर्थ रहा है उसे देखते हुए लोकमंच वालों पर विश्वास करने में कोई सांपदायिकता नज़र नहीं आती ।
इंटरनेट को कभी भारतीय संस्कृति में विपक्षी भूमिका के रूप में देखा जा रहा था । कुछ विचारक और समाजशास्त्री इसे भारतीयता की मूल आत्मा के विरूद्ध वैश्वीकरण के हथकंडों के रूप में बताते नहीं थकते थे । पर लगता है ऐसे लोगों को इंटरनेट अब जीवन का जरूरी चीज जैसा नज़र आने लगा है । शायद यही कारण है कि देश के प्रमुख संस्कृति विशेषज्ञ और कवि अशोक बाजपेयी ने इंटरनेट के लिए अंतरजाल शब्द भी गढ़ा जो अब सर्वमान्य भी हो चुका है । अंतरजाल अब राष्ट्रीयता के पुरोधाओं के लिए भी अवांछवीय नहीं रहा । सच तो यह है कि उन्हें राष्ट्रीयता को बचाने के कारगर उपायों में अंतरजाल की भूमिका भी दिखाई देने लगी है । वे बकायदा उसे एक अस्त्र के रूप में लेने हैं या फिर अंतरजाल को हम भारतीयों के लिए एक सकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । जो भी हो, वे मीडिया के प्रक्षेत्र में इसे आजमाते हुए वैकल्पिक मीडिया करार दे रहे हैं । भारत में ऐसे ही वैकल्पिक मीडिया की शुरूआत की है – लोक मंच (www.lokmanch.com)नामक वेबसाइट ने । वैसे यह ऐसे विचारधारा के उन हिमायती लोगों के लिए अचरज का विषय भी हो सकता है कि आखिर कॉम(.com) जिसका मतलब कामर्शियल होता है, ही क्यों चुना गया जबकि ओआरजी (.org) लेने का विकल्प तो बचा ही था और जिसका मतलब संगठन होता है । खैर....
यद्यपि पत्रकारिता पर आधारित इस वेबजाल से राष्ट्रीय विचारधारा के कुशल वक्ता के.एन. गोविन्दाचार्य प्रत्यक्षः नहीं जुड़े हैं तथापि उनका प्रभाव इस वेबजाल पर प्रतिबिंबित होता है । क्योंकर भी न हो । नई दिल्ली से प्रकाशित ‘भारतीय पक्ष’ नामक पत्रिका भी तो यही कर रही है जो मूल रूप में वैश्वीकरण के वैकल्पिक चिन्तन को मान्यता प्रदान करती है। ज्ञातव्य हो कि भारतीय पक्ष प्रसिद्ध विचारक के.एन. गोविन्दाचार्य के कुशल मार्गदर्शन में संचालित पत्रिका है । इसके सम्पादक विमल कुमार सिंह और उप-सम्पादक हर्षित जैन हैं। भारत की सज्जन शक्ति को संगठित करते हुये विभिन्न श्रेत्रों में असंगठित रूप में चलने वाली स्वदेशी पद्धतियों और कलाओं को संगठित करने के उद्देश्य से श्री गोविन्दाचार्य के नेतृत्व में चलने वाला राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन और भारत विकास संगम इस पत्रिका के माध्यम से वैचारिक पुष्टता प्राप्त कर रहा है। भारतीय पक्ष’ के अलावा लोकमंच नेटवर्क से डेनियल पाइप्स , संस्कृति सरगम तथा हिन्दू विश्व आदि भी संबंद्ध हैं । ज्ञातव्य हो कि डेनियल पाइप्स मध्य-पूर्व एवं राजनीति के विशेषज्ञ अमेरिका के निवासी हैं और विश्व के अग्रणी विद्वानों में अपना स्थान रखते हैं। इस्लामी राजनीति और मध्य-पूर्व पर पिछले दो दशकों से लगातार लिखते आ रहे डेनियल पाइप्स सम्प्रति मिडिल ईस्ट फोरम संस्था के निदेशक भी हैं। उनके लेखों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ है। संस्कृति सरगम नई दिल्ली से प्रकाशित व मूल रूप में देश के भाषाई समाचार पत्रों को गुणवत्तापरक सामग्री प्रदान करने का माध्यम है। इस पाक्षिक पत्रिका के सम्पादक अमिताभ त्रिपाठी हैं। यह पाक्षिक पत्रिका देश के 1,000 से अधिक भाषाई समाचार पत्रों को प्रति पक्ष सामग्री प्रदान करती है। विश्व हिन्दू परिषद की प्रमुख पत्रिका हिन्दू विश्व पाक्षिक पत्रिका है। इसके सम्पादक ओंकार भावे हैं। इस पत्रिका का प्रसार मुख्य रूप से विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं और धर्मप्रिय लोगों के मध्य है।
जो राष्ट्रीयता यानी भारतीयता के आग्रही हैं और फ्रीलांसिग करना चाहते हैं । पत्रकारिता जिनके लिए जनता के सुख-दुःख का मिशन है वे लोकमंच से किसी भी क्षण जुड़कर अपनी अभिव्यक्ति को वैश्विक कर सकते हैं । कदाचित् यह हिंदी की मूल संस्कृति को भी समूची दुनिया के लिए अभिव्यक्त करने जैसा होगा । लोकमंच से जुड़ने में तकनीकी दृष्टि से भी कोई खास कठिनाई नहीं दिखाई देती । जो युनिकोड़ फोंट में लिखना –पढ़ना जानते हैं वे किसी भी क्षण यहाँ अपने निजी मेल के सहारे मुफ्त पंजीकृत हो कर लिख सकते हैं । लिखने के लिए यहाँ कई स्तंभ तय किये गये हैं इनमें स्वदेश, परदेश, बहस, ब्लॉगर्स पार्क, आस्था, गिल्ली-डंडा, राशन-पानी, ज्ञान विज्ञान, विविधा, चिट्ठी-चोखा आदि प्रमुख हैं । स्वदेश और परदेश स्तम्भ के अंतर्गत देश एवं विदेश के किसी कोने में रहकर भी वहाँ से संबधित प्रमुख समाचार भेज कर प्रकाशित कराया जा सकता है । लोकमंच में प्रारंभ से ही इस्लामाबाद, लदन, न्यूयार्क, काठमांडू, पयुरटो रिको आदि विदेशी शहरों के समाचार वहाँ के फ्रीलांसरों द्वारा भेजे जा रहे हैं और वे बाकायदा प्रकाशित भी हो रहे हैं । प्रिंट मीडिया में किसी समाचार, विचार या संपादकीय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए अलग से पत्र लिखना होता है जबकि वेबमीडिया में यह तत्क्षण संभव है । जाहिर हैं लोकमंच में भी उसी क्षण समाचार या विचार या आलेखों को पढ़कर प्रतिक्रिया लिखी जा सकती है जो स्थायी रूप से प्रकाशित रहता है ।
ओपन सोर्स से उपलब्ध जुमला नामक सॉफ्टवेयर में निर्मित यह जाल स्थल केवल पत्रकारों के लिए ही नहीं अपितु साहित्यिक पत्रकारिता से संबंद्ध तथा साहित्यकारों के लिए भी उपयोगी नज़र आता है । यहाँ किताबघर नामक स्तम्भ के अंतर्गत 8 विविध उप स्तम्भों में रचनाकार अपनी अभिव्यक्ति को वैश्विक बना सकते हैं । ये 8 विषय है – कविता, कहानी, नाटक, संस्मरण, समीक्षा, हास्य-व्यंग्य, साहित्य विविधा, साहित्य समाचार हैं ।
इस जाल स्थल की लोकप्रियता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के डैनियल पाइप्स जैसे प्रमुख स्तम्भकार भी एक नियमित लेखक के रूप में संबंद्ध हैं । अपूर्व कुलश्रेष्ठ भी इस जाल स्थल के नियमित लेखक हैं ।
ऐसे समय में जब मीडिया अब मिशन नहीं अपितु कमीशन केंद्रित होता जा रहा है, लोकमंच जैसे वेब मीडिया मंचों की स्थापना महत्वपूर्ण साबित हो सकता है । इसे मात्र हिंन्दूत्व के प्रचार-प्रसार का माध्यम नहीं माना जा सकता है । आज जबकि मीडिया जनता के घर की चिंता नहीं अपने बाजार की चिंता में व्याकुल है । जाहिर है बाजार मूलक वैश्वीकरण की शक्तियाँ अधिकतम मुनाफे के लिये विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित समाचार पत्रों को खरीदकर या उनमें अपनी पूँजी बढ़ाकर देश में हर क्षेत्र में व्याप्त होने की व्यापक योजना पर कार्यरत हैं । यदि यह योजना सफल हुई तो संस्कृति, भाषा, मूल्य व परम्पराओं को सहेज पाना किसी के लिये संभव न हो सकेगा । वैश्वीकरण के इस प्रवाह को रोकने का एकमात्र मार्ग है । मूल्य आधारित पत्रकारिता को जीवित रखना । ऐसे में आवश्यक है कि वैकल्पिक राष्ट्रवादी पत्रकारिता का मार्ग प्रशस्त करते हुये वैश्वीकरण की बाजार मूलक शक्तियों से प्रेरित तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता को अप्रासंगिक बनाया जाये ।
जैसा कि लोकमंच के उद्देश्यों में भी कहा गया है कि वर्तमान समय में जबकि वैश्वीकरण में अन्तर्निहित बाजार मूलक शक्ति ने मूल्यों को नये सिरे से परिभाषित कर उसे मुनाफे से जोड़ दिया है और संस्कृति, भाषा, परम्परा को क्षीण कर उसे विकृत और क्षत-विक्षत करने का प्रयास आरम्भ कर दिया है, ऐसे में पत्रकारिता में भारतीय तासीर, संस्कृति, भाषा, परम्परा और मूल्यों को सहेज कर रखने वाले पत्रकारों को राष्ट्रीय क्षितिज पर लाने का समय आ गया है ।
यह अब एक सच की तरह व्याख्यातित और प्रमाणित हो चुका है कि वैश्वीकरण केवल आर्थिक चिन्तन नहीं है यह एक जीवन दर्शन है जो मुनाफे को ही जीवन मूल्य मानता है. ऐसे में इस बात का संकट उत्पन्न हो गया है कि समाज को दिशा देने वाली पत्रकारिता को अब बाजार में एक वस्तु बनाकर प्रस्तुत कर दिया जायेगा और उसका दायित्व जनशिक्षण और संस्कार निर्माण के स्थान पर स्वयं को बेचना हो जायेगा । ऐसे कठिन दौर में लोकमंच जैसे वेब मीडिया के साथ जुड़ना मूल्य आधारित पत्रकारिता को प्रोत्साहित करना होगा । पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह देश का तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया राष्ट्रीय भावना का प्रकटीकरण करने में असमर्थ रहा है उसे देखते हुए लोकमंच वालों पर विश्वास करने में कोई सांपदायिकता नज़र नहीं आती ।
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